तनिष्क के प्रहसन की टाइमिंग

टाटा समूह की आभूषण कंपनी तनिष्क ने अपने विज्ञापन के जरिए एक तमाशा रचा था। कंटेंट के लिहाज से यह एक फूहड़ प्रहसन था, जिसे समावेशी संस्कृति के नाम से पेश किया गया। इसके बावजूद इसे संदेह का लाभ देते हुए स्वीकार किया जा सकता था कि कंपनी ने विवाद उत्पन्न करके उसके जरिए अपना कारोबार बढ़ाने का दांव चला, जिसमें उसे कामयाबी मिली। परंतु जितनी तेजी से कंपनी ने विज्ञापन वापस लिया उससे संदेह मिट गया और दूसरे सवाल खड़े हो गए।

उनमें सबसे पहला सवाल इसकी टाइमिंग का है। आखिर इस समय तनिष्क ने ऐसी विज्ञापन फिल्म क्यों तैयार की, जिसमें हिंदू युवती को मुस्लिम परिवार में बहू के तौर पर दिखाया गया? क्या टाटा समूह को इसके असर का अंदाजा नहीं था?

क्या समूह के ब्रांड मैनेजर, क्रिएटिव हेड, मार्केटिंग मैनेजर आदि किसी को देश के राजनीतिक हालात, राजनीतिक खबरों और जमीनी माहौल की खबर नहीं है? क्या किसी ने असम के वरिष्ठ मंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की प्रेस कांफ्रेंस नहीं देखी-सुनी, जिसमें उन्होंने असम के लोगों से कहा कि उनकी पार्टी को पांच साल का कार्यकाल और मिला तो वह ‘लव जिहाद’ को रोकेगी? क्या किसी को इस बात की खबर नहीं थी कि दिल्ली में राहुल राजपूत नाम के युवक की किस वजह से हत्या कर दी गई है और सोशल मीडिया में उसे लेकर क्या प्रचार चल रहा है?

कहा जा सकता है कि इस तरह की बातों से घबरा कर रचनात्मकता या किसी भी आइडिया को नहीं रोका जा सकता है। तो फिर सवाल है कि तनिष्क ने अपनी विज्ञापन फिल्म में जिस आइडिया को प्रस्तुत किया है क्या वह भारतीय समाज की मौजूदा समय की सचाई है या उस आइडिया का समय आ गया है?

ध्यान रहे कोई भी कंपनी या उसका विज्ञापन लोकप्रिय प्रवृत्तियों को ही प्रस्तुत करता है या कम से कम ऐसी प्रवृत्तियों को प्रस्तुत करता है, जिनके भविष्य में लोकप्रिय होने की संभावना दिखती है। तनिष्क भी ऐसा ही करता रहा है। उसने कुछ समय पहले समलैंगिक विवाह की थीम पर अपनी विज्ञापन फिल्म बनाई थी। सबको पता है कि समलैंगिक संबंधों को समाज भले मान्यता न दे पर इसे कानूनी रूप से मान्यता मिल गई है। इसे अपराध बनाने वाले कानूनी प्रावधान को बदल दिया गया है। समाज में इसका प्रचलन भी बढ़ रहा है। इसलिए इस बढ़ती प्रवृत्ति को प्रतीकित करता विज्ञापन तनिष्क ने बनाया था। हालांकि उसका भी जब विरोध हुआ तो घबरा कर कंपनी ने उसे वापस ले लिया था।

उस समय उसका विज्ञापन समाज में स्वीकृत हो रही एक नई प्रवृत्ति को दिखाने वाला था। लेकिन क्या यहीं बात उसके नए विज्ञापन के बारे में कही जा सकती है? क्या भारतीय समाज में अंतरधार्मिक विवाह को सहज रूप से मान्यता मिलने लगी है, समाज इसे स्वीकार करने लगा है या इस बात के कोई संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में यह प्रवृत्ति लोकप्रिय और स्वीकार्य होने वाली है? कम से कम अभी भारतीय समाज के लिए अभी यह बात नहीं कही जा सकती है।

