nayaindia truth of kashmir valley कश्मीर घाटी का सत्य दो टूक व सपाट है।
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सत्य भयावह और झांकें गरेबां!

Kashmir article 370

truth of kashmir valley कश्मीर घाटी का सत्य-3: कश्मीर घाटी का सत्य दो टूक व सपाट है। सोचें, कश्मीर घाटी क्या है? मुश्किल से छह हजार वर्ग मील का सौ किलोमीटर चौड़ा एक इलाका। जबकि नए लद्दाख राज्य का एरिया 23 हजार वर्ग मील और जम्मू डिवीजन का फैलाव कोई 10 हजार वर्ग मील है। मगर हां, आबादी में घाटी नंबर एक है। सन् 2011 में घाटी की आबादी कोई 70 लाख थी, अब शायद 80 लाख। वहीं जम्मू की आबादी सन् 2011 में 53 लाख थी तो फिलहाल 60 लाख होगी। लद्दाख में 2011 में तीन लाख आबादी थी जो अब चार-पांच लाख होगी। कहने को सन् 2011 में घाटी में हिंदू ढाई प्रतिशत थे लेकिन अब आधा प्रतिशत (1947 में 4 से 6 प्रतिशत के बीच का अनुमान) भी हों तो बड़ी बात होगी बाकी सब मुसलमान और उनमें सुन्नी बहुलता। उधर जम्मू में 33 प्रतिशत और लद्दाख में 46 प्रतिशत मुसलमान (शिया बहुल) हैं।

अनुच्छेद 370 खत्म होने और 2019 के जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल के बाद नए नक्शे में घाटी सिकुड़ी है। सौ किलोमीटर चौड़ी घाटी भारत के कई जिलों से छोटी होगी। सवाल है एक जिले जैसे इलाके के 55-65 लाख लोगों ने (सन् 1990-2000 के एक दशक में) कैसे भारत राष्ट्र-राज्य की धर्मनिरपेक्षता को झेलम में बहा दिया? क्यों नहीं भारत का सैनिक बाहुबल घाटी के मुसलमानों को डरा सका कि यदि हिंदुओं को डराया तो तुम लोगों का जीना हराम होगा। हां, कैसे भारत राष्ट्र फेल हुआ और घाटी कश्मीरियत, इंसानियत छोड़ कर इस्लामियत का कलंक बनी?

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क्या ऐसा होना इस सच्चाई का सबूत नहीं है कि भारत राष्ट्र-राज्य ने सुरक्षा बल से वह सख्ती की ही नहीं, जिसे जुल्म या ज्यादती मानें! कल्पना करें यहूदी सुरक्षा बल, ब्रितानी सेना (आयरिश मसला) व चाइनीज सख्ती (शिनजियांग) के आगे वहां के उग्रवादी क्या वह कर पाए या कर सकते हैं, जो घाटी में मुसलमानों ने खौफ बना कर किया है? तो जुल्मी भारत देश या घाटी में इस्लामियत बनवाने वाली भीड़?

जाहिर है हिंदू नरमदिली से क्योंकि भारत राष्ट्र है तो घाटी में इस्लामियत का मौका बना। सच है कि सभी हिंदू प्रधानमंत्रियों, नेताओं ने कश्मीरी मुसलमानों के कश्मीरियत, इंसानियत में ढले होने का विश्वास किया। इसी के चलते पंडित नेहरू ने सरदार पटेल की बजाय खुद जम्मू कश्मीर का विलय हैंडल किया। राजा हरि सिंह में दुविधा बनने दी। पाकिस्तान को दांव का मौका मिला। दरअसल कश्मीरी पंडित नेहरू इस रूमानियत में ताउम्र रहे कि उनके वंश की जन्म नाल वाली घाटी खास है, कश्मीरियत वाली है, जिसमें शेख अब्दुल्ला याकि मुसलमान के साथ साझा चुल्हा है। हां, मेरा 1985 से पहले घाटी के जितने ब्राह्मण पंडितों से (जेएनयू की क्लास में कश्मीरी कौल, सिख से लेकर एमएल फोतेदार तक) संपर्क रहा उन सबसे मैंने बार-बार सुना कि घाटी की बात ही अलग है! शेख साहब शेरे कश्मीर थे और घाटी के अलग दर्जे से ही पाकिस्तान का काउंटर है। नेहरू और उनके साथ कश्मीरी पंडित हिंदुओं ने समान भाव सोचा कि कश्मीरियत खास है तो अनुच्छेद 370 से घाटी का इंटीग्रेशन होगा। सही यह भी हैं कि नेहरू और कांग्रेस ने बतौर एक उपाय अनुच्छेद 370 का प्रयोग किया था और मुगालता था कि वक्त के साथ यह घीस-घीस पर खत्म होगी और घाटी देश की मुख्यधारा में समरस होगी।

