तस्करी के शिकार बच्चे - Naya India
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तस्करी के शिकार बच्चे

बाढ़ के सीजन में बिहार को एक और समस्या का सामना करना पड़ता है। यह है बच्चों की तस्करी। इस साल भी बाढ़ के साथ ही ऐसी घटनाएं सुर्खियां बनी हैं। स्वयंसेवी संस्था बचपन बचाओ आंदोलन की सूचना पर पिछले दिनों पटना जिले के मोकामा में रेलवे पुलिस जीआरपी और रेलवे सुरक्षा बल आरपीएफ की संयुक्त कार्रवाई में दिल्ली ले जाए जा रहे सात बच्चों को दलालों के चंगुल से मुक्त कराया गया। पुलिस ने एक मानव तस्कर को भी गिरफ्तार किया। इन बच्चों को तीन हजार रुपये मासिक वेतन का प्रलोभन दिया गया था। पेशगी के तौर पर उनके मां-बाप को एक हजार रुपये दिए गए थे।

ऐसा ही एक मामला गया जिले की शेरघाटी में सामने आया जहां से गुजरात से ले जाए जा रहे मजदूरों और बाल मजदूरों पकड़ा गया। वहां पुलिस ने तीन दलालों को भी पकड़ा। बस में भेड़-बकरी की तरह ठूंसकर इन मजदूरों को सूरत की कपड़ा मिल में काम करने के लिए ले जाया जा रहा था। जानकारों के मुताबिक इधर दलालों की सक्रियता ज्यादा बढ़ गई है। वे तरह-तरह के दांव-पेंच अपना रहे हैं। यह सच है कि वैसे तो संपूर्ण बिहार, लेकिन खासकर सीमांचल और कोसी से सस्ते श्रम, मानव अंग, देह व्यापार एवं झूठी शादी के नाम पर बालक-बालिकाओं की तस्करी की जाती है। बाढ़ जैसी भयंकर आपदा के बाद पहले से ही गरीबी की मार झेल रहे परिवारों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। गरीबी के कारण उनमें आर्थिक असुरक्षा का भाव आता है।

स्लीपर सेल की तरह काम करने वाले दलालों की नजर ऐसे परिवारों पर रहती है। कई बच्चे ऐसे होते हैं जो बाढ़ के दौरान जान बचाने की जद्दोजहद के बीच अपने मां-बाप से बिछुड़ जाते हैं। राहत शिविरों में रह रहे इन बच्चों पर भी मानव तस्करों की पैनी निगाह रहती है। आंकड़ों के मुताबिक 2019 में सीमांचल के इलाके पूर्णिया से तीन, कटिहार से पांच, अररिया से चार, किशनगंज से तीन बच्चे लापता हो गए जबकि 2018 में 17 और 2017 में 24 बच्चों के गुम होने का मामला विभिन्न थानों में दर्ज हुआ। यही वजह है कि बचपन बचाओ आंदोलन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दखिल कर कहा है कि लॉकडाउन के बाद बाल तस्करी के मामलों में काफी वृद्धि की आशंका है। कोरोना के कारण आर्थिक संकट गहरा गया है। जाहिर है, इस स्थिति पर काबू पाने के लिए इस दिशा में गंभीर प्रयास करने की जरूरत हैं।

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