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देश की ये दिशा!

Maharashtra politics MNS Shivsena

लेकिन सवाल घूम-फिर कर उठेगा कि क्या ऐसा होने के बावजूद भारत को एक देश समझा जा सकता है, जहां सारे मसले कानून और कोर्ट से तय होते हैं? अगर इससे अलग धारणा बनती है, तो क्या यह देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिए अच्छी बात है?

गौर कीजिएः 288 सदस्यों वाली विधानसभा में एमएनएस के पास सिर्फ एक सीट है। लेकिन उसके नेता राज ठाकरे ने जिद पकड़ी कि वे अब मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर अजान नहीं होने देंगे। एमएनएस ने मांग की कि शोर की सीमा को लागू कराया जाए। लेकिन राज ठाकरे सिर्फ मांग करने तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने मसले को अपने हाथ में लिया। जिस समय देश में मुस्लिम समुदाय खुद को घिरा महसूस कर रहा है, उसे अपनी बुनियादी सुरक्षाएं खतरे में दिख रही हैं, उस समय ऐसे अभियान का मतलब समझा जा सकता है। तो मुसलमानों ने बखेड़ा बढ़ाने के बजाय इस मांग को मान लेने में ही अपनी भलाई समझी है। उन्हें मालूम है कि राज ठाकरे की पार्टी के पास भले विधानसभा में सिर्फ एक सीट हो, लेकिन वे ठाकरे ने जो अभियान छेड़ा है, उसके पीछे देश का पूरा सत्ता तंत्र है। ऐसे में महाराष्ट्र सरकार अगर चाहे भी, तब भी वह उनकी ज्यादा मदद नहीं कर सकती।

जाहिर है, बहुत से लोग राज ठाकरे के इस कदम और आह्वान को हाल के सालों में मुसलमानों की धार्मिक आजादी पर हुए हमलों की ही एक कड़ी के रूप में देखते हैं। ठाकरे का यह आह्वान रमजान के दिनों में किया गया। ईद के दौरान मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में यह बड़ा मुद्दा बना रहा। वैसे भी महाराष्ट्र में सांप्रदायिक दंगों का इतिहास रहा है। वैसे में मुस्लिम समुदाय में यह इच्छा लाजिमी है कि वैसा इतिहास ना दोहराया जाए। महाराष्ट्र में करीब सात करोड़ हिंदू और एक करोड़ मुसलमान रहते हैं। देश भर में लगभग यही अनुपात है। तो मुसलमानों से ऐसी बातें मनवा लेना कोई बड़ी जीत नहीं है। लेकिन सवाल घूम-फिर कर उठेगा कि क्या ऐसा होने के बावजूद भारत को एक देश समझा जा सकता है, जहां सारे मसले कानून और कोर्ट से तय होते हैं? अगर इससे अलग धारणा बनती है, तो क्या यह देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिए अच्छी बात है? यह जरूर ध्यान में रखना चाहिए कि भविष्य का सवाल सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं है। उसका हिंदुओं से भी उतना ही संबंध है।

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