उफ! फिर एक निर्भया

तेलंगाना के हैदराबाद में 27 साल की पशु चिकित्सक की बलात्कार के बाद जिंदा जलाकर हत्या कर दी गई। महिला का शव एक पुल के नीचे जली हुई हालत में मिला। परिवार ने महिला की पहचान शरीर पर मिले लॉकेट से की। महिला पशु अस्पताल में ड्यूटी के बाद घर लौट रही थीं। खबरों के मुताबिक महिला का परिवार रात 10 बजे के करीब पुलिस के पास गया, लेकिन रिपोर्ट बहुत देर बाद दर्ज की गई। यानी अगर पुलिस तुरंत अलर्ट हो जाती तो महिला को बचाया जा सकता था। इस घटना में जैसी बर्बरता सामने आई है, उसमें लाजिमी ही है कि इस घटना की तुलना निर्भया कांड से की गई है। दिसंबर 2012 में हुए निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले ने देश को हिला डाला था। तब की केंद्र सरकार के खिलाफ उस कांड के बाद जबरदस्त रोष सामने आया था। उस वक्त की मनमोहन सिंह की सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए समर्पित विशेष कोष की स्थापना की। साथ ही जनता के गुस्से को ठंडा करने के मकसद से सरकार ने जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई, जिसने कई कड़े उपायों की सिफारिशें की। जनवरी 2013 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में कमेटी ने पुलिस संख्या, पुलिस सुधारों, आपराधिक मामलों पर दंड व्यवस्था और सामाजिक जागरूकता पर सिफारिशें कीं, लेकिन बलात्कार की घटनाएं रुकी नहीं। बेशक हर ऐसी घटना के बाद पुलिस व्यवस्था कठघरे में खड़ी होती है।

पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह गंभीरता से गश्त लगाए ताकि बच्चियां खास तौर पर सुरक्षा का अहसास कर पाएं। हमारे बच्चे जब काम पर जाएं, तो सुरक्षित घर वापस लौटे यह पुलिस की भी जिम्मेदारी है। तेलंगाना में जो हुआ उसे रोका जा सकता था। लेकिन पुलिस की लचर व्यवस्था के कारण एक बच्ची की इस तरह से मौत हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आकंड़ों के मुताबिक देश भर में 2017 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 3,59,849 मामले दर्ज किए गए। महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार तीसरे साल इजाफा हुआ है। 2015 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 3,29,243 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2016 में 3,38,954 मामले दर्ज हुए थे। महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर सख्त कानून तो है, लेकिन उसका पालन कितना हो पा रहा है, इन आकंड़ों को देख कर ही समझा जा सकता है।

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