nayaindia truth of kashmir valley ‘एथनिक क्लींजिंग’ का सियासी प्री-प्लान
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‘एथनिक क्लींजिंग’ का सियासी प्री-प्लान

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truth of kashmir valley कश्मीर घाटी का सत्य-12: कश्मीर घाटी ऐसे किरदारों, ऐसे सियासतदानों से कलंकित है, जिसमें कोई कश्मीरियत से भले प्रधानमंत्री बना हो लेकिन कुल मिलाकर वह धोखेबाज प्रमाणित हुआ। जिसे भारत का गृह मंत्री बनने का मौका मिला उसके हाथ भी जन सफाए-संहार याकि ‘एथनिक क्लींजिंग’ के खून से रंगे हुए। शेख अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद (कर्ण सिंह और गांधी-नेहरू दरबार में कश्मीर की रीति-नीति बनवाने वाले चेहरे भी इसी श्रेणी के) और उनके वशंज अब्दुल्ला-मुफ्ती परिवार के चेहरों, मिजाज में भले ऊपरी फर्क दिखे लेकिन दोनों परिवारों की तासीर में अवसरवाद, सुविधा और सत्ता भूख में धर्म, उग्रवाद व अलगाव का खेला एक से अंदाज का है। नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया के गांधी-नेहरू-इंदिरा हों या हिंदू आइडिया ऑफ इंडिया के वाजपेयी, नरेंद्र मोदी सभी का भरपूर उपयोग तो जमायत-जेकेएलएफ, आईएसआई याकि उग्रवादियों-लड़ाकों का इस्तेमाल भी बेहिचक। इस सत्य की एक पुख्ता-घातक अवधि 1982 से 1989 के सात साल हैं। मतलब 19 जनवरी 1990 के जातीय सफाए-संहार की तारीख के पूर्व की बैकग्राउंड, हिंदुओं को भगाने से पहले का प्री-प्लान!

सन् 1982 में शेख अब्दुल्ला की मौत के बाद उनका बेटा फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बना। उम्र महज 45 साल। सियासी अनुभव में नौसखिया। उनके लिए 1983 के चुनाव की पिता द्वारा बिछाई मुस्लिम बिसात को संभालना, कांग्रेस-मुफ्ती मोहम्मद की खुन्नस से बचना सब मुश्किल था। घाटी में मुफ्ती से पंगा विरासत में मिला था। उनकी इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अरूण नेहरू से भी केमिस्ट्री नहीं थी। कांग्रेस के मुफ्ती मोहम्मद मौका नहीं चूकते थे। मतलब पिता की मौत के बाद गद्दी संभालने, सितंबर 1983 में चुनाव जीत वापिस शपथ, फिर जुलाई 1984 में जीजा गुलाम शाह द्वारा तख्ता पलट कर सीएम पद हथियाने तक के 25 महीने का फारूक राज नौसखियाई था। तभी शेख अब्दुल्ला की बनाई इस्लामियत की जमीन पर जमायत जैसे संगठन सियासी ख्वाब बनाने लगे थे।

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कश्मीर घाटी का सच-11 हिंदूओं को भगवाने की भूमिका शेख की!

निश्चित ही आईएसआई भी तब पाकिस्तान के सैन्य राष्ट्रपति जिया उल हक के ऑपरेशन टोपाज से घाटी में आंतक पसारे हुए थी। ब्रिटेन में भारत के राजनयिक रविंद्र महात्रे की मार्च 1984 में जेकेएलएफ के आंतकियों द्वारा हत्या की घटना उग्रवादियों का हौसला बढ़ाने वाली थी। छह दिन बाद जब भारत ने जेकेएलएफ के आंतकी मकबूल भट्ट को फांसी दी तो घाटी भारत विरोध में खदबदा गई। मुफ्ती ठाने बैठे थे कि अब्दुल्ला परिवार निपटे। हालातों के हवाले केंद्र सरकार के तीन मंत्री राष्ट्रपति के यहां यह शिकायत करते हुए थे कि वहां अलगाववादी बेकाबू हो रहे हैं। ऐसे दबाव के आगे नौसखिया फारूक का जवाब था यदि कांग्रेस ने सही बरताव नहीं किया तो खूनखराबा होगा।

तभी फारूक के जीजा गुलाम मोहम्मद शाह को अब्दुल्ला परिवार का धोखा! इसकी साजिश मुफ्ती मोहम्मद ने रची थी। तब उनका खुद का मुख्यमंत्री बनने का सपना था। पर इंदिरा गांधी जिंदा थीं और वे मीर कासिम से सलाह करती थीं तो कांग्रेस ने नेशनल कांफ्रेंस के बागी शाह को समर्थन दे कर मुख्यमंत्री बनवाया।

