जनाब, इस जंगल में कौन सुरक्षित?

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हों, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हों या वहां के गृह राज्य मंत्री अमित शाह या भारत का पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम या रिया चक्रवर्ती, इनमें फर्क क्या है? कुछ नहीं। ये और हम सब उस जंगल के निवासी हैं, जिसे 21वीं सदी में भारत नाम प्राप्त है! इस जंगल में कानून खूब है मगर लाठियां, भेड़िए असंख्य गुना अधिक। इंसान कब किस लाठी का, किन भेडियों का शिकार हो, इसका भगवान मालिक है। बतौर इंसान जितनी बातें, जितनी व्यवस्थाएं याकि जिंदगी, जीवन, गरिमा, इज्जत-प्रतिष्ठा, सुरक्षा आदि के तमाम सूत्र जंगल के जंगलीपने से हैं। जीवन व जीवन की कथित गरिमा तभी तक सुरक्षित है जब तक भेड़ियों की, कानून के कथित रक्षकों की, लोकतंत्र के कथित डंडों की नजर न लगे। एक बार नजर लगी और टारगेट हुए तो नरेंद्र मोदी पर हत्या का आरोप लगेगा, अमित शाह जेल जाएंगे, तड़ीपार होंगे तो सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस रंजन गोगोई एक महिला के एक वाक्य में लिंच हुआ मिलेगा तो पी चिदंबरम जमानत के लिए भी तड़पते हुए होंगे और रिया चक्रवर्ती नाम की एक 28 साला लड़की भी भेडियों की शिकार!

यहीं है भारत राष्ट्र-राज्य का सार। इस भूमि में सीता को एक धोबी के कहे से देशनिकाला मिलते सुना है तो मैंने अपनी आंखों नरसिंह राव को प्रधानमंत्री रहते एक केकड़े लक्खूभाई की टांग खिंचाई की जलालत में जीते देखा है तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को एपी सिंह-रणजीत सिन्हा की सीबीआई के वक्त घुटते देखा है। और हां, वीपी सिंह-भूरेलाल के खौफ में धीरूभाई अंबानी को लकवा होते बूझा है तो चिदंबरम, अहमद पटेल जैसे असंख्यों को अभी अधमरा बूझ रहा हूं। भारत में इनकम टैक्स का अफसर कैफे कॉफी डे के अरबपति मालिक सिद्धार्थ को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देगा तो असंख्य लोगों को नेता, किसी मंत्री की कृपा से खरबपति बनते भी देखा है। जंगल का राजा मेहरबान तो गधा पहलवान और जंगल का राजा नाराज तो शेर भी कंपकंपाता हुआ!

तभी भारत राष्ट्र-राज्य में जिंदगी, इंसानी सुरक्षा, गरिमा, सत्यता, समानता, आजादी से भला कौन जी सकता है? हाकिम-हुकूमत-सत्ता-सत्तावान याकि जंगल में जिसकी लाठी, जिसको मौका, जिसके खूनी दांत उससे डर कर, भागे हुए इंसान को खौफ में, गुलामी में, गधों के शोर में ही जीना है। कभी भी कोई भी एजेंसी खिलाड़ी पर मैच फिक्सिंग की सनसनी बनवा उसे बरबाद कर देगी तो सीबीआई-ईडी-पुलिस-एनसीबी चाहे किसी के बयान (फिर भले वह जेल में बंद हत्या की अभियुक्त हो) पर पूर्व गृह मंत्री को जेल में डाल देगी तो बेचारी अभिनेत्री सलाखों के पीछे। यदि कोई महामारी का शिकार हुआ तो उसे अस्पताल में दाखिले-दवा के लिए दर-दर भटकना होगा। जाहिर है भारत में गर्भ से ले कर मौत तक इंसान को उन तमाम अनुभवों से गुजरना होता है, जिससे शायद जंगल के प्राणी भी नहीं गुजरते होंगे। यह भी नोट रखें कि प्राकृतिक आपदा-विपदाओं में भी इंसान को भगवान कृपा पर जीना है।

