Talibans new government Afghanistan तालिबान वैसा ही है जैसा था!
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तालिबान वैसा ही है जैसा था!

Afghanistan Taliban New Govt :

बड़ी चर्चा थी कि तालिबान बदल गया है। सामरिक मामलों के कई विशेषज्ञ, कई स्कॉलर, कई नेता और कूटनीतिक मामलों के जानकार कह रहे थे कि तालिबान अब 20 साल पहले वाला संगठन नहीं है। पिछले 20 साल में तालिबान के बदल जाने या मॉडरेट हो जाने की बातें करीब एक महीने से खूब हो रही थीं। तभी दुनिया के देश तालिबान की गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे। जब उन्होंने आम माफी का ऐलान किया या जब तालिबान के प्रतिनिधि कतर में भारतीय दूतावास में भारत के राजदूत से मिलने पहुंचे तो ऐसे लोगों की बाछें खिल गईं, जो तालिबान के बदले होने का प्रचार कर रहे थे। लेकिन सरकार गठन के साथ ही तालिबान के चेहरे से वह झीना सा नकाब भी उतर गया जो बदलाव के नाम पर ओढ़ा गया था। सबने देख लिया कि अफगानिस्तान की सरकार सिर्फ तालिबान की सरकार है। उसमें दूसरे किसी संगठन या समूह या जातीय समुदाय को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। तालिबान की 33 सदस्यों की अंतरिम सरकार में एक भी महिला शामिल नहीं की गई है। और सबसे ऊपर संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से घोषित एक दर्जन से ज्यादा आतंकवादियों को सरकार में मंत्री बनाया गया है। (Talibans new government Afghanistan)

तालिबान की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री मुल्ला हसन अखुंद को संयुक्त राष्ट्र संघ ने काली सूची में डाला हुआ है। उसके ऊपर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के आरोप हैं। अखुंद संयुक्त राष्ट्र संघ की काली सूची में तब से शामिल है, जब अमेरिका पर 9/11 का आतंकवादी हमला नहीं हुआ था। अखुंद ने सिराजुद्दीन हक्कानी को अफगानिस्तान का गृह मंत्री बनाया है, जिसके ऊपर अमेरिका की सरकार ने 37 करोड़ रुपए का इनाम रखा है। उसके ऊपर काबुल में विस्फोट कर छह अमेरिकियों की हत्या करने का आरोप है। अखुंद और हक्कानी ये दोनों बामियान में बुद्ध की प्राचीन मूर्ति को डायनामाइट लगा कर उड़ाने के आरोपी हैं। नई सरकार के रिफ्यूजी मंत्री खलील हक्कानी पर भी अमेरिकी सरकार ने इनाम रखा है। अंतरिम सरकार के 33 मंत्रियों में से 14 मंत्री ऐसे हैं, जो घोषित आतंकवादी हैं। दोनों उप प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी बरादर और मौलवी अब्दुल सलाम हनफी भी संयुक्त राष्ट्र की काली सूची में हैं। मुल्ला अब्दुल लतीफ मंसूर, नजीबुल्ला हक्कानी, कारी दीन हनीफ, मौलवी नूर जलाल आदि मंत्री भी घोषित आतंकवादी हैं।

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काबुल पर कब्जे के बाद जब बदले हुए तालिबान की बात हो रही थी तब किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि तालिबान ने कतर में फरवरी 2020 में हुए समझौते का पालन नहीं किया है। उस समझौते में तय हुआ था कि तालिबान और अफगान सरकार के बीच बातचीत के जरिए तालिबान की सरकार में साझेदारी होगी। लेकिन तालिबान ने अमेरिका फौजों की वापसी को मौका माना और हथियार के दम पर काबुल पर कब्जा किया। अगर समझौते का पालन होता या तालिबान बदल गया होता तो समझौते वाली साझा सरकार बनती और राष्ट्रपति अशरफ गनी को भागने की जरूरत नहीं पड़ती। लोगों को उसी समय समझ में आ जाना चाहिए था कि तालिबान बदला नहीं है।