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यह उदारमना, भोलेमन व राज की कला को नहीं जानने वाले हिंदूओं का मुगालता था। नेहरू के दिमाग में या राजा हरि सिंह, और प्रधानमंत्रियों में यह ख्याल, यह दूरदृष्टि नहीं बनी कि इस्लाम ने 1947 में नए मुल्क पाकिस्तान का पड़ाव पाते ही जब तुरंत जम्मू कश्मीर में कबाइली भेजे हैं तो जाहिर बात कि इस्लाम का अगला लक्ष्य कश्मीर है। इस्लाम देर सबेर कश्मीरियत को निगल लेगा और कश्मीर में मिशन इस्लामियत। कबीलाई हमले से हिंदू राज के दिमाग में घंटी बज जानी थी। हर हिंदू नेता को मुस्लिम बहुसंख्या की हकीकत में समझ लेना था कि धर्मनिरपेक्षता, हिंदू-मुस्लिम साझे की अग्निपरीक्षा कश्मीर में है और उसमें यदि फेल हुए तो धर्मनिरपेक्षता फेल।

यह सच्चाई नहीं बूझी गई। तभी सभी हिंदू प्रधानमंत्री कश्मीरियत, इंसानियत के झूठ, धोखे में जीते हुए धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव के मुगालते में जीये। पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, शास्त्री से लेकर वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी सभी ने कश्मीरियत, इंसानियत के तराने गाए। किसी ने बख्शी गुलाम मोहम्मद, शेख अब्दुल्ला पर भरोसा किया तो किसी ने महबूबा मुफ्ती पर। इनमें हर कश्मीरी नेता ने हिंदू नेताओं को उल्लू बनाया और घाटी में चुपचाप वे स्थितियां बनाईं, जिनसे लोकल राजनीति, पहचान, वैचारिकता, प्रशासन, शिक्षा और भूगोल-इतिहास के सभी सांचे इस्लामियत के ढलते गए।

दिमाग चकरा जाएगा सोच कर कि कैसे घाटी इस्लामियत के सांचे का किला बनी। इसका मिशन उग्रवादियों, पाकिस्तानी एजेंटों, आईएसआई व वहाबी पैसे से लेकर नेशनल कांफ्रेस, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं, मदरसों के मौलानाओं, दफ्तरों के पटवारी-तहसीलदार, बैंक चैयरमैन से लेकर व्यापारियों, पंच-सरपंचों, लोकल मीडिया सभी की एकजुटता व साजिश से सफल हुआ। लेकिन दिल्ली के हिंदू सत्ता प्रतिष्ठान को न भनक और न समझ आई और यदि किसी को कुछ समझ भी आया तो उनका भयाकुल दिमाग फैसले नहीं ले सका।

तभी कश्मीर घाटी एक केस स्टेडी है। यदि भारत को, हिंदुओं को भविष्य की चुनौतियों का मुकाबला करना है, उनसे पार पाना है तो घाटी की हकीकत में उठे सवालों पर विचारना होगा? लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता, इंसानियत, कश्मीरियत जैसे जुमलों पर भारत क्या इस्लामियत के ऐसे अलग-अलग टापू बनने देगा? तब क्या 1945 में मोहम्मद अली जिन्ना के इंटरव्यू की वह कल्पना सही नहीं होगी कि हर जिले में एक पाकिस्तान और एक हिंदुस्तान! हां, आज भले सेना, सुरक्षा बल, व्यवस्था, राजकाज सब से घाटी नियंत्रण में लगे लेकिन हिंदू लुप्त घाटी ही तो जिन्ना का सपना था! तभी सच जानना-समझना होगा नहीं तो आने वाले दशकों में भारत के कई इलाकों में मुस्लिम बहुलता की वास्तविकता में ऐसी और घाटियां बन सकती हैं, जिनसे हिंदू वैसे ही भागेगा जैसे कश्मीर घाटी से भागा है।

