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‘सबसे तेज, सबसे मजबूत’ की होड़ खत्म!

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Tokyo Olympics 2020 : मनुष्य की शारीरिक क्षमता और कौशल की परीक्षा का सर्वोच्च मुकाबला ओलंपिक में होता है। तभी हर ओलंपिक में यह उम्मीद की जाती है कि इस बार प्रतिस्पर्धा में हिस्सा ले रहे प्रतिभागी पहले से बेहतर प्रदर्शन करेंगे। सवाल है कि अभी टोक्यो में 23 जुलाई से आठ अगस्त तक हुए ओलंपिक आयोजन में कितनी बार यह सुनने को मिला कि अमुक खेल में विश्व रिकार्ड टूटा या अमुक खेल में ओलंपिक का बरसों या दशकों पुराना रिकार्ड टूटा? एकाध मुकाबलों को छोड़ दें तो किसी मुकाबले में रिकार्ड टूटने की खबर नहीं है। उलटे विश्व रिकार्ड से बहुत कमतर प्रदर्शन करके खिलाड़ी गोल्ड मेडल जीते हैं। भारत के नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक प्रतिस्पर्धा में 87.58 मीटर तक भाला फेंक कर गोल्ड जीता है। यह भाला फेंकने के विश्व रिकार्ड से 11 मीटर कम है। उन्होंने कहा है कि उनका अगला लक्ष्य 90 मीटर तक भाला फेंकना है, जबकि भाला फेंक का विश्व रिकार्ड 98.48 मीटर का है। चेक गणराज्य के जैन जिलेंजी ने 1996 में यह रिकार्ड बनाया था। पिछले 25 साल से कोई खिलाड़ी इस रिकार्ड को नहीं तोड़ पाया है। उलटे अब उससे 11 मीटर कम भाला फेंक कर गोल्ड जीता जा रहा है!

यह सिर्फ एक मुकाबले की बात नहीं है। उसेन बोल्ट ने सौ मीटर की रेस में 9.58 सेकेंड का जो रिकार्ड 2008 में बनाया वह अभी नहीं टूटा है। इस साल टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले इटली के लामोन मार्शेल जैकब ने सौ मीटर की रेस 9.80 सेकेंड में पूरी की। उन्होंने बोल्ट के रिकार्ड से 0.22 सेकेंड ज्यादा समय लिया। सोचें, पहले सौ और दो सौ मीटर की रेस सेकेंड के सौवें हिस्से के अंतर से जीती जाती थी। अभी गोल्ड जीतने वाला विश्व रिकार्ड से 0.22 सेकेंड ज्यादा समय ले रहा है। इसी तरह दो सौ मीटर की रेस में बोल्ट का 2008 का रिकार्ड 19.30 सेकेंड का है, जबकि इस साल टोक्यो ओलंपिक में कनाडा के डी ग्रेस ने दो सौ मीटर की रेस 19.62 सेकेंड में पूरी की। उन्होंने बोल्ट के मुकाबले 0.32 सेकेंड ज्यादा समय लिया। टोक्यो ओलंपिक में चार सौ मीटर की रेस बहामास के स्टीवन गार्डिनर ने 43.85 सेकेंड में पूरी की और उनको गोल्ड मेडल मिला। चार सौ मीटर की रेस का रिकार्ड दक्षिण अफ्रीका के वायडे वान नियेकर्क के नाम से है, जिन्होंने 2016 में 43.03 सेकेंड में रेस पूरी की थी। यानी इस साल जिसने ओलंपिक का गोल्ड जीता है उसने नियेकर्क से 0.82 सेकेंड ज्यादा समय लिए।

इस तरह ऐसे खेलों की लंबी सूची बनाई जा सकती है, जिनका विश्व रिकार्ड बरसों या दशकों से नहीं टूटा है। विश्व रिकार्ड से कमतर प्रदर्शन करके खिलाड़ी गोल्ड मेडल जीतते रहे हैं। सोचें, सौ मीटर की रेस में उसेन बोल्ट का रिकार्ड पिछले 13 साल से कायम है और कोई भी उसके आसपास नहीं पहुंच सका है। यह भी एक रिकार्ड है कि सौ मीटर की रेस पिछले 50 साल से 10 सेकेंड के अंदर पूरी हो रही है। यानी पिछले 50 साल से इंसान इसमें कोई बड़ा सुधार नहीं कर पा रहा है। दूसरे कई मुकाबलों में भी दशकों पहले बने रिकार्ड में सुधार नहीं हुआ है या उसके आसपास का ही प्रदर्शन दोहराया जा रहा है।

