Truth of Kashmir Valley झूठी धारणा है कि 1947 में हिंदू बनाम मुस्लिम का विभाजक
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जम्मू में था रक्तपात न कि घाटी में!

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Truth of Kashmir Valley झूठी धारणा है कि 1947 में हिंदू बनाम मुस्लिम का विभाजक सेंटर घाटी थी। या यह मानना कि शेख अब्दुला धुरी थे। उनसे घाटी में शांति रही। ये फालतू बातें हैं। सन् 1946-1948 में जो हुआ वह महाराजा हरिसिंह और जम्मू केंद्रीत था। जम्मू में ही सर्वाधिक रक्तपात हुआ। इतना अधिक कि विभाजन दौरान पंजाब में सर्वाधिक खूनखराबे की धारणा भी गलत लगेगी। और भारत राष्ट्र-राज्य के इतिहास का त्रासद सत्य है जो तब का सर्वदलीय कैबिनेट रक्तपात का मूक दर्शक था। जम्मू क्यों खूनखराबे का केंद्र बना? कई कारण थे। विभाजन रेखा ज्योंहि बनी तो पाकिस्तानी पंजाब से हिंदू-मुस्लिम शरणार्थियों की आवाजाही वाया जम्मू शुरू हुई। इसलिए कि तब वाया जम्मू से सियालकोट-पठानकोट का सड़क रास्ता था। जम्मू की बसावट में तब पूर्व में हिंदू और पश्चिम में मुस्लिम (पाकिस्तान से सटा इलाका) बहुलता थी। मुस्लिम बहुल इलाके में दबदबे वाली पार्टी मुस्लिम कांफ्रेस थी। उसने मुस्लिम लीग की शह और मदद से रियासत के पाकिस्तान में विलय या महाराजा को भगाने के इरादे में राजशाही के खिलाफ कश्मीर के मुसलमानों को खड़ा किया था।

कश्मीर घाटी का सत्य-5:  नेहरू ही नहीं सभी हिंदू दोषी!

हां, दिशंबर 1946 में ब्रितानी रेजिडेंट की रिपोर्ट थी कि मुस्लिम कांफ्रेस के नए नेता चौधरी गुलाम अब्बास और आगा शौकत अली मुसलमानों की एकजुटता के हवाले लोगों को भड़का रहे है। एक सियासी पहलू यह भी था कि मुस्लिम लीग ने जब पाकिस्तान का हिस्सा बनने वाले पंजाब में यूनियनिस्ट सरकार व सीमावर्ती एनडब्ल्यूएफपी में कांग्रेस सरकार को बलात गिरा कर (क्या गजब तथ्य कि विभाजन से पहले पंजाब में यूनियनिस्टो की और सीमाई सूबे में कांग्रेस की सरकार थी!) हिंदुओं को भगाना शुरू किया तो आवाजाही का रास्ता होने से जम्मू में हिंदू-मुस्लिम तनाव बनना ही था। दोनों सरकारों को गिरा कर लीग ने सीमावर्ती एनडब्ल्यूएफपी सूबे से हिंदुओं को बेरहमी से भगाना शुरू किया। हजारा जिले से भगाए हिंदू-सिख जम्मू के मुजफराबाद आदि कस्बों में पंहुचने लगे। मारकाट-बलात्कार-लूट आदि की खबरे सुन जम्मू के हिंदुओं का गुस्साना स्वभाविक था। जम्मू में हिंदू संगठित होने लगे। प्रेमनाथ डोगरा की कमान में राज्य हिंदू सभा बनी जिसमें आरएसएस, अकालियों का निश्चित ही रोल था।

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कश्मीर घाटी का सत्य-4: उफ! ऐसा इतिहास, कैसे क्या?

रियासत के भीतर हिंसा की चिंगारियों से पूंछ के सीमावर्ती इलाकों में भयावह आग लगी। नवंबर 1946 से सितंबर 1947 के ग्यारह महिनों की अवधि में बाग तहसील के अब्दुल कयूम खान, जून के महिने में सरदार इब्राहिम चौधरी, अगस्त में हमीदुल्ला ने पूंछी मुसलमानों को अलग-अलग तरह से उकसाया। उन्हे हथियारबंद, गोलबंद किया और आखिर में राजशाही को उखाड़ फैकने के लिए राजधानी की और कूच का ऐलान हुआ। कहते है दस हजार लोगों का हुजूम था। सामने डोगरा सेना थी। सेना वैसे ही मुसलमानों द्वारा राशन-पानी बंद किये जाने और अपनी नाकामियों से गुस्से में थी। सो सेना ने दंगाईयो पर गोली चलाई। खबर जंगल में आग की तरह फैली।  मुस्लिम नेताओं ने तिल का ताड़ बनाया। उत्तरी पाकिस्तान में ब्रितानी सह उच्चायुक्त स्टेफंसन ने तब लिखा था- पूंछ का मामला… तिल का ताड़ था (the Poonch affair… was greatly exaggerated)। मगर सीमा पार की लीग और जम्मू की मुस्लिम कांफ्रेस ने मौका नहीं चूका। 4 सिंतबर को खाकी-हरी ड्रेस पहने व काहूठा-मुरी के साठी, कबाईलियों ने पूंछ इलाके में घुसपैठ की और बगावत से पहले ही बन गए मुस्लिम कब्जे के बेस (वही आगे रियासत का एक-तिहाई हिस्सा पाक अधिकृत ‘आजाद कश्मीर’ कहलाया) से बारामुल्ला, श्रीनगर की और बढ़ना शुरू किया।

