प्रगतिशील और मानवीय निर्णय

किन्नर समुदाय के लोग समाज में सबसे ज्यादा उपेक्षित, अपमानित और पीड़ित हैं, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। इसको देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार का ताजा फैसला सराहनीय है। उत्तर प्रदेश में एक नए कानून के तहत किन्नर समुदाय के लोगों को पैतृक खेतिहर जमीन पर हक मिलेगा। योगी आदित्यनाथ कैबिनेट ने पिछले दिनों उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता (संशोधन) विधेयक, 2020 को मंजूरी दी। ये बिल दोनों सदनों से पारित हो चुका है। उसके बाद किन्नर बच्चे को भी पैतृक खेतिहर भूमि पर हक मिलेगा। संशोधित विधेयक में किन्नर संतान के भी पैतृक खेतिहर जमीन पर अधिकार की परिभाषा को स्पष्ट कर दिया गया है। इससे पहले तक प्रदेश में पैतृक कृषि भूमि पर सिर्फ बेटा, बेटी, विवाहित-अविवाहित पुत्री और विधवा को ही संपत्ति में अधिकार मिलता आया था। अब राज्य सरकार ने पुत्र और पुत्रियों के साथ ही थर्ड जेंडर संतानों को भी पारिवारिक सदस्य माना है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले के तहत किन्नरों को तीसरे लिंग श्रेणी का दर्जा दिया था।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सरकार किन्नरों को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा समुदाय माने और उन्हें नौकरी और शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण दिया जाए। साथ ही कोर्ट ने केंद्र और प्रदेश की सरकारों से इस समुदाय से आने वाले किन्नरों को अलग-अलग कल्याणकारी योजनाओं में शामिल करने को कहा था। मगर इस फैसले को छह साल हो गए हैं लेकिन किन्नरों की स्थिति कुछ खास नहीं बदली है। 2011 की जनगणना के मुताबिक देशभर में किन्नरों की संख्या करीब 20 लाख है। यह समाज हमेशा से ही मुख्य धारा से कटा हुआ रहता है और कई बार इनके साथ यौन शोषण और भेदभाव के गंभीर मामले भी सामने आ चुके हैं। यह अफसोसनाक है कि 21वीं सदी के भारत में भी किन्नरों के साथ भेदभाव हो रहा है और वे अवसरों से वंचित हैं। कोरोना वायरस के कारण भी किन्नरों का जीवन प्रभावित हुआ है और उन तक सरकारी सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं। यह अच्छी बात है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने थर्ड जेंडर समुदाय के लोगों से जुड़ी हुई नीतियां, कानून, कार्यक्रम और परियोजना बनाने के लिए राष्ट्रीय परिषद का गठन किया है। इसका मकसद समुदाय से जुड़े लोगों को बराबरी और समाज में मान्यता दिलाना है। यह हुआ, तो उससे भारत एक अधिक मानवीय समाज बन सकेगा।

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