nayaindia truth of kashmir valley घाटी है सवालों की बेताल पचीसी
हरिशंकर व्यास कॉलम | अपन तो कहेंगे | बेबाक विचार| नया इंडिया| truth of kashmir valley घाटी है सवालों की बेताल पचीसी

घाटी है सवालों की बेताल पचीसी!

Kashmir

truth of kashmir valley विचार जरूरी है कि 75 सालों में ताकत के बावजूद घाटी को भारत अनुकूल बनाने के लिए वहां मुस्लिम मनोदशा क्यों नहीं बदल पाए? अनुच्छेद 370 से खुश करने की रणनीति या अनुच्छेद 370 हटा, शक्ति प्रदर्शन के तमाम तरीकों में जो है उससे घाटी में अपनापन पैठा या छिटकाव बना? यदि घाटी हिंदू-मुस्लिम साझे का नियतिगत साझा चुल्हा है तो घाटी में बचे हुए कहां हैं हिंदू? भला इस सवाल पर नेहरू और नरेंद्र मोदी की क्या उपलब्धि है?

कश्मीर घाटी का सत्य-17:  सोचें क्या है भारत के कश्मीर घाटी का कुल अनुभव? पचहत्तर सालों में भारत के कितने लाख करोड़ रुपए घाटी में खर्च हुए? सैन्य बलों के कितने जवानों की मौत हुई? बदले में हमें क्या हासिल हुआ? दुनिया में हमारी वाहवाही हुई या बदनामी? हमारी धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र को क्या चार चांद लगे? क्या हम घाटी के मुसलमानों को आधुनिक, लिबरल और हिंदुओं के साथ सहजीवन के लिए तैयार कर सके? कश्मीर घाटी हमारी गलती है या उपलब्धि? वह हमारा स्वर्ग है या बोझ?…. इनका सत्य जवाब दिल-दिमाग को झिंझोड़ देने वाला है। जान लें कि भारत राष्ट्र-राज्य, भारत सरकार, पीएमओ-गृह-रक्षा-विदेश मंत्रालय में इस तरह सवाल-जवाब का सत्यवादी विश्लेषण संभव ही नहीं है। शायद मेरे और आपके के लिए भी नहीं। आखिर हम सब जानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्र-राज्य की सार्वभौमता-एकता की जरूरत में हमारी नियति है जो कश्मीर को अपना अंग माने रहें वर्ना टुकड़े-टुकड़े होने का खतरा मोल लें।

बावजूद इसके विचार जरूरी है कि 75 सालों में ताकत के बावजूद घाटी को भारत अनुकूल बनाने के लिए वहां मुस्लिम मनोदशा क्यों नहीं बदल पाए? अनुच्छेद 370 से खुश करने की रणनीति या अनुच्छेद 370 हटा, शक्ति प्रदर्शन के तमाम तरीकों में जो है उससे घाटी में अपनापन पैठा या छिटकाव बना? यदि घाटी हिंदू-मुस्लिम साझे का नियतिगत साझा चुल्हा है तो घाटी में बचे हुए कहां हैं हिंदू? भला इस सवाल पर नेहरू और नरेंद्र मोदी की क्या उपलब्धि है?

कश्मीर घाटी का सत्य-16: नब्बे का वैश्विक दबाव और नरसिंह राव

तथ्य है पंडित नेहरू से लेकर पीवी नरसिंह राव के 1996 तक के चालीस सालों में पाकिस्तान, आईएसआई के घुसपैठियों, सशस्त्र लड़ाकों, उग्रवादियों, आतंकियों के छाया युद्ध से घाटी का चरित्र बदला। घाटी इस्लामियत में रंग गई। घाटी से कश्मीरी पंडितों को निकाला गया। फिर अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी के मौजूदा राज के कोई पच्चीस सालों में घाटी का पत्थरबाजी से मैसेज है। यह मानना फालतू है कि अभी पत्थरबाजी नहीं के बराबर है तो घाटी के 80 लाख मुसलमान भारत की रियलिटी में बदल रहे हैं। इस मामले में अब हमेशा अफगानिस्तान का सत्य ध्यान में रखें। अमेरिका ने समझा कि उसकी कोशिशों से अफगानिस्तान आधुनिक हो गया है। पर ज्योंहि अमेरिकी सेना का हटना शुरू हुआ तो सब कुछ ताशमहल की तरह खत्म। काबुल पर तालिबानी कब्जा। यह भेद फालतू है कि तालिबानी, अफगानी, पाकिस्तानी, कश्मीरी फर्क से इस्लामियत में भी फर्क बनता है। धर्मांधता और जिद्द के मामले में दुनिया का हर मुसलमान अपने धर्म का सच्चा है। लंदन के मेयर सादिक अली हों, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान हों या तालिबानी नेता हिब्तुल्लाह अखुंदजादा, मुल्ला अब्दुल गनी बरादर, सिराजुद्दी हक्कानी सभी दूसरे धर्म, सभ्यता के साथ लिव-इन-रिलेशन की परिस्थितियों में भी इस्लामी जीवन पद्धति की जिद्द रखते हैं।

