कोविड के बाद की खौफभरी दुनिया

कोविड के बाद की दुनिया कैसी होगी? जिस तरह की नई वैश्विक व्यवस्था सामने आएगी, उसमें जिंदगी कैसी होगी, हम कैसा महसूस करेंगे? ये सन् 2020 के ऐसे बुनियादी सवाल हैं जो ह सबको हैरान-परेशान किए हुए हैं। राजनीतिक पंडित और विश्लेषक, शिक्षाविद, प्राध्यापक, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ, बुद्धिजीवी सब अपने –अपने कयास लगा रहे हैं, अपने-अपने सिद्धांत दे रहे हैं, ताकि महामारी को हराने या इसके खत्म होने (इनमें से जो पहले हो सके) के बाद की नई वैश्विक व्यवस्था की तस्वीर साफ बने और समझ बनाई जा सके।

निसंदेह आप और मुझ जैसे कइयों के लिए दुनिया बदल चुकी है। सामान्य जीवन असामान्य सा लगता है और नया सामान्य एक तरह के खौफ और अनिवार्यता का अहसास करा रहा है। इसका नतीजा यह सामने आने लगा है कि हमारा ज्यादातर वक्त आशावादी होने के बजाय निराशा में जाया हो जा रहा है। समझ में नहीँ आ रहा कि क्या होगा, क्या करें? इसलिए बार-बार यह सवाल मन में उठता है कि महामारी के बाद की दुनिया कैसा रूप लेगी, हमारे नेता कैसे होंगे, क्या करेंगे, क्या उनमें निरंकुशता और तानाशाह जैसा व्यवहार देखने को नहीं मिलेगा? क्या दुनिया के ये नेता और करीब आएंगे या फिर इनके बीच खाई और बढ़ती जाएगी?

हां हकीकत है कि कोविड के पहले का वक्त भी ऐसा खुशनुमा नहीं था जिसे मजे से, आसानी से हम अपना जीना बता सकें। आखिर अमेरिका और चीन जिस तरह से एक दूसरे के सामने आ गए थे, उससे तो माना जाने लगा था कि वापिस शीत युद्ध की तैयारी हो चुकी है। ईरान दुनिया का दुश्मन बन चुका था। वह एक ऐसा खतरा हो चुका था जिसे कम किए जाने की जरूरत थी। रूस तो एकदम हेंकड़ीबाज और नफरती बन गया था। ब्रिटेन अभी तक बोरिस जॉनसन और और ब्रेक्जिट को समझने में में ही उलझा पड़ा है।

उधर यूरोप अपने आपमें खोया हुआ। उसने इस तरह का आडंबरपूर्ण बर्ताव शुरू किया मानों यूरोपीय लोगों के अलावा कुछ है ही नहीं, वही अपने में सर्वेसर्वा हैं और उन्हें किसी की जरूरत नहीं है। अफ्रीका अभी तक भी पिछड़ा महाद्वीप बना हुआ था। एशिया उभरता हुए विकासशील महाद्वीप तो है लेकिन समस्या यह है कि पड़ोसी देशों के बीच तनाव उभर रहे हैं। भारत अपने दो पड़ोसी राष्ट्रों चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध जैसे हालात से जूझ रहा है। उधर, चीन से आजादी के लिए हांगकांग की जनता संघर्ष कर रही है। मध्यपूर्व की बात करें तो खाड़ी देश भी बंटे हुए हैं, अमीर और बर्बादी के खेमे में।

जलवायु संकट अलग दुनिया के सामने एक बड़े और गंभीर संकट के रूप में उभरा हुआ है। भंयकर बाढ़ों ने कई शहरों को तबाह कर डाला, जंगलों में लगने वाली आग से भारी तबाही हुई। उद्योगों को देखें तो कारखानों से निकलने वाली जहरीली गैसों ने मानव जाति को बड़े खतरे में डाला हुआ है। फिर अब यह सब वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकट से पैंडिग हो गए है।

दुनिया का एक संकट हाल के सालों में डोनाल्ड ट्रंप, जेर बोलसोनारो, विक्टर ऑर्बन, रॉड्रिगो दुतेर्ते, नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं का उभरना है। इन नेताओं ने लोकलुभावनवाद को बढ़ावा दिया है। और लोकलुभावनवाद ने बदले में राष्ट्रीयता की भावना को उफान दिया जो कि उदारवादी विश्व पर सीधा हमला था। इस तरह देश आंतरिक रूप से बदलते गए और पड़ोसी देशों और सहयोगियों के बीच तनाव जन्म लेता गया। ऐसी विकट अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय संस्थान मूक दर्शक से ज्यादा कुछ नहीं रह गए और वैश्विक व्यवस्था में उनकी भूमिका एक तरह से सीमित रह गई। जाहिर है, विश्व व्यवस्था वायरस के संकट से पहले ही गंभीर समस्याएं लिए थी।

लेकिन कोविड ने उभरते तनावों, हालातों, वास्तविकताओं पर अचानक से पूर्णविराम लगा दिया। थोड़े वक्त के लिए, सारी दुनिया के देश एक साथ आ गए और एकजुट होकर कोरोना महामारी को हराने का संकल्प लिए है। सबकी चिंता एक है सब एक लक्ष्य लिए हुए है।लेकिन दुनिया ऐसी खुशनसीब जगह है नहीं, सब एक सरोकार, चिंता में है तो थोड़े वक्त के लिए ही सही लोग एकजुटता का व्यवहार बनाए।

