तंत्र के दरवाजे गण और गणतंत्र का भविष्य!

भारत का तंत्र आज दिल्ली के राजपथ पर ताकत के प्रदर्शन में सलामी लेगा जबकि राष्ट्र-राज्य के गण, लोग, किसान ट्रैक्टर रैली से तंत्र को चेताएंगे कि उनकी सुनो! दिल्ली की सीमा पर कोई दो महीने से ठंड, बारिश, महामारी से जूझते किसान तंत्र के आगे स्यापा कर रहे हैं कि उनके पेट पर, उनकी खेती, उनकी जमीनी खुद्दारी को मारने वाले कृषि कानूनों को रद्द करो! लेकिन भारत के तंत्र, उसकी हाकिम सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह ऐंठ दो टूक है कि वे कानून बनाने वाले हैं तो चाहे जो करेंगे। इस हकीकत में 71वें वर्ष में भारत के गणतंत्र का क्या अर्थ निकालें? भारत के 138 करोड़ नागरिकों में कोई तीस करोड़ लोग राजा और उसके तंत्र की भक्ति में हैं, जबकि बाकी सौ करोड़ लोग या तो बेगाने हैं या सिख, मुसलमान, दलित जात-पांत में वे नाम, वे संज्ञाएं पाएं हुए हैं, जिन्हें चाहे तो खालिस्तानी कहें या पाकिस्तानी या टुकड़े-टुकड़े गैंग, देशद्रोही, वामपंथी, सेकुलर या मोदी विरोधी!

इस जनवरी ‘खालिस्तानियों’ से दिल्ली का तंत्र आक्रांत है तो पिछली जनवरी में शाहीन बाग की मुस्लिम औरतों से था। न तब तंत्र ने समझा और न अब तंत्र समझ रहा है कि लोकतंत्र और गणतंत्र दीर्घायु तभी है जब निर्णयों में आबादी का अधिकाधिक समर्थन हो। तंत्र सबसे चलता हुआ हो। तंत्र यदि गण को बांट, उनमें विभाजन बनवा फूट डालो-राज करो में ढला तो या तो गुलामी है या फिर वही होना है जो हाल में अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में हुआ और जो इतिहास के सर्वाधिक नामी रोम गणराज्य के पतन में हुआ था।

मानव इतिहास का यह प्रामाणिक सत्य है कि जब भी कोई जनप्रतिनिधि नेता गणतंत्र और लोकतंत्र की आड़ में अपने को राजाधिराज बनाता है तो वह खुद या उसका वंश या उसकी पार्टी दस-बीस, पचास साल भले राज कर ले लेकिन जैसे रोम गणराज्य नहीं बचा वैसे कोई गणराज्य जिंदा नहीं रहा। डोनाल्ड ट्रंप हैं तो अमेरिका है, नरेंद्र मोदी हैं तो भारत की सुरक्षा है के आइडिया ऑफ गवर्नेंस का अर्थ है विभाजित समाज और असंवेदनशील तंत्र। वे गणराज्य अंततः बेमौत मरते हैं जब ऑगस्टस, सीजर, डोनाल्ड ट्रंप अपने आपको देश का नियंता मान जनता को बहकाते हैं कि वे ही देश को बचा सकते हैं, देश महान बना सकते हैं।

इसी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को दो हिस्सों में बांटा और गृह युद्ध की नौबत ला दी। अमेरिका का भाग्य बलवान था, पूर्वजों की समझ में बने तंत्र में कुछ सेफ्टी वाल्व ऐसे थे, जिससे ट्रंपशाही पर चार साल में ही चेक लग गया। बावजूद इसके दुनिया का सर्वाधिक संपन्न, बुद्धिमना गौरवशाली गणतंत्र अमेरिका कहां जा पहुंचा यह तो जगजाहिर है। ढाई सौ साल पुराने लोकतंत्र-गणतंत्र को डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा विभाजित बनाया कि चार साल की छोटी अवधि में ही  संसद भवन में हमले की, गृहयुद्ध की नौबत आई। सिर्फ चार साल में ढाई सौ साल पुराने संविधान, लोकतंत्र, गणतंत्र का जर्जर, आत्मघाती हकीकत का परिवर्तन!

