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व्यापार घाटा, समाधान ढूंढे

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तात्कालिक कोई बड़ी चुनौती भारत के सामने नहीं है। लेकिन महंगाई और मंदी का जो ट्रेंड है, उसके दीर्घकालिक होने के हालात हैं। ऐसे में निश्चिंत होना सही नजरिया नहीं होगा।

बीते जून में भारत के व्यापार घाटे का रिकॉर्ड बना था, जब ये घाटा 26 बिलियन डॉलर से अधिक दर्ज हुआ। तभी उसे चेतावनी की एक घंटी बताया गया था। लेकिन जुलाई में तो बाद उससे बहुत आगे बढ़ गई। ये घाटा 31 बिलियन डॉलर से भी आगे चला गया है। इसके साथ ही एक और चिंताजनक पहलू यह रहा कि भारत के निर्यात में 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। अब जबकि अमेरिका और यूरोप पर मंदी का साया गहरा रहा है, तो आशंका है कि उससे भारत के निर्यात पर और खराब असर पड़ेगा। जबकि आयात बिल को घटाने का कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है। पेट्रोलियम और अन्य कॉमोडिटी की महंगाई से पहले जितनी ही चीजें मंगाने पर ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। यह आसन्न बड़ी समस्या का संकेत है। यह ठीक है कि अभी भारत के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार है। इसलिए तात्कालिक कोई बड़ी चुनौती सामने नहीं आएगी। लेकिन दुनिया की तमाम संस्थाएं और विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अभी महंगाई और मंदी का जो ट्रेंड है, उसके दीर्घकालिक होने के हालात हैं। ऐसे में भविष्य में गंभीर चुनौती अवश्य सामने आएगी।

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इसलिए अभी से सतर्क होने की जरूरत है। गौरतलब है कि देश में अधिक डॉलर लाने के लिए सरकार ने जो दो उपाय घोषित किए थे (कंपनियों के डॉलर में कर्ज लेने की सीमा को दो गुना करना और अनिवासी भारतीयों की रकम आकर्षित करने के लिए बैंकों को ब्याज दर में लचीलापन अपनाने की छूट देना), उनसे कोई उल्लेखनीय लाभ नहीं हुआ है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि व्यापार घाटे को नियंत्रित करने के सख्त उपाय किए जाएं। अगर जरूरी हो, तो इस मकसद से लग्जरी गुड्स का आयात घटाने के कदम उठाए जाने चाहिए। एक बड़ी समस्या यह है कि देश में छोटे और मध्यम उद्योगों के कमजोर हो जाने के कारण छोटी चीजें भी आयात करनी पड़ रही हैं। इसका फायदा चीन को मिला है। चीन से आयात-निर्यात के जुलाई के आंकड़े अभी नहीं आए हैं। लेकिन पिछले महीनों में ट्रेंड भारत का व्यापार घाटा बढ़ने का रहा है। तो इस मसले पर समग्रता से विचार होना चाहिए, ताकि अभी से कोई ठोस हल ढूंढा जा सके।

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