भारत और अमेरिका का फर्क!

भारत के हम लोग फर्क को क्या बूझ सकते हैं? नहीं। और जैसे हम लोग नहीं समझ सकते कि अमेरिका का लोकतंत्र कैसे अलग है वैसे रूस, चीन, इस्लामी देश, तानाशाह देश भी नहीं बूझ सकते हैं। जरा सोचें और याद करें कि अमेरिका में मतगणना शुरू हुई तो उसके बाद भारत में हिंदी-अंग्रेजी चैनलों ने क्या दिखाया, विश्लेषकों ने क्या समझाया तो मोटा निष्कर्ष अपने दिमाग में भी वहीं उतरा हुआ होगा जो रूस और चीन के लोगो में उतरा हुआ है। हिंदी के टीवी चैनल और रूस का आरटी टीवी चैनल लगभग एक जैसी फुटेज, एक जैसा हल्ला करते मिले हैं। मतलब देखो, अमेरिका के शहरों में ट्रंप बनाम बाइडेन समर्थक भिड़ गए हैं। देखो वहां वोटों की धांधली हो रही है, ये ट्रंप केवोट जल रहे हैं। हमारे वैदिकजी जैसे विश्लेषकों ने लिखा कि, जो हालत इस चुनाव में अमेरिकी लोकतंत्र की हुई है, वैसी दुनिया के किसी लोकतंत्र की नहीं हुई। अमेरिका अपने आप को दुनिया का सबसे महान लोकतंत्र कहता है लेकिन उसकी चुनाव पद्धति इतनी विचित्र है कि किसी उम्मीदवार को जनता के सबसे ज्यादा वोट मिलें, वह भी उस उम्मीदवार से हार जाता है, जिसे ‘इलेक्टोरल वोट’ ज्यादा मिलते हैं। फिर उनका सुझाव था कि वहां भी भारत की तरह कोई चुनाव आयोग हो जो पूरे देश में एकरुप चुनाव करवाए। मतलब रूस, चीन और भारत की बुद्धि-दिमाग में एक तरह से सोचना है कि अमेरिका का यह कैसा लोकतंत्र, जहां इतना धमाल होता है। वोटों की गिनती में इतनी देरी लगती है। कोर्ट-कचहरी तक चुनाव का फैसला पहुंचता है। इतने दिन लगते हैं और इतने झमेले हैं। लेकिन इन्हीं बातों से अमेरिका जिंदादिल लोकतंत्र है और भारत, रूस, चीन मुर्दा कौम के नकली या मुर्दा लोकतंत्र हैं।

हां, अमेरिका का लोकतंत्र मास्को, बीजिंग और दिल्ली के गिने-चुने हजार मंत्रियों-अफसरों के हाकिमों, केंद्रीकृत संस्थाओं से चलता हुआ नहीं है। वहां लोकतंत्र हर एक अमेरिकी नागरिक की लोकल पंचायत, काउंटी से बना हुआ है। तभी अमेरिका सबसे संपन्न और बिरला इसलिए है क्योंकि एक-एक नागरिक वहां सार्वभौम है। वह अपनी रक्षा के लिए हथियार रखने का अधिकार लिए हुए है तो ऐसे ही उसके हर काम के लिए स्थानीय पंचायत, काउंटी, जिले का प्रशासन व्यवस्था ही जवाबदेह है। वाशिंगटन में कोई ऐसी संस्था याकि केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, प्रेस कौंसिल, योजना आयोग नहीं है, जो डिक्टेट करे प्रदेश सरकार को, जिला प्रशासन, काउंटी को कि यह फलां आदेश है और उस अनुसार चुनाव कराओ और पालना करो!

अमेरिका में लोकतंत्र, चुनाव, राजनीति ऐसे नहीं चलती। वहां पंचायत याकि जिला-काउंटी की व्यवस्था को वे सब अधिकार मिले हुए हैं, जिनमें प्रदेश संसद के पारित कानूनों में अपने नियम-कायदे बनाने का अधिकार है। अमेरिका में कोई सपने में नहीं सोचेगा कि भारत की तरह एक चुनाव आयोग हो और वहां के अफसर अपनी मनमानी से पूरे देश में लोकतंत्र-राजनीति में वह दादागिरी बनाएं कि कैसे चुनाव लड़ना है, कैसे प्रचार करना है और बिना शोरगुल के प्रचार हो। अमेरिका के सभी 50राज्य अपने-अपने कानून बनाते है और उसके दायरे में फिर काउंटी तय करती है कि चुनाव कैसे आयोजित हो। महामारी, वायरस का अभी संकट आया तो राज्यों ने भीड़ घटाने के लिए व्यवस्थाएं की। लोकल जनप्रतिनिधियों ने अपनी लोकल स्थिति, स्थानीय समझ में फैसले किए। तभी अलग-अलग नियमों में चुनाव हुए है। डाक से वोट डालने की अलग-अलग अवधि तय हुई तो जहां वोट का रजिस्ट्रेशन है और वहां से नागरिक बाहर हैं तो उसके लिए अनुपस्थिति की वोटिंग की अलग व्यवस्था और मतदान की तारीख पर मतदान केंद्र में जा कर वोट डालने की व्यवस्था, या सड़क किनारे ड्राइव-इन वोटिंग की अलग व्यवस्था जैसी वह हर सुविधा काउंटी ने कराई है, जिससे नागरिक की सहूलियत में वोट गिरे। भारत जैसी मूर्खतापूर्ण व्यवस्था नहीं कि महामारी है तब भी सभी को एक दिन लाइन में लग कर ही वोट डालना होगा। मतलब है कि अमेरिका की लोकल बॉडी ने ( कोई दस हजार काउंटी) अपने इलाके के मतदाताओं के विचार, सुविधा, चिंता को समझ कर मतदान की व्यवस्था बनाई। इसमें भी लोगों ने कहा कि तीन नवंबर यदि मतदान दिन है तो उस दिन तक मिले डाक से आए वोट मान्य होंगे तो कुछ जिलों में तर्क हुआ कि तीन तारीख को डाक मुहर में डाक वोट भेजा गया वह पांच दिन बाद पहुंचे तो मान्य होगा। डाक वोट यदि चार-पांच-सात दिन बाद आता है तो उसकी भी गणना होगी।