मैं आज यह जंगल पुराण इसलिए लिए हुए हूं क्योंकि बुधवार को कोलकत्ता के ‘द टेलिग्राफ’ की हेडिंग- ‘सुशांत सिंह राजपूतः पृथ्वी का सर्वाधिक दुखद शो” ने दिमाग में खदबदाहट बनाई। मैंने इस मामले पर नहीं लिखा था। अपने वैदिकजी और अजीत ने बहुत लिखा। मैंने इसलिए नहीं लिखा क्योंकि यह सब देखते-समझते हुए तो पत्रकारिता के चालीस साल गुजरे हैं। भारत राष्ट्र-राज्य के तंत्र, आजाद भारत में बनाए गए कानूनों और व्यवस्था का कुल जमा निचोड़ है कि 138 करोड़ लोगों का जीवन जस का तस बिना मानवीय गरिमा के है। जब हजार साल की गुलामी के जंगल में, बिना गरिमा, सुरक्षा, प्रतिष्ठा के हम जीये हैं और आजाद भारत बुनियादी तौर पर गुलामी के इंडिया एक्ट में बना-ढला हुआ है तो जीना जंगल व्यवस्था में ही होगा। जंगल में जानवर हो या आदमी उसका जीना, गरिमा, प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता, सुरक्षा से तभी तक है जब तक आप शिकार नहीं हुए। यदि भाग्य व जन्मपत्री में शिकार होना नहीं लिखा है तो चुपचाप जीवन गुजर जाएगा नहीं तो डर-खौफ-चिंता के परिवेश, रोते-सिसकते मर-मर कर, आपदा-विपदा और भेड़ियों व जिसकी लाठी उसकी भैंस में जीना है।

भारत की माया विचित्र है। ‘द टेलिग्राफ’ ने अपने विश्लेषण में लिखा कि पहली बार है जो विरोधी ग्रुपों, राजनीतिक-वैचारिक अंसतुष्टों के खिलाफ काम करती रही केंद्र सरकार की एजेंसियों ने एक व्यक्ति, नागरिक को अपना शिकार बनाया। कथित टेलीविजन न्यूज मीडिया का अब सरकार के दमन का औजार बनने का ट्रांसफॉरमेशन पूर्णता को प्राप्त है। पर क्या ऐसा पहले नहीं होता रहा है? भारत के जंगल की हर चीज, हर संस्था का उपयोग जंगल राज के लिए है यह कांग्रेस के समय भी था तो लालू यादव, जयललिता, एनटी रामाराव, बंसीलाल जैसे क्षत्रपों के राज में भी था और अब भी है।

तब और अब का फर्क यदि निकालना है तो यह हो सकता है कि पहले जंगल में राजा लोग शेर, चीता हुआ करते थे। अब वे शाही-समझदार पशु प्रजातियां लुप्त हैं और उनकी बजाय भेडियों, लोमड़ियों, गधों, लंगूरों, सुअरों, बिल्लियों, सांप, केकड़ों, चमगादड़ों, उल्लूओं व भेड़-बकरियों का कलियुग है तो प्राकृतिक न्याय भी खत्म है। मैंने चालीस साल की घटनाओं में इंसानी गरिमा पर फोकस बना भारत के तंत्र और गण पर, जितना लिखा है वह पांच सौ पेज की किताब बन जाएगी लेकिन सबका सार तत्व अकेला यह वाक्य है कि किसी को गुमान नहीं होना चाहिए कि उसकी नागरिकता, बतौर इंसान वे तमाम गारंटी लिए हुए हैं जो ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशों के जीवन में होती है। भारत के लोकतंत्र और उसकी व्यवस्थाओं में तानशाही-साम्यवादी-इस्लामी देशों से भी खराब, गंभीर संकट इसलिए है क्योंकि लाठियों के मामले में भारत में जैसा विकेंद्रीकरण है वैसा इन देशों में नहीं है। मतलब पुतिन, शी जिनफिंग के रूस और चीन में राष्ट्रपति, कम्युनिस्ट पार्टी के एक-दो डंडे चलेंगे लेकिन भारत में तो हर हाकिम, हर संस्था एक डंडा है। मंत्री-अफसर-न्यायपालिका, मीडिया डंडा है तो पैसे वाला भी डंडा लिए हुए है और सब बिना जवाबदेह, बिना जिम्मेवारी के। कोरोना काल में अस्पताल, डॉक्टर, तमाम सेवा प्रदाता अपने मौके पर आज जिस अंदाज में जो करते हुए दिख रहे हैं उसमें सोचें कि अपने जंगल में हमारा जीना कितनों से बचते हुए, कितनों की कृपा से संभव है!

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