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तालिबान को मुबारक और…

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Taliban take control afghanistan इन पंक्तियों को लिखने तक काबुल एयरपोर्ट के विस्फोटों में मौत की संख्या सौ पार है। इसमें 13 अमेरिकी सैनिक है और बाकि अफगान मुस्लिम!  यह वाकिया अफगानिस्तान के भविष्य की तस्वीर है। इस बात का मतलब नहीं हैं कि विस्फोटो के पीछे तालिबान नहीं बल्कि इस्लामिक स्टेट खुरासान याकि आईएस-के है। तालिबान हो या आईएस-के या अलकायदा या पंजशीर के लड़ाके सब एक जैसे है। आईएस-के ने अपनी दुकान चलाने के लिए तालिबानी जीत को ‘मुल्ला ब्रैडली’ प्रोजेक्ट नाम दे कर अपने आपको सच्चा इस्लामी बताया। मतलब नया तालिबान अमेरिका का प्रॉक्सी है।

फालतू बात। इसलिए कि अफगानिस्तान में अमेरिका से लड़ते तमाम संगठन बुनियादी तौर पर जिहादी जुनून में बने है। इन सभी संगठनों का भाईचारा घरेलू है तो वैश्विक पैमाना भी लिए हुए है। लंदन की द इकॉनोमिस्ट पत्रिका ने गजब बात बताई कि जैसे अमेरिका का राष्ट्रपति सत्ता संभालता है तो दुनिया के बाकि देशों के नेताओ में हौड होती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की सबसे पहले बात होती है वैसे काबुल पर कब्जे के बाद ऐसा रूताब तालिबानी नेता मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर का बना। उनसे सबसे पहले बात करने में कामयाब हुआ इजराइल से लड रहा आंतकी संगठन हमास। मुल्ला बरादर से बात करने वाला पहला नेता हमास का नेता इस्माइल हानिया था। अमेरिकी कब्जे के खिलाफ जीत की बधाई देते हुए हानिया ने कहा यह शुरूआत है कब्जा करने वाली सभी ताकतों के पतन की, सबसे पहले फिलीस्तीन से इजराइली कब्जा खत्म होगा। जवाब में बरदारी ने हमास को शुभकामना देते हुए उनकी लड़ाई के ताकतवर बनने की शुभकामना दी। इस पहली बधाई-शुक्रिया का हमास की वेबसाइट पर जोरशोर से प्रचार था।

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क्या गजब बात! जाहिर है काबुल में तालिबानी कब्जे से दुनिया भर के इस्लामी उग्रवादी संगठन बम-बम है। एक -दूसरे को बधाई दे रहे है. जश्न मना रहे है। सीरिया के इदलीब सूबे पर कब्जा जमाए अल-कायदा से निकले संगठन हयात तहरीर अल-शाम के लड़ाकों ने 15 अगस्त को तालिबानी जीत की परेड़ निकाली और लोगों को बकलावा मिठाई बांटी। ऐसे ही दक्षिण सोमालिया के जिलों में कब्जा जमाए अल-कायदा से निकले संगठन अल-शहबाब ने तीन दिन जश्न मनाया। अल-क़ायदा की यमन शाखा ने भी तालिबान को उसकी ऐतिहासिक जीत पर बधाई दी। सोशल मीडिया पर जिहादियों ने तालिबानी जीत के खूब मीम चलाएं। अमेरिका और अमेरिकी सैनिकों की खूब मजाक उड़ाई?

मानों जिहादियों ने एवरेस्ट जीत लिया हो।  पाकिस्तान में अलग-अलग संगठनों के नेताओं और जश्न मनाने की खबरे है तो तालिबानियों से ही बने तहरीक ए तालीबान (टीटीपी) का हौसला बेइंतहा बढ़ा है। ध्यान रहे पिछले महिने इस संगठन ने 26 और सन् 2020 में इस संगठन ने पाकिस्तान में 120 आंतकी वारदाते की थी। यों पाकिस्तानी प्रधानमंत्री तालिबानी जीत से झूमे हुए है और उन्होने 23 अगस्त को बाकायदा कहां कि- तालिबानी बता रहे है वे उनके साथ है और वे आएंगे तथा हमारे लिए पाकिस्तान आजाद कराएगें। लेकिन इमरान खान और पाकिस्तान की दशा भी तय माने। तालिबान, अल-कायदा, आईएस-के जैसे तमाम इस्लामी संगठन अमेरिकी सेना के भागने के बाद इस्लामाबाद की नाक में दम करेंगे।

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संदेह नहीं कि तालिबानियों की जीत से जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी-आंतकी संगठनों में कम जश्न नहीं मना होगा लेकिन वैश्विक मीडिया और द इकॉनोमिस्ट आदि पत्रिका का मानना है कि सबसे ज्यादा आग पश्चिम एसिया व अफ्रीका के उन इलाकों में लगनी हैं जहां गृहयुद्ध जैसी स्थितियां है या फ्रांस, अमेरिकी सेना के उग्रवादियों को मारने के आपरेशन चल रहे है। सहारा रेगिस्तान के सहेल इलाके में फ्रांस ने 2013 से जिहादियों को खत्म करने का आपरेशन चलाया हुआ है। माली नाम के देश में जिहादियों ने फ्रांस की नाक में दम कर रखा है तो चाड़, मारिटेनिया, बुरकिनो फासो, सोमालिया, नाईजीरिया आदि में इस्लामी स्टेट, बोका हराम जैसे संगठनों की आंतकी गतिविविधयां मामूली नहीं है। सीरिय, इराक, यमन सभी तरफ उग्रवादी संगठनों की भरमार है। इन सबके लिए काबुल पर तालिबानी कब्जे और 15 अगस्त का दिन ऐतिहासिक हो गया है। तभी नाईजीरिया के राष्ट्रपति बुहारी का 15 अगस्त के दिन यह लिखा गंभीर मायने वाला है कि – पश्चिम को लड़ने की इच्छाशक्ति खोते देख बतौर अफ्रिकी, हमारे लिए भी परीक्षा का वक्त आ गया है! (As Africans, we face our day of reckoning just as some sense the West is losing its will for the fight.)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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