ऐसा बार-बार होना मानव सभ्यता के इतिहास का पुराना अनुभव है। एक वक्त रोम गणराज्य की पताका और उसका साम्राज्य अभूतपूर्व था। उसी पर दो साल पहले एडवर्ड जे. वाट्स ने “नश्वर गणतंत्रः कैसे रोम दमनकारी बना’ (Mortal Republic: How Rome Fell Into Tyranny- Edward J. Watts) में रोम के लोगों द्वारा अपने ही हाथों अपने गणराज्य के विनाश का जो खुलासा किया तो दुनिया में कई विश्लेषकों ने ट्रंप की समसामयिकता में लिखा कि कहीं अमेरिका उसी रास्ते पर तो नहीं? डोनाल्ड ट्रंप के हाथों अमेरिका का वही हस्र होता लगता है जो ऑगस्टस द्वारा गणराज्य की कमान संभालने के बाद रोम का हुआ था।

रोम राष्ट्र-राज्य सचमुच जनप्रतिनिधि सांसदों की बहस, राजनीति, विचार, सहमति, डायलॉग, संवाद की व्यवस्थाओं में पका जिंदादिल, जीवंत गणतंत्र था। वह गणतंत्र कोई तीन सौ साल बखूबी चला। रोम साम्राज्य दूर-दूर तक फैला। गणतंत्र में राजनीतिक खुन्नस, लड़ाई-हिंसा, जुल्म, जमीनों पर जबरी कब्जे जैसी प्रवृत्तियां लगभग नहीं थीं क्योंकि गणतंत्र बनाने वाले विचारक राजनीतिक नियम-कायदे ऐसे बना गए थे, जिसमें इन सबको अनुचित समझा जाता था। (गुलाम व्यवस्था का मसला अलग है।) रोम के लोगों की इच्छा के विपरीत यदि तंत्र में गड़बड़ी बनती भी थी तो उसे सीनेट में विचार-बहस से सुधारा जाता था। गणतंत्र के पूरे इतिहास में पहली राजनीतिक हत्या ईसा पूर्व सन् 133 में हुई। फिर ईसा पूर्व सन् 80 में धीरे-घीरे राजनीतिक धड़ेबाजी ने कुछ ऐसा रूप लिया कि राजनीतिक हिंसा होने लगी। सन् 44 में सत्ता में वर्चस्व की लड़ाई में सीनेटरों की हत्या हुई। ऑगस्टस के पूर्वज जूलियस सीजर की तभी हत्या हुई थी। मतलब कोई ढाई सौ साल पुराने रोम गणराज्य में पतन की दास्तां तब शुरू हुई जब नेताओं, सीनेटरों में परस्पर ईर्ष्या, धनपतियों के नियम-कानून बनवाने की मनमानी, पैसे के जोर से राजनीति में भटकाव बना।

