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सिर्फ टिप्पणियां काफी नहीं!

Farmers reach Supreme Court

असंतोष की बात यह है कि अक्सर सुप्रीम कोर्ट की ऐसी भावनाएं महज टिप्पणियां बन कर रह जाती हैं। अगर इन्हें ठोस दिशा-निर्देश का रूप नहीं दिया गया, तो ये फिर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाएंगी।

सुप्रीम कोर्ट की टेलीविजन पर हेट स्पीच के बारे में टिप्पणियों से बेशक एक बहस खड़ी हुई है। ये बहस आज के माहौल में किसी मुकाम तक पहुंचेगी, इस बारे में ज्यादा उम्मीद रखने की गुंजाइश तो नहीं है, फिर भी अगर इस बारे में बात शुरू हुई है, तो उसका स्वागत किया जाएगा। आखिर यह एक सच है कि देश में उत्तेजना और नफरत का माहौल बनाने में टीवी न्यूज चैनलों की सबसे बड़ी भूमिका रही है। ज्यादातर चैनल इस मामले में एक राजनीतिक परियोजना का हिस्सा बन कर काम करते नजर आए हैं। इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में तल्ख टिप्पणियां कीं, तो इसने सबका ध्यान खींचा। कोर्ट ने उचित ही इस मामले में सरकार से भी सवाल पूछा। कहा कि टीवी चैनलों पर बहस के दौरान हेट स्पीच के मामले में केंद्र सरकार मूक दर्शक बनकर क्यों खड़ी है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के एम जोसेफ और ऋषिकेश राय की बेंच ने कहा कि अभद्र भाषा से निपटने के लिए एक संस्थागत तंत्र की जरूरत है।

मुख्य धारा के मीडिया में एंकर की भूमिका अहम है और अगर कोई भड़काऊ बयान देने की कोशिश करता है तो एंकर का फर्ज है कि उसे तुरंत रोक दे। हालांकि ये जुबानी टिप्पणियां हैं, इसलिए इनसे कोई गाइडलाइन अस्तित्व में आएगी, अभी ऐसी कोई आशा नहीं है, फिर भी हेट स्पीच के लिए एंकर को जिम्मेदार ठहराने का कोर्ट का रुख स्वागतयोग्य है। इन टिप्पणियों ने इस महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान खींचा है कि प्रेस की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन सबको पता होना चाहिए कि कहां एक रेखा खींचने की जरूरत है। इसके पहले जनवरी 2021 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने कहा था कि टीवी पर नफरत को रोकना कानून और व्यवस्था के लिए उतना ही आवश्यक है, जितना कि पुलिसकर्मियों को लाठी से लैस करना और हिंसा और दंगों को फैलने से रोकने के लिए बैरिकेड्स लगाना। इन बातों से तमाम विवेकशील लोग सहमत होंगे। लेकिन अक्सर सुप्रीम कोर्ट की ऐसी भावनाएं महज टिप्पणियां बन कर रह जाती हैं। अगर इन्हें ठोस दिशा-निर्देश का रूप नहीं दिया गया, तो फिर मौजूदा टिप्पणियां भी कोई प्रभाव नहीं डाल पाएंगी।

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