संभव नहीं है जो इस्लाम का बंदा दूसरे के रंग में रंग जाए या वह लोकतांत्रिक, सेकुलर या नास्तिक हो जाए। सोवियत संघ के 70 साला धर्म विरोधी साम्यवाद को भी इस्लाम ने हराया तो चीन भी मुस्लिम बहुल शिनजियांग प्रांत को चाइनीज नहीं बना पा रहा है। तुर्की में कमाल अतातुर्क, इंडोनेशिया में सुकार्णो, सुहार्तो की प्रारंभिक कोशिशों से वहां लोकतंत्र है लेकिन इसका जिम्मेवार कारण वहां आबादी में मुस्लिम बहुलता है। देश विशेष की दारूल-इस्लाम अवस्था में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता के अधकचरे प्रयोग हो जाएंगे लेकिन बराबर या अल्पसंख्यक आबादी की सूरत में इस्लाम अलग पहचान की धर्मांधता में ही जिएगा। वह कठमुल्ला रूख अपनाए रखेगा। तभी अमेरिका को सोचना ही नहीं चाहिए था कि उसकी कोशिशों से अफगानी मुसलमान आधुनिक, लिबरल हो जाएगा।

सो, अनुभवसिद्ध सत्य है कि दो धर्मों के साझे याकि हिंदू और मुस्लिम दोनों के बराबर संख्या में साथ-साथ रहने से मुसलमान फिर भी आधुनिक जीवन अपना सकता है। तभी जम्मू-कश्मीर के विलय को मानने के बाद भारत को घाटी में हिंदू-मुस्लिम साझा बढ़वाना था। जम्मू में जैसे दोनों आबादियों का साझा है वैसा घाटी में भी होना चाहिए था। जम्मू के हिंदुओं, शेष भारत से हिंदुओं को घाटी में बसाना था। उलटा हुआ। कश्मीरियत, इंसानियत के नाम पर घाटी में अलगाव को हवा दी गई। घाटी के मुसलमानों में गलतफहमी बनने दी गई कि वे खास हैं और खुदा ने उन्हें जन्नत बख्शी है तो कश्मीरी-पंडितों, हिंदुओं का क्या काम! 

कश्मीर घाटी का सत्य-15:  एथनिक क्लींजिंगः न आंसू, न सुनवाई! क्यों?

यह सोच वह जिम्मेवार कारण है, जिसने आईएसआई को का मौका दिया। तभी यक्ष प्रश्न है कि सन् 1947 से कश्मीर का विलय साझा जीवन की सोच में यदि मंजूर हुआ था तो उसके मकसद में हिंदू-मुस्लिम आबादी के साझे की जोर-जबरदस्ती, उसकी रणनीति क्यों नहीं बनाई गई? उलटे कैसे ऐसा होने दिया कि घाटी में सिर्फ मुसलमान रहे! क्या यही हमारी सबसे बड़ी गलती नहीं है?

हां, सन् 1947 से, सन् 1990 के बाद, सन् 2019 में अनुच्छेद 370 खत्म होने के हर मोड़, हर वक्त में भारत ने घाटी को धर्मनिरपेक्ष तासीर में ढालने में बहुत कुछ झोंका है। जानकारों में मोटामोटी हर साल पचास हजार करोड़ रुपए से ले कर एक लाख करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान है। भारत ने जम्मू-कश्मीर पर जितनी लड़ाईयां लड़ीं, जितने बंदोबस्त किए उस सबका कुल खर्च ऐसा है मानो भारत राष्ट्र का अकेले एक काम जम्मू-कश्मीर है। रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और खर्च के बोझ के नाते वित्त मंत्रालय के चार अहम मंत्रालय एक तरह से जम्मू-कश्मीर को संभालने के लिए बने हुए हैं।

बदले में क्या हासिल? एक बात और समझें कि इस स्थिति का घाटी के मुसलमान (पीओके के मुसलमानों ने भी) ने दबाकर फायदा उठाया है। गलत धारणा है कि कश्मीरी बेचारे गरीब, दीन-हीन है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के कश्मीरी मुसलमानों को ले कर भी झूठी धारणा है कि उनके साथ इस्लामाबाद का दोयम दर्जे का सलूक है। सच्चाई है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आम गैर-कश्मीरी मुसलमानों का हक, उनका पैसा, उनकी कमाई को दोनों तरफ के कश्मीरी मुसलमान खाते हुए हैं। घाटी का मुसलमान बेहद खुशहाल और अमीर है। मस्जिद के आगे लोग भीख मांगते नहीं मिलेंगे जैसे दिल्ली में जामा मस्जिद इलाके में मिलते हैं। घाटी के शहरों में अधिकांश के अपने मकान हैं तो गांवों में घर, खेत और पशु सब कुछ। भारत ने घाटी में इतना पैसा उड़ेला है कि श्रीनगर में जामा मस्जिद से लेकर मोहल्ले-मोहल्ले की मस्जिदें और घर शेष भारत के मुस्लिम इलाकों की तुलना में सौ गुना अधिक चकाचक मिलेंगी। श्रीनगर के नए इलाकों के विलानुमा मकानों के आगे दिल्ली के वसंत विहार की कोठियां फालतू लगेंगी।

