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Saturday, April 17, 2021
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अवसाद का वक्त और बख्शीजी की याद

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पहले मैंने ‘डिप्रेशन’ व ‘अवसाद’ शब्द ही सुने थे पर उनकी यह अनूभुति, यह महसूस नहीं हुआ कि जब आदमी इनसे गुजरता है तो क्या होता है। मगर मैं पिछले कुछ समय से मैं इससे गुजर रहा हूं। वालियाजी व बख्शी परमजीत के न रहने के साथ-साथ जनसत्ता के अपने दो सहयोगियो श्रीचंद मिश्र व मंगलेश डबराल को खोने के का अवसाद में दस तरह की बाते सोचते हुए हूं।  वालियाजी व बख्शी परमजीत मेरे मित्रो की सूची में थे। जबकि डबरालजी व श्रीशजी सहयोगी थे पर मैं उनके कभी निकट नहीं रहा।

वालियाजी आईबी के आला अधिकारी थे व जैसे मैं जनसत्ता में पंजाब व सिख कवर करता था वैसे ही वे आईबी में पंजाब व सिख कवर करते थे व खबरों में मेरी बहुत मदद करते थे। जब भी कोई आला अकाली नेता या आतंकवादी पंजाब से दिल्ली की राह पकड़ता तो वे मुझे उसके आने, ठहरने की संभावित जगह की सूचना दे देते थे। उन्होंने मुझे आईबी के तत्कालीन प्रमुख से लेकर दिल्ली के जाने माने सिख नेताओं से मिलवाया। बख्शी जगदेव सिंह इनमें से एक थे व परमजीत के पिता थे। बख्शी जगदेव सिंह की शख्सियत अलग ही थी। वे पैसे वाले व सिख होने के बावजूद न तो शराब पीते थे और न ही कभी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का चुनाव लड़ते थे।

एक बार मैं उन्हें अपने साथ फ्रांस के जाने-माने फैशन वस्त्र निर्माता ‘पियरे कार्डियां’ के फैशन शो में ले गया। उसके मेरे पास पास आए हुए थे। वहां बख्शीजी ने मुझे कुछ खास बातें बताई। उन्होंने कहा कि जब एक बार वे अपने दफ्तर में बैठे हुए थे तो एक साधू उनसे मिलने के लिए आया। उसने उनसे कहा कि अगर तुम मुझे चार रुपए दो तो मैं तुम्हे चार शिक्षाएं दूंगा। बख्शी जी ने उसे चार रुपए दे दिए और उसने उन्हें चार शिक्षाए दे दी। इनमे से मैं दो भूल गया हूं व दो शिक्षाएं आज भी मुझे याद हैं।

उसने बख्शीजी से पूछा कि क्या आपने कभी चिडि़या को बीमार पड़ते देखा है? उनके ना करने पर कहा कि चिडि़या सिर्फ उतना ही खाना खाती है जितनी उसे जरूरत होती है। हमें जीवन में खाना खाते व पैसा कमाते समय यह शिक्षा याद रखनी चाहिए। उसने दूसरी शिक्षा देते हुए कहा कि एक दोहा हमेशा याद रखना कि कै हंसा मोती चुगे, कै लंघन मर जाय। हंस या तो मोती खाता है अथवा उपवास करके मर जाता है। बख्शीजी के पास काफी संपन्नता थी मगर वे इसका दिखावा नहीं करते थे। फाइव स्टार होटल में बैठकर काफी पीना-पिलाना, चलते सफर कार का दरवाजा खालने वाले दरवाजे से टिप देना उनके शौक थे।

मैं सिख नेताओं व राजनीति के बारे में जानकारी लेने के लिए अक्सर उनके पास जाया करता था। वहां उनके बड़े बेटे स्वर्गीय परमजीत से मेरी दोस्ती हो गई क्योंकि वे मेरी आयु के बराबर थे व उस समय खबरों के टेप तैयार करके विदेशों में रहने वाले अपने सिख श्रोताओं को भेजते थे व अक्सर अनेक मुद्दो पर मेरा इंटरव्यू भी करते थे। वे दीवाली पर अक्सर अपनी पत्नी भाभी मनदीप कौर जी के साथ घर पर मिठाई व उपहार लेकर आते थे व उनके दोनों भाई परमजीत सिंह बख्शी व कंवलजीत सिंह बख्शी काफी हंसुख थे।