आप और हम सोचेंगे यह क्या अराजकता। लेकिन ढाई सौ साल पहले अमेरिका के संविधान निर्माताओं ने नागरिक की इच्छा व नागिरक को सर्वोपरि मान लोकल काउंटी, पंचायत की जनभावना, जन अधिकार से जो व्यवस्था बनाई तो उसे वाशिंगटन का राष्ट्रपति, उसका प्रशासन, संसद नहीं बदल सकता है। संघीय व्यवस्था में जिला पंचायत, राज्य सरकार द्वारा लोकतंत्र की व्यवस्था सोचना, उसे बनाना वहा अनिवार्यता है और ऐसी ही खूबियों से अमेरिका ने बतौर जिंदादिल लोकतंत्र की तासीर बनाई तथा वह वैश्विक शिखर बना।

अमेरिका में जनता पहले है, बाद में सरकार, हाकिम, प्रशासन है। चुनाव वहां सरकारी बाबू नहीं करवाते हैं, बल्कि पंचायत-तहसील में नागरिक स्वंयसेवकों से मतगणना और बूथ संचालन है। नागरिक स्वंयसेवक पार्टी का भी कार्यकर्ता हो सकता है लेकिन अब तक के रिकार्ड में ऐसा सुनने को कभी नहीं मिला कि मतगणना करते हुए अपनी पार्टी के लिए कोई वॉलियंटर धांधली करता हो। यह जान लें कि काउंटी, प्रदेश को ही अधिकार है जो वे नतीजा घोषित करें। अभी कई जगह ट्रंप टीम ने लोकल अदालत में अपील की है तो तुंरत लोकल जज ने निर्णय भी किया। देरी होगी, टाइम लगना चाहिए यह सोचते हुए ही अमेरिका के निर्माताओं ने तीन नवंबर के मतदान के ढाई महीने बाद याकि 20 जनवरी को राष्ट्रपति की शपथ तय कराई हुई है।

बात लंबी हो रही है। मूल बात है कि अमेरिका में नीचे से ऊपर की ओर व्यवस्था है। जनता को सबका फैसला एक साथ (राष्ट्रपति, गर्वनर, दोनों संसद के सांसदों) करने का मौका मिलता है। प्रक्रिया लंबी भले हो लेकिन वह लोकल पंचायत-काउंटी की व्यवस्था से है। अमेरिकी राष्ट्रपति (जैसे अभी ट्रंप) कितना ही चिल्लाएं लेकिन वह जॉर्जिया प्रदेश में अपनी पार्टी के गवर्नर या सेक्रेटरी को फोन करके धमका नहीं सकता कि मेरे विरोधी बाइडेन की कुछ सौ वोटों की बढ़त क्यों बता रहे हो या उसे हरा दो और मुझे जीता दो! ट्रंप के अभी भन्नाए हुए होने का मुख्य कारण यह है कि राज्यों ने, जिला पंचायतों ने वायरस की व्यवस्था में पोस्टल बैलेट को स्वीकारने के अलग-अलग (लोकल सोच में) नियम बनाए हैं। कुछ राज्य 12 नवंबर तक वोट स्वीकार करेंगे तो कुछ ने शुक्रवार की तारीख तय की और सेना या अनुपस्थिति वाले वोटों को ले कर अलग तारीख है।

मूल बात है भाड़ में जाए राष्ट्रपति और उसका प्रशासन, केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों, हम नागरिक लोकतंत्र, उसकी राजनीति, उसके चुनाव, और लोकल प्रशासन को अपने हिसाब से संचालित करेंगे। किसी राष्ट्रपति, किसी गवर्नर (मुख्यमंत्री), लोकल एमपी-एमएल-अफसर-कलक्टर-एसपी से डिक्टेट होना जरूरी नहीं। यह सत्व-तत्व और वह मूल बात है, जिसकी रूस-चीन-भारत के लोकतंत्र में कल्पना भी नहीं हो सकती है। चुनाव सब जगह होते हैं लेकिन लोगों द्वारा, लोगों के लिए, लोगों के खातिर की बेबाकी, निर्भरता, निडरता में चेक-बैलेंस के साथ अमेरिकी संविधान ने जो रचा है वह सचमुच जिंदादिल कौम का जिंदादिल लोकतंत्र है। तभी अमेरिका नंबर एक देश हुआ।

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