हद थी जो ईसा पूर्व सन् 59 में काटो के वक्त उनके एक सलाहकार ने पूरा साल धार्मिक छुट्टी का सुझाया ताकि लोगों का ध्यान भटके और लोग भी मान जाएं कि जब भगवान नाराज हैं, पूजा-पाठ का समय है तो चुनाव टले। गणराज्य की निरंतरता में रोमन लोगों में आम भाव था कि सब अच्छा होगा (जैसे ट्रंप को चुनते हुए अमेरिकियों ने सोचा था)। जबकि ट्रंप पहले दिन से मिशन लिए हुए थे कि उन्हें लोगों को बांट कर भक्त बनाम दुश्मन में कनवर्ट करना है। वे यथास्थिति से उबे लोगों में नया मंत्र (अमेरिका की रक्षा, मुसलमान आदि) फूंक व्यवस्था को ट्रंपशाही में बदलने का एजेंडा लिए हुए थे वैसा ही रोम गणराज्य में हुआ था। ऑगस्टस सीजर ने रोम के लोगों को इन बातों से बहकाया था कि चला आ रहा ढर्रा खराब है। मैं कानून का राज बहाल करूंगा। तथ्य है कि पांच साल के राज के बाद ऑगस्टस ने जनता में यही नैरेटिव बनवाया कि मैंने डर और भय से लोगों को मुक्ति दिलाई। (जैसे पाकिस्तानियों, खालिस्तानियों से मुक्ति का अपना हल्ला है) ऑगस्टस गणराज्य के रक्षक के बजाय सम्राट हो गया और वह हर चुनाव जीतता गया। ऑगस्टस विरोधी उम्मीदवार चुनाव में खड़े ही नहीं हो पाते थे। कायदे से चुनाव नहीं लड़ पाते थे।

हां, ऑगस्टस सीजर ने गणतंत्र बचाने के नाम पर अपने आपको डिक्टेटर घोषित कर सीनेट, संसद, संस्थाओं में वफादारों-भक्तों की नियुक्तियां की। सीनेट, कांउसलर याकि संसद-मंत्री सब अप्रासंगिक और सीजर का सीधे जनता से संवाद (ट्विटर आदि से ट्रंप ने जैसे बनाया) के नैरेटिव में जनता को भक्त बनाम विरोधियों के दो हिस्से में बांट अपने आपको भक्तों में महान, रक्षक निरूपित किया। सो, तमाम आपदाओं, हमलों के बावजूद रोम गणराज्य और उसकी संस्थाओं से सुख-समृद्धि-शांति वाले रोम में एक सेनापति-सम्राट ने राजनीति का वह खेल रचा, जिससे लोगों को भान नहीं हो पाया, समझ नहीं बन पाई कि उनके देश का पतन शुरू हो गया है। देश गर्त में जा रहा है। और मोटे तौर पर दो पीढ़ी की अवधि में ही महान् रोम गणराज्य खंडहर में बदल गया, खत्म हो गया।

रोम की कहानी में पतन के वक्त में वह सब था जो आज के भारत में है। सरकार और तंत्र सुरसा की तरह फैले और अव्यस्था-अक्षमता में काम करते हुए तो पैसे और धनपतियों के असर में तमाम सार्वजनिक संस्थाएं भ्रष्ट। सामाजिक और आर्थिक असमानता इतनी भयानक की नागरिकों में सिस्टम के प्रति भरोसा टूटा हुआ लेकिन लफ्फाजों-निरंकुश प्रवृत्ति के नेताओं के जादू में जीवन जीने को शापित!

“नश्वर गणतंत्रः कैसे रोम दमनकारी बना’ के लेखक एडवर्ड जे. वाट्स ने रोम गणराज्य और मौजूदा अमेरिकी गणराज्य व अन्य गणराज्यों (भारत भी) की तुलना पर एक इंटरव्यू में कहा है कि गणतंत्र में जनप्रतिनिधि चुनने, तय करने वाले होते हैं। इसमें तब गणराज्य पटरी से उतरने लगता है, जब जनप्रतिनिधि सिद्दांतसम्मत (making principled decisions) फैसले लेना बंद कर देते हैं और जनमत के मूड में बहकने लगते हैं। ऐसा रोम में हुआ था और अमेरिका में हो रहा है। रोम में लोग भूल बैठे थे कि सिस्टम (गणराज्य-लोकतंत्र) जो बनाया हुआ है उसमें नतीजे समझौते और सर्वानुमति से ही आ सकते हैं। अंततः निर्णय नहीं होना बेहतर है बनिस्पत खराब निर्णय के। रोम के लोग सीजर के वक्त यह सोचते हुए भटके कि प्रोसेस धीमा है। वे यह भूल गए कि ऐसा जान बूझकर बनाया गया है ताकि सोचना-विचारना धीमे-धीमे हो ताकि सही फैसला हो ताकि बरबादी से बचे रहें।