जिन देशों में लॉकडाउन खत्म हुआ, हालात काबू में आए उन देशों में फिर से अशांति बढ़ने लगी है। पुराने विवादों ने फिर से तनाव पैदा शुरू करना कर दिया है। कई देशों के लोकलुभावनवादी नेताओं ने कोविड के संकट को अवसर को रूप में देखना शुरू किया और इसकी आड़ में राष्ट्रवाद और विदेशी नफरत का ज्वार पैदा करने में लग गए। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर स्टीफन वाल्ट कहते हैं-  “महामारी देश को भीतर से मजबूत बनाएगी और राष्ट्रवाद को प्रबल करेगी। संकटों से निपटने के लिए सभी सरकारें आपात कदम उठाएंगी और संकट खत्म हो जाने के बाद कई सरकारें इन नई शक्तियों से नफरत करने लगेंगी।” हंगरी में यह हो भी चुका है, सरकार के बारे में झूठा प्रचार करने या सूचनाएं फैलाने वालों या बाधा पैदा करने वालों को पांच साल की जेल की सजा का प्रावधान कर दिया गया है।  फिलीपीन में राष्ट्रपति दुतेर्ते ने कोविड संकट से निपटने के लिए विशेष अस्थायी प्रावधानों को लागू कर दिया है। अल सल्वाडोर, उगांडा, मिस्र जैसे देशों ने भी ऐसे ही कदम उठाए हैं। कोविड मामलों की बढ़ती संख्या के बीच राजनीतिक हालात से निपटने के लिए अगर भारत में भी ऐसा ही हो जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

इसीलिए ‘द फॉरेन अफेयर्स’ में ‘द पेंडेमिक एंड पॉलिटिकल ऑर्डर’ लेख में फ्रांसिस फुकुयामा ने चेतावनी देते हुए लिखा है कि- तेजी से उभरते राष्ट्रवाद की वजह से अंतरराष्ट्रीय विवाद बढ़ेंगे। ऐसे में नेता विदेशियों के खिलाफ संघर्ष को घरेलू राजनीति में उपयोगी समझते है, वे इस्तेमाल कर सकते हैं और वे महामारी की आड़ में अपने राजनीतिक विरोधियों की कमजोरियों का फायदा उठाने, विरोधियों को निपटाने में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, और नए तथ्य गढ़ने की कोशिश कर सकते हैं। फिर भी, दुनिया की करीब सभी बड़ी ताकतें, जो एक ही तरह की चुनौतियों का सामना कर रही हैं और एटमी हथियारों की ताकत को मजदबूत बनाती जा रही हैं, उनके लिए अंतरराष्ट्रीय अशांति से ज्यादा घरेलू अशांति बड़ी समस्या बनी हुई है।”

कोविड के बाद के काल में शक्ति संतुलन पूर्व की ओर होगा। कोरोना वायरस के जनक माने जाने वाले चीन ने न सिर्फ महामारी के फैलाव पर काबू पाने में कामयाबी हासिल कर ली है, बल्कि उसने अपनी अर्थव्यवस्था को भी संभाल लिया है और इस तरह अंतरराष्ट्रीय पटल पर इसकी भूमिका बढ़ी है और वह अमेरिकी वर्चस्व के लिए वैश्विक खतरा साबित हो रहा है। निसंदेह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब शीर्ष पर नहीं रह गए हैं, दुनिया में अमेरिका के सबसे ताकतवर होने का भ्रम टूट चुका है और अमेरिका अपने बचाव के लिए जूझ रहा है। यह बहुत ही दुख और गंभीर चिंता का विषय है कि अपनी सारी ताकत झोंक देने के बाद भी अमेरिका कोविड को फैलने से रोक नहीं पा रहा है। अगर ट्रंप हार भी गए तो नए अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए अमेरिका की प्रतिष्ठा और गौरव को फिर हासिल कर पाना आसान नहीं होगा। विदेशी मामलों की अमेरिकी कांउसिल की प्रतिनिधि मीरा रैप हूपर का मानना है- ऐसे में चीन संकट को एक अवसर के रूप में ले सकता है और वैश्विक शासन के लिए अपने मनमाफिक नए नियम तैयार कर सकता है। और अगर ऐसा हुआ तो नई वैश्विक व्यवस्था के लिए बहुत ही खौफनाक होगा।

तब ऐसी नई विश्व व्यवस्था में छोटे और गरीब देश निरंकुश नेतृत्व के हाथों में चले जाएंगे और वहां जन असंतोष और उग्र रूप धारण करने लगेगा। छोटे देशों में तो पहले ही महामारी का तेजी से फैलाव चिंता का कारण है। जो देश चरमराई स्वास्थ्य सेवा ढांचे को ढो रहे हैं और भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे हैं, वहां हालात और डरावने व नियंत्रण से बाहर होंगे।

फॉरेन अफेयर्स, इकॉनोमिस्ट के संपादकों फ्रांसिस फुकुयामा और स्टीफन हाल्ट से लेकर अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसरों और अध्येताओं सभी ने कोविड के बाद की बदलती वैश्विक तस्वीर को लेकर बहुत ही चिंता और निराशा जताई है। जो हमारा वैश्विक गांव था, वह कोविड के बाद और ज्यादा खांचों में बंटा, प्रतिबंधित विश्व में तब्दील हो जाएगा, जिसमें आवाजाही भी काफी सीमित होगी और खुशहाली के लाले पड़ने लगेंगे। इसलिए तब फुकुयामा यह निष्कर्ष सही साबित होता दिखेगा कि किसी को भी बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं पालनी चाहिए, क्योंकि दुनिया गहरी निराशा की ओर बढ़ती जा रही है।

One thought on “कोविड के बाद की खौफभरी दुनिया

  1. Very true but horrible truth of this world. Democratic n liberal institution’s now dead. All type of reforms are become irrelevant. Loot n gun culture is on practice. Rajasthan govt hijacking trial is best example for dictatorship Rule. Congrress many time misuse of power but after all space was open for opponents, now feel ing that democratic path is very narrow

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