जब मेरी बेटी हुई तो परमजीत सिंह ने अस्पताल से घर तक मेरी पत्नी व उसे लाने के लिए अनुरोध करके कार भेजी थी। तब तक मेरे पास कार नहीं थी और वे व बख्शी साहब यह नहीं चाहते थे कि मेरी पत्नी व बेटी टैक्सी में घर तक आएं। फिर जब मेरी पत्नी अपनी मां के घर गई तो उन्होंने दोबारा कार भिजवाई। मैं उनकी वह आत्मीयता जीवन भर नहीं भूला।

बाद में मुझे परमजीत सिंह ने उनका एक किस्सा बताया कि एक बार वे अपने पिता के साथ कार से जा रहे थे। रास्ते में लालबत्ती पर जब कार रूकी तो कुछ भीख मांगने वालों ने उनके दरवाजे के पास आकर उनसे भीख मांगनी शुरू कर दी। इस पर परमजीत ने उन लोगों को डांट कर भगा दिया। यह देखकर बख्शीजी ने उन्हें डांटते हुए कहा कि आगे से यह कभी मत करना। अगर कुछ न देना हो तो अपने हाथ जोड़कर माफी मांग लेना। मगर कभी किसी को बुरा भला ना कहना। जीवन में एक बात हमेशा याद रखना कि किसी की दुआ भले ही न लगे मगर बददुआ जरूर लगती है।

परमजीत और मैं उनकी सलाह को नहीं भूले और मैंने पाया कि बख्शी जगदेव सिंह ने बहुत सही शिक्षा दी थी। बख्शी जगदेव सिंह जानते थे कि संयुक्त मोर्चा  शासनकाल में तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद से मेरे बहुत घनिष्ठ संबंध थे। एक बार परमजीत सिंह ने मुझसे कहा कि भाईसाहब पापा ने इन लोगों के इतने काम किए है। वे काफी वरिष्ठ भी है। दिल्ली में आज तक कोई सिख उप राज्यपाल नहीं बना। आप मुफ्ती मोहम्मद सईद से इस बारे में बात कीजिए।

एक दिन मैंने मुफ्ती का मूड़ सही देख कर उनसे इस बारे में बातचीत की तो वे बख्शीजी से मिलकर उनका आकलन करने के लिए तैयार हो गए। मैंने यह बात बख्शीजी को बताई व उन्हें तय समय पर मुफ्ती के घर पहुंचने के लिए कहा। मैं तो तय दिन व समय पर मुफ्ती के घर पहुंच गया मगर बख्शीजी नहीं आए। मैं काफी परेशान हो गया। तब सेलफोन नहीं हुआ करते थे। मैं मुफ्ती से इधर-उधर की बाते करके चला आया। जब वहां से सीधा बख्शजी के यहां पहुंचा और उनसे ना आने का कारण पूछा तो वे कहने लगे कि मेरा पेट खराब हो गया था। बात आई गई हो गई।

उस समय वे अपने ड्राइंगरूम में आस-पास से काम करवाने आए लोगों से घिरे हुए बैठे थे। तभी वहां परमजीत आया और कहने लगा कि पापाजी पीएमओ प्रधानमंत्री दफ्तर से फोन आया है। बख्शीजी को उसका बीच में  बात काटना अच्छा नहीं लगा और वे झुंझला कर कहने लेगे ओए उनसे कह दे कि मैं बाथरूम में हूं। सुबह-सुबह पीएमओ, पीएमओ मेरे पास क्या कोई और काम नहीं है। अपने पिता की ही तरह परमजीत ने कभी छोटा पद लिया नहीं और बड़ा पद उन्हें मिल नहीं पाया। मगर उन्होंने बख्शी जगदेव सिंह द्वारा स्थापित सिख ब्रदरहुड इंटरनेशनल की प्रधानी जरूर की ।

वे व्यापार में ज्यादा रूचि लेते रहे। उनकी पत्नी बीबी मनदीप कौर बख्शी जागो पार्टी की महिला विंग की प्रधान थी व निगम पार्षद भी रह चुकी हैं जबकि उनके सबसे छोटे भाई कंवलजीत ‘कंवली’ न्यूजीलैंड के पहले भारतीय मूल के सांसद बने। बख्शी परमजीत सिंह एक बहुत अच्छे इंसान थे। अब जब उनके न रहने की खबर पढ़ी तो अखबार में छपे नंबर पर फोन मिलाया। फोन उनके बेटे गुनजीत ने उठाया। उससे बात करके पता चला कि परमजीत को कोरोना हो गया था। यह सुनकर बहुत दुख हुआ और यह सोचने पर मजबूर हो गया कि अब मैं भी उस उम्र पर पहुंच चुका हूं व उन लोगों के बराबर हो गया हूं जिनकी दुनिया से जाने की बारी आ गई है।

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