तभी सवाल है कि फिर तनिष्क ने ऐसा विज्ञापन क्यों बनवाया? कहीं उसका मकसद एक खास राजनीतिक दल और कुछ खास सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों की ओर से फैलाई जा रही इस बात का स्थापित करना तो नहीं था कि हिंदू युवतियों को मुस्लिम युवक अपने प्रेम जाल में फंसा रहे हैं और उनसे शादी कर रहे हैं? ध्यान रहे कई राज्यों में भाजपा नेताओं और छोटे-बड़े कई हिंदू समूहों ने ‘लव जिहाद’ के खिलाफ मोर्चा खोला है। पिछले दिनों सूटकेस में बंद एक युवती का शव दिखा कर सोशल मीडिया में अफवाह फैलाई गई कि मुस्लिम युवक से प्रेम करने का यह हस्र होता है, जबकि यह पता भी नहीं है कि सूटकेस में जिस युवती का शव मिला वह किस धर्म की है!

ऐसे खतरनाक समय में इसी थीम पर विज्ञापन रचना, उसे प्रस्तुत करना, उसका व्यापक व कई जगह हिंसक विरोध होना और फिर आनन-फानन में विज्ञापन का वापस हो जाना, कई दूसरी बातों की ओर इशारा करता है। अफसोस की बात है कि देश के तमाम सेकुलर और बौद्धिक जमात विज्ञापन व कंपनी की मंशा को समझे बगैर इसके पक्ष में उतर गई है। रचनात्मक स्वतंत्रता की दुहाई दी जा रही है। सोशल मीडिया के ट्रोल्स को गालियां दी जा रही हैं। पर ऐसा सिर्फ अपने को उदार, सेकुलर और प्रगतिशील दिखाने के लिए किया जा रहा है। इस विज्ञापन का समर्थन करने वालों को भी पता है कि इसमें जो दिखाया गया है वह भारतीय समाज की लोकप्रिय प्रवृत्ति नहीं है। अभी जो समाज अंतरजातीय विवाह को स्वीकार नहीं कर पाता है, उस समाज में अंतरधार्मिक विवाह को लोकप्रिय प्रवृत्ति के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता है। वह भी ये जानते हुए कि यह एक राजनीतिक विषय है और इसका दुरुपयोग हो सकता है। विज्ञापन बनाने वाले की रचनात्मक स्वतंत्रता पर सवाल नहीं भी उठाएं तब भी टाटा समूह की मंशा संदेह के घेरे में है।

विज्ञापन के कंटेंट पर ध्यान देंगे तो रचनात्मकता की भी पोल खुलती है और यह एक प्रहसन की तरह लगने लगता है। विज्ञापन में एक गर्भवती हिंदू युवती को दिखाया गया है, जो एक मुस्लिम परिवार का हिस्सा है। उसकी गोदभराई की रस्म हो रही है, जिसमें खूब अमीर मुस्लिम परिवार के लोग जोश, उत्साह के साथ तैयारियां करते दिख रहे हैं। उसी समय हिंदू बहू अपनी मुस्लिम सास का हाथ पकड़ कर आश्चर्य से पूछती है कि आपके परिवार में तो यह रस्म होती भी नहीं होगी। इस पर मुस्लिम सास कहती है कि बिटिया को खुश रखने की रस्म तो हर जगह होती है।

इस विज्ञापन में बुनियादी खामी यह है कि आमतौर पर बहुएं गर्भवती होकर घर में नहीं आती हैं, घर में आती हैं उसके बाद गर्भवती होती हैं। अगर बहू एक साल भी घर में रही है और फिर भी उसको घर में अपनापन सा महसूस नहीं होता है, उलटे उसे गोदभराई की रस्म पर हैरानी होती है तो इसका मतलब है कि पहले बहू के धर्म की कोई रस्म घर में नहीं निभाई गई है तभी बहू को अपने ससुराल पक्ष की उदारता या उनके यहां होने वाली रस्मों का अंदाजा नहीं था। फिर सवाल है कि शादी किस रीति से हुई थी और उसके बाद किस किस्म की रस्मों का पालन किया गया था? हिंदू बहू को अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन करने की इजाजत थी या नहीं? अगर थी तो इसमें हैरान होने वाली क्या बात है कि गोदभराई की रस्म हो रही है? आप इसे बाल की खाल निकालना कह सकते हैं, लेकिन जब टाटा समूह की आभूषण कंपनी इतना बड़ा विज्ञापन कैंपेन शुरू कर रही है तो उसके लिए विज्ञापन फिल्म बनाने वालों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए था।

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