श्रीनगर में गुल शाह और दिल्ली में मुफ्ती मोहम्मद (बाद में राजीव गांधी ने अपने कैबिनेट में मंत्री बना लिया था) की जोड़ी ने फिर घाटी में वह किया जो पंजाब में जैसे भिंडरावाले से हुआ था। बिना पैंदे के गुल शाह ने अपना जनाधार बनाने के लिए जमायत-ए-इस्लामी, मौलवी इफ्तिकार हुसैन, मोईनुद्दीन जैसे कट्टरपंथियों को साथ लेकर घाटी में इस्लामी राजनीति फैलवाई (फारूक की बनाई जमीन और गुल शाह की सरपरस्ती से ही जमात का आगे मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने का इरादा बना था)। अपने आपको भारी मुस्लिम बतलाने के लिए 1986 में जम्मू के नए सचिवालय में गुल शाह ने मस्जिद बनवाने का पैंतरा चला। जम्मू में हिंदू भड़के, विरोध-प्रदर्शन किया तो गुल शाह ने श्रीनगर पहुंच मुसलमानों को भड़काते हुए कहा इस्लाम खतरे में है। नतीजतन घाटी में हिंसा, हिंदू मंदिरों को नुकसान पहुंचाने का नया सिलसिला शुरू।

कश्मीर घाटी का सत्य-10 उफ! हर शाख पर उल्लू ….

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सोचें, कांग्रेस ने फारूक की जगह गुल शाह को बनाया तब भी नतीजा कैसा?

तथ्य है इससे पहले मोटा-मोटी घाटी की कश्मीरियत में कई लोग मंदिरों को निशाना बनाने पर आपत्ति करते थे। लेकिन गुल शाह के शासन में घाटी में सीधे-सीधे मुसलमानों ने मंदिरों और हिंदुओं को निशाना बनाना शुरू किया तो वह एक ऐसा परिवर्तन था, जिसकी इंदिरा गांधी ने आखिरी वक्त में और राजीव गांधी ने सत्ता संभालने के बाद इसलिए अनदेखी की क्योंकि मुफ्ती मोहम्मद सईद व एमएल फोतेदार सच्चाई को सच्चाई से बताते हुए नहीं थे। तथ्य यह भी है कि मंदिरों की तोड़फोड़ को दिल्ली का सेकुलर मीडिया कवर नहीं करता था। ऐसी घटनाओं की सांप्रदायिकता फैलाने, हिंदुओं के झूठ या बढ़-चढ़ कर बोलने की धारणा में भी अनदेखी होती थी। मैं तब ‘जनसत्ता’ में था और एक्सप्रेस रिपोर्टर खबरें भेजते भी थे तो ‘एक्सप्रेस’, ‘जनसत्ता’ में जगह नहीं मिल पाती थी। 1990 में वीपी सिंह-मुफ्ती मोहम्मद के राज में हुई ‘एथनिक क्लींजिंग’ के वक्त भी राष्ट्रीय मीडिया ने लगभग आंखें बंद की हुई थी। जैसे दिल्ली में सिखों के नरसंहार की कवरेज मीडिया में भरपूर रही वैसे जनवरी 1990 में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और ‘एथनिक क्लींजिंग’ पर कवरेज नहीं थी। हां, मैं जरूर गपशप क़ॉलम में वीपी-मुफ्ती को लपेटे रहता था।

इस मोड पर एक पहेली है। कहते हैं इंदिरा गांधी ने आखिरी दिनों में कश्मीर पर नई रणनीति सोची। पता नहीं किसका आइडिया था (शायद रॉ के रामनाथ कॉव का ही रहा हो क्योंकि पंजाब में ऐसी ही दिमागी खुराफात से भिंडरावाले पैदा हुआ था) जो अब्दुल्ला परिवार से चिन्हित कश्मीरी आईडेंटिटी को मिटवाने का विचार बना। अब्दुल्ला परिवार क्योंकि कश्मीरी पहचान का पर्याय है व देश-दुनिया में शेख से ही कश्मीर की पहचान है तो उसे कमजोर बना प्रदेश के मसले को मुस्लिम राजनीति में वैसे ही ढालें, जैसे केरल, यूपी में हिंदू-मुस्लिम होता है। कश्मीर, कश्मीरियत नहीं, बल्कि भारत की मुस्लिम समस्या का एक सामान्य हिस्सा। कहते हैं इंदिरा गांधी ने यह आइडिया जगमोहन से शेयर किया। इसी अनुसार काम करने को कहा। बलराज पुरी ने एक विमर्श में बताया है कि जगमोहन का कहना था- कश्मीरी पहचान का हल्ला भारत की पहचान को हमेशा खतरा होगा। इस पर बलराज पुरी ने उनसे कहा कि अपनी पहचान की सुरक्षा के लिए ही तो भारत में कश्मीर ने विलय किया। तब जगमोहन का जवाब था– जब तक कश्मीरी आईडेंटिटी रहेगी पाकिस्तान और अमेरिका उसको एक्सपोलाइट करते रहेंगे। इसलिए उसका खात्मा जरूरी है। तब पुरी का पूछना था कि यदि कश्मीरी आईडेंटिटी खत्म हुई तो उसकी जगह क्या होगी? क्या मुस्लिम आईडेंटिटी!

कश्मीर घाटी का सत्य-9: नेहरू को धोखा या शेख को?

