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अमेरिकी विदेश नीति का अफगान सच

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US foreign-policy afghan इस्लाम का वहाबी दर्शन मूलत: जिहाद का प्रमुख प्रोत्साहक है, जो विश्व के अधिकांश मदरसों का पाठ्यक्रम भी है। ऐसे मदरसों का सर्वाधिक वित्तपोषण सऊदी अरब द्वारा होता है। आतंकवाद के मुख्य केंद्रों में एक पाकिस्तान की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। उसके सैन्य ठिकाने एबटाबाद में 9/11 आतंकी हमले का षड़यंत्रकर्ता ओसामा बिन लादेन अमेरिकी अभियान में मारा गया था। फिर भी अमेरिका ने दशकों तक आतंकवाद विरोधी संघर्ष में इन दोनों मुस्लिम देशों को साझीदार बनाए रखा।

लगभग दो दशक बाद और 9/11 न्यूयॉर्क आतंकी हमले की 20वीं बरसी से पहले अफगानिस्तान पर तालिबान का फिर कब्जा हो गया है। वह अब पहले से अधिक शक्तिशाली भी है, क्योंकि जो अत्याधुनिक आयुध- हजारों ग्रेनेड, रॉकेट, विस्फोटक सामग्री और आधुनिक टैंक-हेलिकॉप्टर, पहले अमेरिकी संरक्षण में अफगान सेना के पास थे- उसपर भी तालिबानी जिहादियों का नियंत्रण हो गया है। ऐसा क्यों हुआ? इसका सीधा उत्तर- अमेरिका और उसकी विदेश नीति है।  अमेरिका ने अपने इतिहास का सबसे लंबा युद्ध अफगानिस्तान में लड़ा है। बीते दो दशकों में उसके 7,000 से अधिक सैनिक (कॉट्रैक्टर सहित) मारे जाने, युद्ध में 2.26 खरब अमेरिकी डॉलर अर्थात् 160 लाख करोड़ रुपये खर्च करने और अरबों डॉलर की लागत से विकास कार्य करने के बाद अफगानिस्तान में बीते दिनों जो कुछ हुआ, वह स्वयं को विश्व की सबसे बड़ी सामरिक-आर्थिक शक्ति मानने वाले अमेरिका के लिए शर्मनाक है। इसे विशुद्ध विफलता ही कहेंगे कि जिस तालिबान को अफगानिस्तान में अपना पहला नियंत्रण स्थापित करने में 2-3 वर्ष का समय लगा था, उसे अमेरिका की उपस्थिति में वही काम करने में हाल ही में मात्र 103 दिन लगे।

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अमेरिका सहित उसके 40 मित्र देशों (नाटो देश सहित) का लीथियम आदि प्राकृतिक संसाधनों से युक्त अफगानिस्तान में प्रवेश कैसे हुआ- इसका उत्तर सुधी पाठक जानते है। 11 सितंबर 2001 को 15 सऊदी अरब, दो संयुक्त अरब अमीरात और एक-एक मिस्र व लेबनान अर्थात् अल-कायदा के 19 जिहादियों ने अमेरिका में चार वाणिज्यिक यात्री विमानों को हाईजैक करके दो को न्यूयॉर्क की प्रसिद्ध 110 मंजिला वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, तो एक जहाज को पेंटागन से टकरा दिया था। इस भीषण आतंकी हमले में 2,996 लोग (आतंकी सहित) मारे गए थे। जब अमेरिका को सूचना मिली कि हमले का साजिशकर्ता ओसामा बिन लादेन तालिबान की सहायता से अफगानिस्तान की पहाड़ियों में छिपा है, तब उसने हमला करके वहां तालिबानियों को परास्त किया और 20 वर्षों तक डटा रहा।

तब उस कालखंड में अमेरिका ने युद्धग्रस्त अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण हेतु दो मोर्चों पर निवेश किया। पहला था- इस इस्लामी देश में एक उदारवादी लोकतंत्र की स्थापना, तो दूसरा इसे दोबारा आतंकवाद की शरणास्थली नहीं बनने देना। इस दिशा में अमेरिकी संरक्षण में अफगानिस्तान में वर्ष 2001 में अंतरिम सरकार का गठन हुआ, फिर 2014 और 2019 में लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया के बाद सरकार का निर्वाचन हुआ। इसी दौरान अमेरिका ने मई 2002 से लेकर मार्च 2021 तक अफगान सेना-पुलिसबल को सशक्त करने और उसे अत्याधुनिक आयुधों से युक्त करने हेतु 88.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर अर्थात्- 6.5 लाख करोड़ व्यय किए।

