टीएन शेषन से बदली व्यवस्था!

जब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त तिरुनेल्लई नारायण (टीएन) शेषन के निधन की खबर पड़ी तो बहुत कुछ सोचा। वजह यह थी कि वह मेरे जीवन के एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जिन्होंने साबित कर दिया था कि अगर इंसान में इच्छा शक्ति हो तो वह अपने अकेले दम पर पूरी व्यवस्था को सुधार कर रख सकता है। उनकी नियुक्ति की कहानी भी बहुत रोचक है। बताते हैं कि जब वीपी सिंह सरकार के पतन के बाद राजीव गांधी ने चंद्रशेखर को तत्कालीन सरकार बनाने का भरोसा दिया तो उन्होंने उनके सामने दो शर्ते रखी थी। पहली यह कि उनके विश्वासपात्र रहे टीवी राजेश्वर को गुप्तचर ब्यूरो का प्रमुख व टी एन शेषन को चुनाव आयोग का प्रमुख बनाया जाए।

चंद्रशेखर ने दोनों ही बातें मान ली। जब शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे उससे पहले तक यह संस्था प्रेस परिषद की तरह ही बिना दांतों व पंजे वाले शेर के तरह मानी जाती थी। उसकी कोई नहीं सुनता था। चुनाव के दौरान जिसकी लाठी उसकी भैंस का मुहावरा चरितार्थ होते हुए दिखता था। सामान्यतः पूरे देश में एक दिन ही चुनाव होते थे। जिनमें खुलकर गुंडागर्दी, लूटमार व वोटों की छपाई होती थी। लोग चुनाव आयोग की जरा भी परवाह नहीं करते थे।

चुनाव के लिए तैनात सरकारी अधिकारी, स्थानीय नेताओं व प्रशासन से प्रभावित हो जाते। मतदान केंद्रों पर कब्जा कर के उन्हें लूट लेना आम बात थी। जहां लठैत अपनी मरजी से वोट डालते (छापते) थे। उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की चुनाव व्यवस्था को पटरी पर लाने में अपनी अहम भूमिका अदा करने के साथ ही उसे विश्व स्तर पर बहुत चर्चित कर दिया। उन्होंने बिहार में होने वाली मनमानी रोकने के लिए वहां चार चरणों में चुनाव करवाए।

बिहार के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाले चुनाव के दौरान चार बार मतदान की तारीखे बदली गई। पहले विभिन्न सरकारी महकमों के अफसर चुनाव आयोग के कहने पर चुनाव तक उसके मातहत काम करते थे व आयोग की जरा भी परवाह नहीं करते थे मगर शेषन ने कानून में बदलाव कर यह सुनिश्चित किया कि चुनाव अवधि के दौरान वहां काम कर रहे सारे चुनाव अधिकारी को आयोग के तहत उसका कर्मचारी माना जाएगा व आयोग को उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होगा।

जब 1992 में चुनाव हुए तो शेषन ने उत्तरप्रदेश में जमकर सख्ती करते हुए सभी जिला मजिस्ट्रेटो व पुलिस अफसरों से कह दिया कि उनकी कोई गलती सहन नहीं की जाएगी। उन्होंने सरेआम बयान दिया कि वहां सक्रिय 50,000 अपराधी या तो अग्रिम जमानत ले ले या फिर खुद को पुलिस के हवाले कर दे। मतदान के दौरान सबसे ज्यादा गड़बड़ी बागपत में होती थी। उन्होंने पहली बार वहां चुनाव के दौरान मतदान की वीडियोग्राफी करवाई।

जब 1993 में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद अपने बेटे का चुनाव प्रचार करने के लिए सतना पहुंचे तो सरकारी कार के साथ उनकी तस्वीर छपने के बाद शेषन इतना सख्त हुए कि उन्हें राज्यपाल पद से इस्तीफा दे देना पड़ा। उन्होंने चुनाव प्रचार के खर्च को कम किया व मतदाता पहचान पत्र लागू किया। वह पंडारा रोड पर मेरे घर के पास ही रहते थे। उनके स्टाफ के लोग बताते थे कि वह सुबह जल्दी उठते और अखबार पढ़ने व नाश्ता करने के बाद सो जाते थे। इसके बाद जब अधिकारी दफ्तर से जरुरी फाइलें लेकर आते तो वे दीवार में बनी एक खाली जगह पर उन्हें रख देते थे।

मैं चुनाव कवर करता था। एक बार मैंने कुछ जानने के लिए उन्हें फोन किया। उन्होंने खुद फोन उठाया और सवाल सुनने के बाद कहा कि वे उसका जवाब नहीं देंगे। उन्होंने भारत माता की जय कहा और फोन रख दिया। दोबारा फोन करने पर उन्होंने यही दोहराया और कहा कि मैं जितनी बार भी फोन करुंगा वे हर बार फोन पर भारत माता की जय ही कहेंगे। जब केंद्र में पीवी नरसिंहराव की सरकार बनी तो उन्होंने उनके पर काटने के लिए कानून की एक व्यवस्था का लाभ उठाते हुए उनके साथ ही दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिए।

इनमें से एक आंध्रप्रदेश के अफसर जीवीजी कृष्णमूर्ति थे जिनके साथ उनका जमकर टकराव होता था। एक बार जब मैं कृष्णामूर्ति से मिलने चुनाव आयोग गया तो उन्होंने चाय के दौरान मुझे एक पेन उपहार में देते हुए कहा कि इसे तुम रख लो क्योंकि मेरा पेन सेट खराब हो गया है। वो मद्रासी मेरा दूसरा पेन चुरा ले गया। तब मुझे पता चला कि दक्षिण भारत में भी राज्यवार लोगों में नफरत रहती है।

रिटायर होने के बाद उन्होंने राजनीति में आने की कोशिश की मगर किसी भी बड़े दल ने उन्हें घास नहीं डाली। उन्होंने 1997 में के आर नारायणन के खिलाफ राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा मगर हार गए। उन्होंने 1999 में कांग्रेस के टिकट पर लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा मगर हार गए। उन्हें उनके काम के लिए रेमन मैगसेसे अवार्ड से सम्मानित किया गया।

वेचुनाव के दौरान गलत आचरण करने वाले लोगों के लिए खौफ का पर्याय बन गए थे। तमिलनाडू काडर का 1955 बैच का यह आईएएस अफसर 1989 मे कैबिनेट सचिव भी रह चुका था। वामपंथी नेता नंबूदरीपाद व मेट्रो मैन ईश्रीधरण उनके सहपाठी थे। उनके आंतक के कारण उन्हें नापसंद करने वाले लोग उन्हें चाहे जो कहते थे। हालांकि वे केरल के पलक्कड़ इलाके में पैदा हुए थे मगर रिटायर होने के बाद अपनी पत्नी के साथ यह अय्यर ब्राम्हण तमिलनाडू में रहने लगा था जहां 86 साल की आयु में उनका निधन हुआ।

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