क्या ऐसा वैचारिक मंथन हुआ? पता नहीं। लेकिन घटनाएं बोलती हुई हैं। फारूक के सीएम बनते ही उन्हें हटाने की साजिश, अब्दुल्ला परिवार में झगड़ा, दामाद जीएम शाह का पार्टी तोड़ना, उनका कांग्रेस व जमायत समर्थन से सीएम बनना और फारूक के किस्सों से जहां अब्दुल्ला परिवार की साख बिगड़ी वहीं जीएम शाह ने शातिरता से मुस्लिम-बनाम हिंदू का ऐसा नैरेटिव, झगड़ा बनवाया कि कश्मीरियत पर घाटी में सोचना-बोलना-लिखना लगभग खत्म।

तभी गुलाम शाह का जुलाई 1986 से मार्च 1987 का शासन घाटी, केंद्र सरकार, कांग्रेस, प्रदेश सबके लिए घातक था। श्रीनगर में भारत-पाकिस्तान मैच के वक्त पाकिस्तानी झंडों से भरा स्टेडियम, भारत के खिलाफ नारेबाजी और सड़कों पर तोड़फोड़ वाली बेकाबू दशा तो अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन खोलने के अदालती फैसले पर घाटी के उस इलाके में हिंदुओं को निशाना बनाया जाना जो मुफ्ती मोहम्मद का गढ़ था। मतलब अनंतनाग। अयोध्या की खबर के बाद हिंदुओं के कई मंदिरों में तोड़फोड़ हुई, पंडितों के घरों पर पत्थरबाजी हुई। ‘इंडिया टुडे’ की एक रपट के अनुसार तब कॉरवान पत्रिका में प्रवीण धोंती ने कई सूत्रों के हवाले लिखा- सबके पीछे मुफ्ती साहेब का हाथ है। मुफ्ती से दंगे प्रायोजित थे। रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस आलाकमान जीएम शाह से पिंड छुड़ाना चाहता है सो, मुफ्ती ने दंगों से बहाना बनवाया। वैसा ही हुआ। दंगे फैले, हिंदू मौतें हुईं और राजीव सरकार ने जीएम शाह को बरखास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया।

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कश्मीर घाटी का सत्य-8: उफ! शेख का हिंदुओं से वह खेला!

कांग्रेस आलाकमान को समझ आया कि फारूक अब्दुल्ला से ही नाता-साझा बनाना पड़ेगा। एनसीपी-कांग्रेस में एलायंस बना। दोनों ने मिलकर 1987 का विधानसभा चुनाव लड़ा। उस चुनाव में पहली बार योजनाबद्ध ढंग से जमायते-ए-इस्लामी सहित प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने एक मुस्लिम संयुक्त मोर्चा (एमयूएफ) बना कर चुनाव लड़ा। सोचें, शेख और गुल शाह ने घाटी में मुस्लिम उग्रवादियों की हैसियत चुनावी मोर्चे की कैसे बनाई! इसमें तब बड़ा रोल मुफ्ती मोहम्मद का भी था। कांग्रेस में रहते, राजीव गांधी के मंत्री होते हुए भी मुफ्ती ने उग्रवादी मुस्लिम संगठनों की चुनाव से सत्ता हैसियत बनाने का खेल खेला। मुस्लिम मोर्चे को जितवाने की कोशिश की। ध्यान रहे मोर्चे ने जम्मू-कश्मीर में कुरानसम्मत शासन बनाने का बात कही थी। बावजूद इसके मुफ्ती मोहम्मद सईद चुनाव सभा में केद्रीय पर्यवेक्षक नजमा हेपतुल्ला के आगे कश्मीरी में भाषण करके इशारों-इशारों में सभा से कहते थे आप सब जानते हैं किसको वोट देना है। कांग्रेस के मेरे साथियों परंपरा ध्यान रहे (मतलब नेशनल कांफ्रेस को नहीं)। और फिर जेब से पेन निकाल कर इंकपॉट को संकेतों में बता पेन का मैसेज देते (मुस्लिम मोर्चे का चिन्ह स्याही-पेन था)। उस चुनाव में कांग्रेस-एनसी ने 75 सीटों पर चुनाव लड़ा था जबकि मुस्लिम मोर्चे ने 43 सीटों पर। मतगणना में धांधली से मोर्चे के जीतते उम्मीदवार भी पराजित घोषित हुए। कहते हैं यदि धांधली नहीं होती तो 43 में से 15-20 सीटें मुस्लिम मोर्चा जीतता। सो, नतीजों के बाद मोर्चे के कार्यकर्ताओं ने आंदोलन, हिंसा की। बहुत से कार्यकर्ता पाकिस्तान गए, ट्रेनिंग ली। एक उम्मीदवार यूसुफ शाह ने पाकिस्तान जा सैयद सलाहुद्दीन नाम अपना हिजबुल मुजाहिदीन संगठन बनाया। उसका चुनावी एजेंट यासीन मलिक था जो बाद में जेकेएलएफ की उस टीम में था, जिसने दो साल बाद भारत के गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया का अपहरण करके घाटी में वह धमाल बनवाया जो कश्मीरी पंडितों की ‘एथनिक क्लींजिंग’ के लांचपैड जैसा वाकया था। (जारी)

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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