जिस प्रकार “3,00,000” संख्याबल वाले “अफगान राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षाबल” (एएनएसएफ) ने 75,000 तालिबानियों के सामने हथियार डाले, उससे स्पष्ट हो गया कि अमेरिका इस भूखंड की वास्तविकता और “काफिर-कुफ्र” चिंतन को समझने में विफल हो गया। अमेरिकी सत्ता-अधिष्ठान ने वर्षों तक दुनिया को संदेश दिया कि एएनएसएफ अपेक्षाकृत तालिबान से बड़ा, बेहतर सुसज्जित और संगठित है। मार्च 2021 के अंत तक भी अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन का प्रशासन इस अभिमान से जकड़ा था कि यदि तालिबान अमेरिकी सैनिकों की वापसी पश्चात दोबारा अफगानिस्तान पर कब्जा जमाने का प्रयास करता भी है, तो तालिबान को उसके द्वारा प्रशिक्षित अफगान सेना को खदेड़ने में कम से कम दो-तीन वर्ष का समय अवश्य लगेगा। किंतु हुआ क्या? चार माह से कम समय में तालिबान का काबुल सहित शत-प्रतिशत अफगानिस्तान पर कब्जा हो गया। अब ऐसा क्यों हुआ?

वास्तव में, एएनएसएफ की क्षमता पर अमेरिका का यह निरर्थक आकलन उस कालखंड पर आधारित था, जब अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की भरमार थी, जिसके बल पर अफगान सेना शक्तिशाली दिख रही थी। अमेरिका किस प्रकार अफगानिस्तान को लेकर कल्पना के भंवर में फंसा रहा, इसकी बानगी उसके रक्षा विभाग द्वारा नियमित रूप से तैयार रिपोर्टों, जिसे संसद में सौंपा जाता था- उसमें देखने को मिल जाती है।

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दिसंबर 2012 में अमेरिकी रक्षा विभाग ने बताया, “अफगानिस्तान में एएनएसएफ का 80 प्रतिशत संचालन अफगानियों के हाथों में है और अनुमानित 3,52,000 सेना-पुलिसबल में भर्ती हेतु स्थानीय नागरिकों ने पर्याप्त आवेदन किया है।” इसी तरह नवंबर 2013 की रिपोर्ट में अफगान सेना को लेकर दावा किया गया कि “दुनिया में सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षित और सुसज्जित अफगान सुरक्षाबल अब सफलतापूर्वक अपने लोगों को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं और अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं, जो 50 देशों के गठबंधन द्वारा प्राप्त सफलता को बरकरार रख सकते है।” 2014 के बाद 2017 में भी अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया, “एएनएसएफ प्रमुख केंद्रों की रक्षा करने और तालिबानी हमलों का उचित जवाब देने में सक्षम है।”

अमेरिका इस छलावे से बाहर तब आया, जब वर्ष 2017 डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति बने और अफगान सैनिकों की वास्तविक स्थिति का खुलासा हुआ। वर्ष 2019-20 की रिपोर्ट में बताया गया कि दसियों हजार “आभासी अफगान सैनिक” अर्थात्- जो कभी सेना का हिस्सा ही नहीं थे- उन्हें पेंटागन द्वारा वर्षों से वेतन दिया जा रहा था। इस संबंध में “अफगानिस्तान पुनर्निर्माण विशेष महानिरीक्षक (एसआईजीएआर)” ने पाया कि वर्षों से भ्रष्टाचार, पैसों के गबन, संसाधनों की बर्बादी, धोखाधड़ी और कुप्रबंधन ने एएनएसएफ की क्षमता को घटा दिया है। यही नहीं, चार करोड़ की आबादी वाले अफगानिस्तान के इस्लामी “इको-सिस्टम” में लोकतंत्र का फूल कैसे मर रहा था, यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि 2014 के चुनाव में जहां 70 लाख लोगों ने वोट दिया था, वही 2019 के निर्वाचन में मतदाताओं का आंकड़ा घटकर केवल 18 लाख हो गया।

