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तूफान तो आते ही रहेंगे!

जब समस्या पता है, तो उसको लेकर कितनी जागरूकता पैदा गई है? आखिर उससे ही वो राह निकलेगी, जो समाधान की तरफ ले जाएगी। पश्चिम में आज जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता का ऊंचा स्तर नजर आता है। लेकिन भारत में यह कोई समस्या भी है, इसका भान आम लोगों को नहीं है।

कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने एक कार्ययोजना तैयार की थी। उसमें कहा गया था कि 2021 से 2050 के दौरान समुद्र के तापमान में 1.8 से 2.4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। इसके कारण चक्रवाती तूफान का सिलसिला तेज होगा। साथ ही समुद्र के जलस्तर में लगातार वृद्धि होगी। समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ने वर्ष 2100 तक सुंदरबन का पूरा इलाका समुद्र में डूब जाएगा। जलवायु विशेषज्ञों ने समस्या की सही पड़ताल बताया था। लेकिन समस्या को समझना एक बात है, और उसका समाधान करना बिल्कुल दूसरी बात है। यह बिल्कुल ठीक है कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्या का समाधान पश्चिम बंगाल जैसे किसी एक राज्य के हाथ में नहीं है। असल में यह किसी एक देश के वश में भी नहीं है। लेकिन असल मुद्दा है कि जब समस्या पता है, तो उसको लेकर जनता में कितनी जागरूकता पैदा गई है। आखिर उससे ही वो राह निकलेगी, जो समाधान की तरफ ले जाएगी। पश्चिमी देशों में आज जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता का ऊंचा स्तर नजर आता है। लेकिन भारत में यह कोई समस्या भी है, इसका भान आम लोगों को नहीं है। जबकि कठिन स्थितियां सामने हैं। मसलन, विशेषज्ञों के मुताबिक अरब सागर कभी ठंडा हुआ करता था, लेकिन अब यह एक गर्म पानी का कुंड बन गया है। इस वजह से चक्रवाती तूफानों के लिए स्थिति गहराती जा रही है।

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उष्णकटिबंधीय तूफान गर्म पानी से अपनी ऊर्जा खींचते हैं। यही वजह है कि वे गर्म पानी के ऐसे क्षेत्रों में बनते हैं, जहां तापमान 28 डिग्री सेल्सियस से ऊपर होता है। बंगाल की खाड़ी पर पैदा होने वाले ऐसे तूफान जलवायु परिवर्तन की ठोस मिसाल हैं। आम तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में पानी का तापमान दुनिया के बाकी हिस्सों के मुकाबले ज्यादा है। समुद्री जल का तापमान 28 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर होने पर ऐसे तूफान पैदा होते हैं। जबकि बंगाल की खाड़ी में यह तापमान 30 से 32 डिग्री सेल्सियस के बीच है। इसलिए यहां तूफानों की संख्या बढ़ी है। सिर्फ बीते एक साल के दौरान यहां चार भयावह चक्रवाती तूफान आ चुके हैं। जलवायु परिवर्तन का कारण ग्लोबल वार्मिंग है। ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए कोयले को बड़ा दोषी माना जाता है। अब गौर करेः भारत में कोयला आधारित ताप बिजली घर प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोत हुए हैं। दुखद यह है कि भारत सरकार इन्हें सीमित करने के प्रति बिल्कुल संवेदनशील नजर नहीं आती।

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