nayaindia Truth of Kashmir Valley एथनिक क्लींजिंग न आंसू, न सुनवाई! क्यों
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एथनिक क्लींजिंगः न आंसू, न सुनवाई! क्यों?

Truth of Kashmir Valley: 1989 से 1994 के पांच-छह सालों में पाकिस्तान का पूरा सिस्टम, प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो, फिर नवाज शरीफ, वापिस बेनजीर, आईएसआई भारत के खिलाफ इतने आक्रामक थे कि यदि तब जगमोहन, जनरल कृष्णराव और बतौर प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का भारत को नेतृत्व नहीं मिला होता तो सचमुच भारत घाटी गंवा बैठता। इन तीन चेहरों की वजह से भारत राष्ट्र की ताकत व वैश्विक कूटनीति में वह कमाल हुआ जो घाटी बची।… भारत की किस्मत, सौभाग्य जो जनवरी से मई 1990 के साढ़े चार महीने में राज्यपाल जगमोहन ने भारत का मान बचाया।

कश्मीर घाटी का सत्य-15: लाख टके का सवाल है क्या सन् 1990 में घाटी से हिंदू सफाए के अपराध की जांच व सुनवाई हुई? नहीं। मैंने-आपने किसी ने नहीं सुना कि भारत के गृह मंत्रालय या किसी सरकारी एजेंसी ने जनवरी 1990 में जन सफाए-संहार, एथनिक क्लींजिंग के दोषियों को पकड़ने की पीई याकि प्रारंभिक जांच भी दर्ज कराई हो! सो, सोचें हिंदू और सिख के फर्क पर! 1984 के नरसंहार के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सिख लगातार संघर्ष करते हुए। सिखों ने कनाडा, ब्रिटेन से ले कर भारत सभी और ज्यादती का नैरेटिव बनाया, जबकि 1990 में भगाए गए हिंदू पंडित अभी भी जम्मू में एक-एक कमरे के रिफ्यूजी कैंप में रहते मिल जाएंगें। लेकिन हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से ले कर दुनिया की अदालत में कहीं हिंदुओं की ‘एथनिक क्लींजिंग के मानवता विरोधी अपराध की सुनवाई, अपराधियों को सजा व क्षतिपूर्ति का फैसला नहीं हुआ!

कश्मीर घाटी का सत्य- 14: मुसलमानों जागो, काफिरों भागो!

क्यों? तीन वजह है। एक, बतौर हिंदू हम सत्य का सामना करने, सत्य के लिए लड़ने का गुर्दा लिए हुए नहीं हैं। दूसरे बतौर समाज हिंदू भाईचारा वह एकजुटता मंत्र लिए हुए नहीं है, जैसे सिख, इस्लाम या यहूदियों की धर्म चेतना में है। तीन बतौर राष्ट्र भारत का शासन तंत्र यथास्थिति, मुझे क्या, मेरा क्या और शंका-आशंका और जैसे भी हो वक्त काटने, भूलने की मनोदशा में रचा-पका और बना हुआ है।

इसलिए पाकिस्तान, आईएसआई, इस्लाम जहां 1947 से कश्मीर पर दो टूक निश्चय किए हुए हैं तो भारत की रीति-नीति, एप्रोच और ढर्रे में न 1947 में स्पष्टता थी न 1990 में थी और न आज स्पष्टता है। बेसिक सवाल है कि झगड़ा यदि मुस्लिम बहुल इलाके की वास्तविकता से पैदा है तो 1947 के बाद भारत द्वारा जम्मू कश्मीर को हिंदू बहुल बनाना चाहिए था या नहीं? जम्मू कश्मीर का विलय उसे भारत की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए था या उसे कश्मीरी मुसलमानों की बस्ती, घेटो बनाना था? क्यों कश्मीर को खास दर्जा दिया? और ऐसा करके भारत को क्या प्राप्त हुआ? फिर यदि घाटी में हिंदुओं के 1990 में सफाए का सत्य है तो तीस सालों में उन्हें वापिस घाटी में बसाने की भारत को कोशिश, जोर-जबरदस्ती करनी चाहिए या नहीं?

पर हम न सत्यता से सोच सकते हैं और न ऐसा करने का माद्दा है, बल्कि उलटे 1990 से आज तक भारत और भारत की बौद्धिकता कश्मीरी पंडितों की एथनिक क्लींजिंग के मामले में भी रक्षात्मक है। घटनाएं बोलती हुई हैं कि आईएसआई, पाकिस्तान, इस्लामी कट्टरपंथियों ने (भारत की लापरवाही, नासमझी से) बाकायदा रोडमैप बना कर 1990 में घाटी में अराजकता पैदा की। घाटी में भारत सरकार, भारत की व्यवस्थाओं को खत्म किया। वैक्यूम बना हिंदुओं को भगाया। घाटी को इस्लामियत के किले में तब्दील किया। फिर इसी के हौसले में 26 जनवरी 1990 को श्रीनगर के ईदगाह में लाखों मुसलमानों के हुजूम से आजादी की घोषणा का इरादा था।

कश्मीर घाटी का सत्य-13: वीपी सिंह, मुफ्ती, फारूक से थी हिंदू ‘एथनिक क्लींजिंग’!