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गलतफहमी न पालें कि सूरमा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ परिवार की छप्पन इंची छाती रामबाण उपाय है। न सोचें कि अनुच्छेद 370 खत्म होने से घाटी में हिंदू जा बसेंगे या देश के चुनावों में पानीपत की तीसरी लड़ाई जैसे हुंकारे से इस्लामियत डरेगी। भारत आधुनिक काल का वह संकट है, जहां साझे चुल्हे की बुनावट और अनिवार्यता के बावजूद बहुसंख्यक सत्तावानों को न राज करना आता है और न भयमुक्त जिंदगी जीना आता है और न डट कर लड़ना आता है। हर हिंदू को घाटी के इस कटु सत्य को गांठ बांध भविष्य की चिंता करनी चाहिए कि उन्होंने भगाया और हम भागे। और उसके बाद वह गुर्दा नहीं जो लौट कर साझे चुल्हे के लिए घाटी को सख्ती से दुरूस्त करें।

सर्वाधिक जरूरी है अनुभव और गरेबां में झांकना। सत्तर साला इस अनुभव को गहराई से समझना होगा कि कैसे देश के एक इलाके के लोगों ने संविधान, धर्मनिरपेक्षता, कानून-व्यवस्था सबको धत्ता बता कर पूरा इस्लामी कनवर्जन कर डाला? घाटी में कैसे इस्लाम का वह खेला हुआ जो पता भी नहीं पड़ा और हिंदुओं से घाटी खाली करा ली! हां, भारत व दुनिया के सभ्यता विशेषज्ञों, अध्येताओं, रिसर्चरों को कश्मीर घाटी जा कर समझना चाहिए कि यह कैसे हुआ जो घाटी में कश्मीरी पंडितों के लिए दो गज जमीन भी नहीं बची और न जीने की ऑक्सीजन! यहां इससे मतलब हिंदू व कश्मीरी पंडित की हिम्मत का है। नोट करें सात साल से मोदी-शाह की सरकार है, अनुच्छेद 370 खत्म है, सुरक्षा बल रिकार्ड तोड़ संख्या में मौजूद हैं बावजूद इसके पंडितों में श्रीनगर लौटने का साहस नहीं है।

सवाल है कश्मीर घाटी के अनुभवों को क्या ईमानदारी से जाना-समझा जा सकता है? बहुत मुश्किल है। वजह फिर हिंदुओं का, भारत राष्ट्र-राज्य द्वारा घटनाओं का सत्यता से रिकार्ड नहीं रखना हैं। जो विवरण है वह सेकुलर बनाम कम्युनल चश्मे से है। मैं यदि आज इतनी सघनता से विचार रहा हूं तो ऐसा मानने वाले कम नहीं होंगे कि मैं हिंदुवादी और कम्युनल हूं। जबकी पूरी दुनिया, हर जन के आगे यह सत्य दो टूक है कि घाटी पंडितों से खाली है। घाटी धर्मनिरपेक्षता की कब्र है। सोचे क्या नेहरू-इंदिरा गांधी और उदारमना हिंदुओं ने भी सपने में कभी सोचा होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब घाटी में हिंदू और पंडित ढूंढे नहीं मिलेंगे! और इस रियलिटी पर क्या कथित सेकलुर-कम्युनल हिंदू को क्या अलग-अलग राय रखनी चाहिए? क्या सोनिया गांधी-राहुल गांधी इस रियलिटी में गुस्सा नहीं होंगे कि जो घाटी नेहरू वंश का खूंटा थी वहां कश्मीरी पंडितों के चेहरे लुप्त हैं!

तभी हर हिंदू को ईमानदारी, गहराई से अनुभवों पर गौर करते हुए सत्य खोजना चाहिए, जवाब तलाशने चाहिए कि ऐसा हुआ तो कैसे? वे कौन सी गलतियां हैं, जिन्हें हम भविष्य में न दोहराएं। जाहिर है आसान नहीं है मसला। कई किताबें लिखी जा सकती हैं। बावजूद इसके मैं सार-संक्षेप में अनुभवों को समेटते हुए आगे कोशिश करूंगा कि सत्यता का उजियारा बने। (जारी)

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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