रोम गणराज्य के सोचने-विचारने-बहस-आम सहमति के सिस्टम का जीवन तीन सौ साल रहा। आखिरी सौ सालों में सोच-समझकर फैसले के तरीकों-औजारों पर अमल में कमी आना शुरू हुई। तभी एक नेता ऑगस्टस देश का पर्याय बन बैठा। लोगों ने भी उससे सुरक्षा की गारंटी मान उसके आपाधापी के, मनमाने फैसलों पर सोचा कि यही देश हित में ठीक है। नतीजतन सीजर की राजनीतिक निरंकुशता, महत्वकांक्षा, और परस्पर राजनीतिक दुश्मनी वाले झगड़ों से लोग ऐसे बंटे कि विवेकसम्मत, सही फैसले होने बंद हो गए। गणराज्य को दीमक लगी और मतदाताओं के दिमाग में ऐसा जहर घुसा कि गणतंत्र भीतर-भीतर ही जर्जर हो अतंतः ढह गया।

बकौल एडवर्ड वाट्स रोम गणराज्य के पतन का प्रारंभ बिंदु वह था जब नेताओं ने सोचा कि उनकी निज महत्वाकांक्षा, गणराज्य की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति है। दोनों एक-दूसरे के लिए बने हैं। वे काम कर रहे थे निज हित में लेकिन मतिभ्रम था कि यह रोम की बेहतरी के लिए है। जैसे आज के अमेरिकी नेता (चुनाव के पहले) सोचते हैं कि उन्हें तो बस जीतना है, 51 प्रतिशत वोट चाहिए बाकि 49 प्रतिशत वोटों की चिंता नहीं करो। लेकिन न तो रोम का सिस्टम ऐसी सोच से निर्मित था और न अमेरिका का है। जनप्रतिनिधित्व आधारित गणतंत्र, लोकतंत्र वह डिजाइन लिए हुए होता है, जिसमें शुद्ध लोकतांत्रिक भावनाओं, भभकों को शांत-संतुष्ट करने का मकसद सर्वोपरि है। नेताओं को समस्याओं के समाधान में दीर्घकालीन सोच में नीतियां गढ़ने के वे तरीके प्राप्त होते हैं, जिससे अधिकाधिक लोगों का समर्थन जुड़े।

और यदि ऐसा होना बंद हो जाए, ऐसा न हो तो वह गणराज्य का फिर वह ब्रेकिंग प्वाइंट है, जहां यदि पहुंचे तो फिर देश सामान्य अवस्था में, घड़ी की सुई वापिस पुराने वक्त में नहीं लौटेगी। लोगों की सार्वजनिक संस्थाओं, व्यवस्था में यदि आस्था खो गई तो बहाली याकि आस्था का रिबूट होना संभव नहीं। गणतंत्र का एक बार ढलान शुरू हुआ तो पतन पांच साल में भले न हो, पचास, सत्तर या सौ साल में होगा ही होगा। दिशा यदि एक बार बन गई तो रिवर्स होना असंभव है। हां, न सोचें कि ट्रंप हार गए तो अमेरिकी गणतंत्र खतरे से मुक्त। ट्रंप ने अमेरिकी गणतंत्र में वे बीज डाले हैं जो रोम गणराज्य में सीजर ने डाले थे। गणराज्य रोम का था, या आज अमेरिका का है या भारत का, जहर जब राष्ट्र-राज्य की धमनियों में फैल जाता है तो शरीर कैसे पहले जैसा सामान्य हो सकता है, इस पर जितना सोचेंगे गणतंत्र की उम्र की चिंता बनेगी। क्या नहीं?

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