उस नाते 1947 के बाद जनवरी 1990 की आईएसआई साजिश सर्वाधिक खतरनाक थी। एक के बाद एक ऐसी स्थितियां, ऐसे दबाव बने, जिनमें भारत सरकार बुरी तरह फंसी। नतीजतन हिंदुओं के सफाए का सत्य न वैश्विक स्तर पर चर्चा में आया और न केंद्र सरकार में हिंदुओं को वापिस घाटी में लौटाने का संकल्प बना। दरअसल आईएसआई ने घाटी में भारत को डिफेंसिव बनाया तो दुनिया में भारत को कूटनीतिक तौर पर घेरा। तथ्य है 1990 में जब जगमोहन ने सैन्य बल से इंसर्जेंसी को कुचला तो मुशर्रफ ने 1990 में ही कारगिल से हमला बोल घाटी में उग्रवादियों का हौसला बढ़वाने का प्लान प्रधानमंत्री बेनजीर के आगे रखा था। 1989 से 1994 के पांच-छह सालों में पाकिस्तान का पूरा सिस्टम, प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो, फिर नवाज शरीफ, वापिस बेनजीर, आईएसआई भारत के खिलाफ इतने आक्रामक थे कि यदि तब जगमोहन, जनरल कृष्णराव और बतौर प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का भारत को नेतृत्व नहीं मिला होता तो सचमुच भारत घाटी गंवा बैठता। इन तीन चेहरों की वजह से भारत राष्ट्र की ताकत व वैश्विक कूटनीति में वह कमाल हुआ जो घाटी बची।

भारत की किस्मत, सौभाग्य जो जनवरी से मई 1990 के साढ़े चार महीने में राज्यपाल जगमोहन ने भारत का मान बचाया। 19 जनवरी की रात श्रीनगर में हिंदू जहां खौफ की सुनामी में उखड़े तो 20 जनवरी से जगमोहन का डंडा अभियान शुरू हुआ। श्रीनगर की सड़कों पर कलाश्निकोव रायफलें लिए घूमते आंतकियों को वह अनुभव कराया, जिससे 26 जनवरी के दिन मुसलमान की घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। मतलब ईदगाह पर लाखों मुसलमानों को एकत्र कर आजाद कश्मीर की घोषणा की आईएसआई साजिश फेल हुई। जगमोहन का डंडा दिखलाना ज्यादती नहीं थी जरूरत थी। जरूरत के मेरे शब्द के औचित्य में श्रीनगर टाइम्स के संपादक गुलाम मोहम्मद साफी के एक इंटरव्यू में बोले इन वाक्यों पर गौर करें- जगमोहन ने कार्यभार संभाला तब घाटी में प्रशासन नाम की कोई चीज कहीं नहीं थी। घाटी के पुलिस थाने लड़ाकों के अभियान के सेंटर बने हुए थे।….

कश्मीर घाटी का सत्य-12 ‘एथनिक क्लींजिंग’ का सियासी प्री-प्लान

तथ्य है इधर जगमोहन की सख्ती उधर पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का स्यापा शुरू। वे पीओके के आतंकी कैंपों में गईं। नियंत्रण रेखा के पास से घाटी के लोगों को भड़काते हुए आजादी-आजादी के नारे लगाए। जनसभा में मुंह से ‘जाग-जाग मो-मो हान-हान’ बोलते हुए हाथों के एक्शन से जगमोहन के टुकड़े-टुकड़े कराने का शर्मनाक आह्वान किया। सोचें, सीमा पार की प्रधानमंत्री भुट्टो का जगमोहन पर ऐसे भड़ास निकालना! उन्होंने खुले आम कश्मीरी मुसलमानों से बगावत करने, भारत के खिलाफ लड़ने को कहा। लड़ाकूओं को पचास लाख डॉलर की मदद की घोषणा की। 26 जनवरी को श्रीनगर में ईदगाह का प्रोग्राम फेल हुआ तो बेनजीर भुट्टो ने चार फरवरी 1990 को सर्वदलीय बैठक बुला कर पांच फरवरी के दिन को कश्मीर के साथ बतौर एकजुटता दिवस घोषित किया। फिर पाकिस्तानी संसद ने जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को नामंजूर करने और संयुक्त राष्ट्र से प्रस्ताव पारित करवाने की मांग का एक प्रस्ताव पास किया। 13 मार्च को बेनजीर ने फिर पीओके के मुजफ्फराबाद में जनसभा कर सीमा पार से मुसलमानों को भड़काया कि संघर्ष करो पाकिस्तान पीछे है।