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उसके बाद भी यूरोपीय संघ के देशों और कुछ अन्य देशों को उम्मीद थी कि शायद तालिबान एक समावेशी सरकार बनाए, जिसमें सभी समुदायों, जातीय समूहों, राजनीतिक संगठनों आदि को जगह मिले। तभी यूरोपीय संघ ने कहा भी था कि अगर समावेशी सरकार बनती है तभी वे आगे अफगानिस्तान सरकार के साथ संपर्क बनाए रखने पर विचार करेंगे। लेकिन तालिबान ने ऐसा नहीं किया है। उसने अशरफ गनी की पिछली चुनी हुई सरकार के लोगों से बात नहीं की और न उन्हें सरकार में जगह दी। शुरू में कुछ दिन पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और अब्दुल्ला अब्दुल्ला के साथ दिखावे की बातचीत हुई लेकिन किसी भी गैर तालिबानी संगठन के आदमी को सरकार में जगह नहीं दी गई। कोई भी महिला सरकार में शामिल नहीं है और तालिबान की सरकार के 33 मंत्रियों में से 30 मंत्री सिर्फ पख्तून समुदाय के हैं। ध्यान रहे अफगानिस्तान सांस्कृतिक और जातीय रूप से बड़ी विविधता वाला देश है। बड़ी संख्या में ताजिक, उज्बेक, हजारा आबादी भी है। लेकिन तालिबान ने इस विविधता का सम्मान करने की भी कोई जरूरत नहीं समझी। जिन्होंने अमेरिकी फौजों की वापसी की घोषणा के साथ ही हिंसा के दम पर काबुल पर कब्जा करने की तालिबानी मुहिम से उनको नहीं पहचाना था उनको भी सरकार देख कर समझ में आ जाना चाहिए कि तालिबान बदला बिल्कुल नहीं है। वह वैसा ही है, जैसा 1996 में मुल्ला उमर के समय था। फर्क यह है कि अब उसके पास ज्यादा घातक हथियार और लड़ाके हैं, जिनको पाकिस्तान के साथ साथ चीन का भी समर्थन हासिल हो गया है।

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काबुल पर कब्जा करने और अपनी सरकार बनाने के बीच की करीब 20 दिन की अवधि में तालिबान ने अफगानिस्तान में जो किया है वह उसकी असलियत का दस्तावेज है। उसने टेलीविजन चैनलों से महिला एंकरों को हटवा दिया, महिलाओं के चेहरे पर बुर्के डलवा दिए, कॉलेजों में महिला और पुरुष छात्रों के बीच परदे लगा दिए, सड़कों पर प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर कोड़े बरसाए, उनको बंदूकों के कुंदे से पीटा गया, हजारा समुदाय की महिलाएं से जबरन तालिबानी लड़ाकों की शादी कराई जा रही है, पंजशीर घाटी को घेर कर पाकिस्तानी हथियारों के जरिए न जाने कितने लोगों को मारा गया ताकि विरोधियों के उस आखिरी गढ़ पर तालिबान का कब्जा हो, अपने विरोधियों को स्टेडियम में लोगों की भीड़ के सामने गोली मारी गई, हेलीकॉप्टर से लटका कर हवा में उड़ाया गया ताकि समूचा अफगानिस्तान देखे कि तालिबान अपने दुश्मनों के साथ कैसा बरताव करता है और उसके बाद मीडिया समूहों से कहा कि अगर किसी ने तालिबान को आतंकवादी कहा तो उसके साथ दुश्मनों जैसा बरताव किया जाएगा।

तालिबान के आतंकवादी ये सारे काम इस्लाम और शरिया के नाम पर कर रहे हैं। इस्लाम और शरिया के कानून से सरकार चलाने की चाह रखने और खलिफाई राज बनाने की सोच रखने वाले सारे आतंकवादी संगठन तालिबान के शासन में एक मॉडल शासन व्यवस्था का रूप देख रहे हैं। सो, दुनिया को सावधान हो जाना चाहिए। तालिबान को बदला हुआ मानने की बजाय उसके असली रूप को समझते हुए और आगे के खतरे को देखते हुए यह सोचना चाहिए कि उससे और उसके जैसा बनने की चाह रखने वाले दुनिया भर के आतंकवादी संगठनों से कैसे निपटेंगे। Talibans new government Afghanistan

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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