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यह स्थिति तब और बिगड़ गई, जब अमेरिका ने अपनी विदेश नीति की विफलता को छिपाने और वैश्विक किरकिरी से बचने हेतु अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी संबंधी घोषणा कर दी और दोहा में फरवरी 2020 में तालिबान से “उसपर हमला नहीं करने की शर्त पर” समझौता कर लिया। ऐसे में एएनएसएफ के सभी भुगतानों का दायित्व सीधा शक्तिहीन अफगान सरकार पर आ गया। तब उसके सैनिकों को ना तो मासिक वेतन समय से मिला और ना ही पर्याप्त भोजन व गोला-बारूद।

यह ठीक है कि अमेरिकी सत्ता अधिष्ठान दुनिया को अफगान सेना की क्षमता को लेकर भ्रमित करता रहा, किंतु क्या इस संभावना से इनकार किया जा सकता है कि शत-प्रतिशत मुसलमानों से भरे एएनएसएफ द्वारा तालिबान के समक्ष आत्मसमर्पण के पीछे अफगानिस्तान के इस्लामी चरित्र ने निर्णायक भूमिका निभाई है? क्या यह सत्य नहीं कि अक्टूबर 1947 में जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया था, तब रियासत के अधिकांश मुस्लिम सैनिक-अधिकारी इस्लाम के नाम पर शत्रुओं से जा मिले थे? सच तो यह है कि भारत उपमहाद्वीप सहित शेष विश्व में मुस्लिम समुदाय का बड़ा वर्ग खुलकर तालिबान का समर्थन इसलिए कर रहा है, क्योंकि वह लोकतंत्र-बहुलतावाद विरोधी और विशुद्ध शरीयत आधारित इस्लामी व्यवस्था का पैरोकार है।

इस्लाम का वहाबी दर्शन मूलत: जिहाद का प्रमुख प्रोत्साहक है, जो विश्व के अधिकांश मदरसों का पाठ्यक्रम भी है। ऐसे मदरसों का सर्वाधिक वित्तपोषण सऊदी अरब द्वारा होता है। आतंकवाद के मुख्य केंद्रों में एक पाकिस्तान की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। उसके सैन्य ठिकाने एबटाबाद में 9/11 आतंकी हमले का षड़यंत्रकर्ता ओसामा बिन लादेन अमेरिकी अभियान में मारा गया था। फिर भी अमेरिका ने दशकों तक आतंकवाद विरोधी संघर्ष में इन दोनों मुस्लिम देशों को साझीदार बनाए रखा। इसी वर्ष 29 जून को पाकिस्तानी आंतरिक मंत्री शेख राशिद अहमद ने स्वीकार किया था कि कई तालिबानी अपने परिवार के साथ इस्लामाबाद के उपनगरों में रहते है।

सच तो है कि “अच्छा-बुरा तालिबान” और “आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता” जैसे विकृत सिद्धांतों ने आतंकवाद या मजहबी हिंसा विरोधी वैश्विक संघर्ष को दशकों से अर्थहीन बनाए रखा है। यह चिंतन आज भी अपरिवर्तित है। जहां चीन-रुस रूपी वैश्विक शक्तियां तालिबान के साथ सशर्त मैत्रिपूर्ण संबंध का पक्षधर है, वही भारत सहित शेष विश्व का वाम-जिहादी कुनबा- अफगानिस्तान पर फिर कब्जा जमाने वाले तालिबानियों को इस बार “स्वतंत्रता सेनानी”, “अतिवाद मुक्त”, “प्रेस-कॉन्फ्रेंस करने वाला” और “बिना गोली चलाए सत्ता हथियाने वाला” बताकर लोकतंत्र-बहुलतावाद विरोधी “काफिर-कुफ्र” अवधारणा का समर्थन कर रहा है। विडंबना है कि इस स्थिति के लिए अमेरिका की स्वार्थी विदेशी-नीति सर्वाधिक उत्तरदायी है।

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