तथ्य-सत्य है कि बेनजीर भुट्टो, आईएसआई प्रमुख हमीद गुल, सेना प्रमुख असलम बेग व राष्ट्रपति खान चारों और पाकिस्तानी अवाम तब हवा में उड़ते हुए थी। अफगानिस्तान से सोवियत संघ के भागने के बाद इस्लामाबाद का पूरा तंत्र माने बैठा था कि घाटी को आजाद कराने का वक्त है। सोवियत संघ को भगा देने से अमेरिका व पश्चिमी देश पाकिस्तान के मुरीद तो मुस्लिम लड़ाकों को भी वैधता। ध्यान रहे उसी वक्त बेनजीर भुट्टो की सरकार ने सीमांत प्रांत में ओसामा बिन लादेन को शरण दी थी तो उनके एक मंत्री मेजर-जनरल नसरूल्ला बाबर ने तालिबानी आइडिया को हवा दी। बेनजीर भुट्टो का पहला कार्यकाल दो दिसंबर 1988 से छह अगस्त 1990 का था। इसमें 20 जनवरी से मई 1990 की अवधि में वे सर्वाधिक घायल जगमोहन से थीं। उनके खिलाफ पाकिस्तानी कूटनीति ने घाटी में मानवाधिकारों के हनन का दुनिया में हल्ला मचाया तो दूसरी तरफ भारत में प्रधानमंत्री वीपी सिंह के यहां मुफ्ती मोहम्मद सईद, जार्ज फर्नांडीज (जिन्हें कश्मीर का जिम्मा था) और वामपंथी पार्टियों ने भी जगमोहन के खिलाफ भारी माहौल बनाया। दिल्ली में सेकुलर-लेफ्ट विचारवानों, मीडिया ने देश के भीतर हल्ला बना दिया कि जगमोहन तो पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) के टीका खान जैसे जुल्मी हैं! और वीपी सिंह इस बहकावे में आए। तभी उन्होंने जगमोहन को राज्यसभा सांसद बना श्रीनगर के राजभवन से हटाया।

कश्मीर घाटी का सच-11 हिंदूओं को भगवाने की भूमिका शेख की!

kashmir

जगमोहन सिर्फ साढ़े चार महीने राज्यपाल रहे। लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने घाटी के थानों, दफ्तरों और शहर के जनजीवन से उग्रवादियों का सफाया कर दिया। कलाश्निकोव रायफलें लिए उग्रवादियों को जंगलों में ऐसा खदेड़ा कि आईएसआई का पूरा प्लान पंक्चर।

गनीमत जो जगमोहन की जगह रॉ एजेंसी के प्रमुख रहे गिरीशचंद्र सक्सेना ने कमान संभाली। इसके बाद भी सही संयोग जो पीवी नरसिंह राव ने रिटायर सेना प्रमुख कृष्णा राव को राज्यपाल नियुक्त किया।

सवाल है क्या हिंदुओं का भागना जगमोहन नहीं रूकवा सकते थे? उन्होंने कश्मीरी पंडितों को श्रीनगर में ही शरणार्थी कैंप बना कर यदि रोक लिया होता तो शांति होने पर हिंदू वापिस अपने घरों में लौट आते। क्यों जम्मू भागने दिया? अपना मानना है कि 19 जनवरी की रात श्रीनगर की मस्जिदों-सड़कों पर खौफ की जो सुनामी थी, उसमें पंडित औरतों पर नारों आदि से घर-परिवार में जो दहशत बनी तो हिंदुओं में हौसला बचा ही नहीं था। फिर जगमोहन खुद भी भरोसे से यह सब सोचने की स्थिति में नहीं थे। हां, जगमोहन और भारत के पूरे तंत्र की वह जरूर शर्मनाक, अक्षम्य चूक थी जो 19 जनवरी की रात ही श्रीनगर में सुरक्षा बलों का फ्लैग मार्च नहीं हुआ। हिंदुओं में यह भरोसा नहीं बनाया कि भारत का सैन्य बल मरा नहीं है, वह अभी लड़ने, बचाने के लिए है।  

कश्मीर घाटी का सत्य-10 उफ! हर शाख पर उल्लू …. 

बहरहाल, नोट रखें यदि जनवरी 1991 से 1996 के वक्त में घाटी में जगमोहन, गिरीश चंद्र सक्सेना और जनरल कृष्णा राव की सख्ती व पीवी नरसिंह राव का सूझबूझ वाला प्रधानमंत्रित्व नहीं होता तो पाकिस्तान भारत से घाटी में बांग्लादेश लड़ाई का बदला ले चुका होता। बेनजीर भुट्टो ने अपने पिता को फांसी पर लटकाने वाले तानाशाह राष्ट्रपति जिया उल हक की सार्वजनिक तौर पर यह कहते हुए तारीफ की है कि भारत से बदला लेने के लिए जिया ने कश्मीर, पंजाब में आंतकवाद फैलाने का काबिलेतारीफ काम किया। लेकिन बेनजीर भुट्टो और आईएसआई ने तब सोचा नहीं था कि उनका मिशन जगमोहन और पीवी नरसिंह राव के आगे नहीं टिकेगा। इस पर कल। (जारी) Truth of Kashmir Valley

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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