ऐसा क्यों? एक, अनुच्छेद 370 के रहते वहां दबा कर टैक्स की चोरी थी। दूसरे प्रशासनिक भ्रष्टाचार से विकास कार्यों में मनमाना भ्रष्टाचार। केंद्र सरकार को हिसाब लगवाना चाहिए, रिकार्ड मंगवाना चाहिए कि घाटी के अफसरों-कर्मचारियों ने घाटी से बाहर दिल्ली जैसे शहरों में कितनी प्रॉपर्टी ले रखी है? दूसरे प्रदेशों के जयपुर, भोपाल, लखनऊ, पटना में पैसे का वह जलवा नहीं मिलेगा जो श्रीनगर में खनकता दिखेगा। भारत सरकार की कृपा, अनुदान से बनने वाले प्रदेश बजट का कितना पैसा दो नंबर की अमीरी बनवाने वाला था, इसके जितने किस्से सुनेंगे तो समझ आएगा कि श्रीनगर के सरकारी ढांचे में खर्चे की एकाउंटिबिलिटी कहां थी जो पता पड़े कि पैसा कहां गया!

kashmir

दूसरी बात भारत सरकार से बेइंतहा पैसा तो पाकिस्तान की आईएसआई भी बेइंतहा पैसा बांटते हुए। आईएसआई को पैसे की इसलिए कमी नहीं थी क्योंकि सऊदी अरब हो या दूसरे मुस्लिम देश सभी ने कश्मीरी मुसलमानों के नाम पर 70 सालों में दबाकर चंदा दिया है। घाटी के मुसलमानों में कभी चिंता नहीं थी कि महीनों घर में बैठे रहेंगे तो खाएंगे क्या! क्या ऐसा भारत के दूसरे किसी राज्य में संभव है? घाटी के भीतर और बाहर कश्मीरी मुसलमानों का कारोबारी-जिहादी-मौलानाओं का एक ऐसा एलिट वर्ग है, जिसको खाड़ी-इस्लामी देशों और एनआरआई कश्मीरियों से बेइंतहा मदद है। अपना मानना है फिलस्तीनियों के बाद कश्मीरी मुसलमानों की वह वैश्विक नेटवर्किंग है, जिसे ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देशों में समर्थन है तो सऊदी अरब, मलेशिया आदि मुस्लिम देशों से भी खैरात है। तभी एलिट कश्मीरी मुस्लिम परिवारों के यदि श्रीनगर में शानदार विला हैं तो दिल्ली, मुंबई में भी कम जायदाद नहीं।

ऐसी ही पाक अधिकृत कश्मीरी मुसलमानों की अमीरी है। साठ के दशक में कश्मीर मसले के हवाले मीरपुर से बड़ी संख्या में कश्मीरी ब्रिटेन जा बसे। एक वक्त इनसे पाकिस्तान को पचास प्रतिशत विदेशी करेंसी मिलती थी। पीओके के बाग और हवेली जिले से पाकिस्तानी सेना में सर्वाधिक सैनिक-सेनाधिकारी हैं। पाक सेना के चार सेना प्रमुख मीरपुर के जानुआ राजपूत जाति के हुए हैं। पूरे इलाके की पजेरो गाड़ियों और बेइंतहा अमीरी से पहचान है।

फिर लौटें मूल सवाल पर कि घाटी में शेष भारत के लोगों को क्यों नहीं बसाया गया? इस्लामाबाद ने पीओके में यह काम धड़ल्ले से किया। पचहतर सालों में पाकिस्तान ने अपने अधिकृत कश्मीरी इलाके की आबादी खासी बदली है। वहां पंजाब, पख्तून इलाके याकि शेष पाकिस्तान के लोग बसे हैं। ठीक विपरीत भारत में कश्मीर घाटी की बुनावट से कश्मीरी पंडित आउट हुए। घाटी में अब सौ टका इस्लामियत है। और तो और अनुच्छेद 370 के हटे दो साल बाद भी जस की तस स्थिति। तभी कोई जवाब नहीं बनता इस सवाल का कि घाटी पर हमारी रणनीति, रोडमैप क्या है? (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published.

14 − three =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
भारतीय लोकतंत्र के दो दीमक
भारतीय लोकतंत्र के दो दीमक