ध्यान रहे ओलंपिक का मूल वाक्य यानी मोटो है- फास्टर, हाएर, स्ट्रांगर- टुगेदर! यानी सबसे तेज, सबसे ऊंचा और सबसे मजबूत! लेकिन अगर खिलाड़ी पिछले रिकार्ड नहीं तोड़ पा रहे हैं तो इस मोटो का क्या मतलब रह जाएगा? क्या यही कारण नहीं है कि ओलंपिक खेलों में धीरे धीरे लोगों की दिलचस्पी कम होती जा रही है? ओलंपिक मुकाबले के प्रसारण का अधिकार रखने वाली अमेरिकी कंपनी एनबीसी यूनिवर्सल ने बताया है कि 23 जुलाई से आठ अगस्त तक प्राइम टाइम के दौरान ओलंपिक व्यूअरशिप औसतन 1.55 करोड़ रही। अगर शुभारंभ और समापन समारोह को छोड़ दें तो ओलंपिक के मुकाबले देखने वालों की औसत संख्या हर दिन डेढ़ करोड़ से थोड़ी ज्यादा रही है। यह 1988 से अब तक किसी ओलंपिक गेम्स की अमेरिका की सबसे कम व्यूअरशिप है।

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रियो ओलंपिक में अमेरिका में औसतन 2.67 करोड़ दर्शक मुकाबले देखते थे और उससे पहले लंदन ओलंपिक में यह संख्या 3.11 करोड़ थी। कह सकते हैं कि टोक्यो और अमेरिका में समय का फर्क होने की वजह से इस साल दर्शकों की संख्या में कमी आई है। लेकिन यह सिर्फ एक पहलू है। क्योंकि कमी सिर्फ इस साल नहीं आई है। पिछले तीन दशक से लगातार ओलंपिक देखने वालों की संख्या कम हो रही है। ऐसा इसके बावजूद है कि पिछले तीन दशक में मैचों का प्रसारण करने वाले प्लेटफॉर्म्स की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है। न सिर्फ ब्रॉडकास्ट करने वाले प्लेटफॉर्म बढ़े हैं, बल्कि प्रसारण की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। इसके बावजूद दर्शकों की संख्या का लगातार कम होते जाने इस विश्व मुकाबले की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल है। पर उससे भी बड़ा सवाल इंसान की शारीरिक क्षमता और उसके कौशल का है। सवाल यह है कि क्या इंसान के शारीरिक विकास की प्रक्रिया रूक गई है या इंसान खुद ही शारीरिक विकास के प्रति दिलचस्पी खोता जा रहा है? कहीं इसका संबंध औद्योगिक क्रांति के खत्म होने और कॉग्निटिव यानी संज्ञानात्मक क्रांति शुरू होने से तो नहीं है?

ऐसा लग रहा है कि धीरे धीरे लोगों की इस बात में रूचि कम हो रही है कि धरती पर सबसे तीव्रतम या सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है। यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि विश्व सुंदरी या ब्रह्मांड सुंदरी चुनने के लिए जो प्रतियोगिताएं होती हैं उनके भी दर्शक लगातार कम होते जा रहे हैं। इसका मतलब है कि लोगों को इसमें भी कोई कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गई है कि ब्राह्मंड में सबसे सुंदर कौन है। संभवतः ज्ञान का महत्व बढ़ने से शारीरिक गुण-अवगुण के प्रति लोगों की रूचि कम हो रही है। एक कारण यह भी हो सकता है कि आज इंसान जिस आभासी दुनिया में रह रहा है उसने उसे वास्तविक जीवन से दूर किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए रची गई दुनिया लोगों को वास्तविक दुनिया से दूर ले जा रही है। लोग अपने स्मार्ट उपकरणों पर आभासी खेल खेल रहे हैं और आभासी युद्ध लड़ रहे हैं, जिसमें सबसे तेज और सबसे मजबूत योद्धा वे खुद होते हैं। यह इंसान के निजी स्तर पर और समाज के स्तर पर हो रहे एक बड़े बदलाव का संकेत है, जिसे गहराई से समझने की जरूरत है। ध्यान रहे समाज में ज्ञान का महत्व बढ़ा है लेकिन ऐसा नहीं है कि ज्ञानी लोगों की संख्या बढ़ रही है। थोड़े से लोगों का ज्ञान ही दुनिया को तकनीक के स्तर पर बदल रहा है। सो, कहीं ऐसा न हो कि इसकी वजह से खेल और प्रतिस्पर्धा के प्रति मनुष्य का आदिम जुड़ाव धीरे धीरे खत्म हो जाए और उसके साथ ही इंसान के बेहतर और मजबूत होते जाने की संभावना भी खत्म हो जाए। 

 

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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