मतलब वजिरिस्तान के कबाईलियों व पख्तून पठानों का हमला बाद में था। उससे पहले ही रियासत के जम्मू क्षेत्र के पूंछ, मीरपुर व मुजफराबाद में मुसलमानों की बगावत थी। वह ब्रितानी सेना, जम्मू सेना से रिटायर या बागी मुस्लिम सैनिकों की तैयारियों से थी! वह सशस्त्र बगावत थी। लोगों ने राजपूत डोगरा सेना का राशन-पानी बंद किया। सेना ने जोर-जबरदस्ती की भी तो मुस्लिम कांफ्रेंस की तैयारियों के आगे टिक नहीं पाई। सेना और बागियों में वह सब हुआ जो झंडे व जिद्द की लडाई में होता है। एक एमएलए सरदार इब्राहीम ने 15 जून को कोई बीस हजार मुसलमानों की भीड़ से राजशाही को उखाड़ फेंकने का भाषण देते हुए हुए कहा था कि पाकिस्तान बन रहा है और वह हमारे साथ है।

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कश्मीर घाटी का सत्य-3: सत्य भयावह और झांकें गरेबां!

जम्मू इलाके में हिंसा का दूसरा भयावह वाकिया पाकिस्तानी पंजाब से आ रहे हिंदू-सिख शरणर्थियों के अनुभवों को सुन कर बनी भावनाओं से था। हिंदुओं ने प्रतिक्रिया में जम्मू के बाकि इलाकों से मुसलमानों को भगाना शुरू किया। इस अभियान में डोगरा सेना, सिख, हिंदू और अकाली व आरएसएस के लोगों का कितना-कैसा रोल था, यह विवादास्पद है। प्रतिहिंसा में कितने मुसलमान मरे और कितने पाकिस्तान भगाए गए, यह भी विवादास्पद है। इतना तय है कि 14 अक्टूबर से शुरू हुई हिंसा अक्टूबर के आखिर में वह रूप ले चुकी थी जिससे लाखों मुसलमान पाकिस्तान भागे। उसी दौरान हिंसा में बीस हजार से पचास हजार, एक लाख मुसलमानों के मरने का अनुमान है। उस वाकिये को मुसलमान राजौरी नरसंहार के नाम से याद रखते है। आज भी वह वाकिया जम्मू और घाटी के मुस्लिम मनौविज्ञान में पैंठा हुआ है। इससे मुस्लिम-डोगरा खुन्नस बनी।

राजौरी की घटना मुस्लिम नेताओं का बहाना बनी। इसी के हवाले पाकिस्तान ने न केवल हिंदू बनाम मुस्लिम में जम्मू-कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमानों के हक की अंतरराष्ट्रीय राजनीति शुरू की बल्कि रियासत से राजशाही को खत्म करने, अपना कब्जा बनाने के लिए 21-22 अक्टूबर को हजारों सशस्त्र पठानों को रियासत में घुसा दिया।

इससे और भारी रक्तपात। हिंसा के इस तीसरे दौर में पाकिस्तानी-कबीलाई सेना बनाम भारतीय सेना की लड़ाई अलग है। उस पर आगे चर्चा करूंगा। फिलहाल फोकस क्योंकि जम्मू में रक्तपात पर है तो 25 नवंबर को जम्मू के मीरपुर (अब पाक अधिकृत) में पख्तूनी-पठानी-पाकिस्तानियों की बर्बरता (बगदादी के इस्लामी स्टेट से कम नहीं) का तथ्य पहले जाने। वह पठानों द्वारा हिंदुओं-सिखों का नरसंहार था। मीरपुर,कोटली,भीम्बेर के पास-पास के इलाके में तब कोई 75 हजार हिंदू-सिख और और पश्चिमी पंजाब के झेलम से भाग कर आए 25 हजार शरणार्थी रह रहे थे। इन सबके साथ वैसा ही हुआ जैसे तालिबानी इन दिनों करते है। सशस्त्र पठान सुबह शहर में घुसे और जो हिंदू, सिख नजर आया उसको गोली मार या गर्दन काट कर हत्या। वीभत्सता, हैवानियत के जितने तरीके हो सकते है उनसे लोगों को मारा गया। ढूंढ-ढूंढ कर मारकाट, आगजनी, लूटमार और महिलाओं के साथ बलात्कार। कहते है सिर्फ ढाई हजार हिंदू-सिख बचकर भारत पहुंच पाए। पठानों ने हिंदू-सिखों को इकठ्ठा कर अली बैग के गुरूद्वारे में ले जाते हुए कोई दस हजार लोगों को मारा। पांच हजार औरतों का अपहरण। असंख्या हिंदू औरतों ने जहर खा कर जान दी और कईयों को पाकिस्तानी शहरों के कोठों में बेचा गया। उस नरसंहार में मरने वालों की संख्या पर भी अलग-अलग अनुमान है। मौटा अनुमान कोई बीस हजार लोगों का। मतलब जितने राजौरी में मुसलमानों के मरने का अनुमान उतना ही मीरपुर में हिंदूओं-सिखों के मरने का अनुमान। पता नहीं इस समान संख्या का नैरेटिव कितना सही या झूठा व किससे प्रायोजित था। मगर सड़कों पर लाशों के ढेर के जो फोटो है वे दहलाने वाले है। नरसंहार के बाद कथित आजाद कश्मीर के प्रसीडेंट सरदार मुहम्मद इब्राहीम खान ने घटनास्थल का दौरा किया तो कहना था- पीडा के साथ पुष्टी करता हूं हिंदूओं-सिखों का सफाया हुआ (painfully confirmed that Hindus and Sikhs were ‘disposed of’ in Mirpur)।

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कश्मीर घाटी का सत्य-2: साझा खत्म, हिंदू लुप्त!

पूछ सकते है हिंसा के उन घावों को याद क्यों करना? ताकि सत्य जिंदा रहें! हां, मैंने-आपने और भारत की सभी सरकारों ने, नेताओं ने माना है कि कश्मीरियत, इंसानियत एक ऐसा जादू-मंतर है जिससे जम्मू-कश्मीर की वादियों में हिंदू-मुस्लिम का साझा है। फालतू बात हैं। तब भी जम्मू—कश्मीर का मसला हिंदू-मुस्लिम की इतिहासजन्य ग्रंथी से था और आज भी है। मुसलमान गलतफहमी में नहीं जीता है, वह सच्चा है,वह सत्य याद रखता है जबकि हम हिंदू झूठ में जीते है। महाराजा हरिसिंह को भी हिंदू-मुस्लिम के साझे की गलतफहमी थी। उन्होने इस भरोसे में रियासत को स्वतंत्र देश बनाने तक का मुगालता पाला तो पंडित नेहरू, सरदार पटेल, सिख रक्षा मंत्री सरदार बलदेव और हिंदू महासभा के मंत्री डा श्यामाप्रसाद आदि के पहले मंत्रिमंडल ने तब तक लापरवाही में आंखे बंद रखी जब तक कि जब तक महाराजा सरेंडर याकि भारत में विलय को राजी नहीं हुए और हिंदू-मुस्लिम एकता के कथित गारटंर शेख अब्दुला को कमान नहीं मिली।

सवाल है जम्मू इलाके में नोआखली से अधिक भयावह नरसंहार हुए बावजूद इसके गांधी-नेहरू-पटेल ने लगभग अनदेखी क्यों की? क्या शेख अब्दुला आदि से हिंदू डौगरा सेना के जुल्म की सुनी-सुनाई बातों से इनमें आत्मग्लानी थी? अपना मानना है कि महाराजा हरिसिंह वैसे ही भोले, उदारमना (शोषक थे जो सामंती व्यवस्था में होता है।) और करे तो क्या करें की दुविधा वाले हिंदू थे जैसे 72 सालों से हम अपने प्रधानमंत्री और शासकों को पा रहे है। तब भी कश्मीरी पंडित-प्रधानमंत्री रामचंद्र काक कश्मीरियत, साझे चुल्हे का ज्ञान देते हुए जिन्ना के साथ तालमेल, स्वतंत्र रियासत की बातों से महाराजा हरिसिंह को बहकाते हुए था तो बाद में दूसरे कश्मीरी पंडित नेहरू भी भारत के केबिनेट में शेख अब्दुला से कश्मीरियत का माहौल बनाते हुए थे।

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कश्मीर घाटी का सत्य-1  घाटी: इस्लाम का कलंक नहीं तो क्या?

इसलिए दो भयावह नरसंहार और आजाद कश्मीर की अस्थाई सरकार बनने के बाद 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा ने बिना शर्त भारत में विलय के दस्तखत किए तो 27 अक्टूबर को भारत सरकार ने आपतकालीन प्रशासन का शेख अब्दुला को प्रशासक नियुक्त किया। नोट रखे शेख तब भी जम्मू अप्रासंगिक थे और बाद में भी रहे। उनका अमन बनवाने, जम्मू इलाके से मुस्लिम हमलावरों को बाहर निकलवाने व दिल्ली के नेताओं को सही तस्वीर बताने जैसा कोई काम नहीं किया। तो उन्होने क्या किया? इस पर कल।

Truth of Kashmir Valley

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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