बेवकूफ बनाने वाली टीआरपी

समय के साथ-साथ धोखाधड़ी व बेवकूफ बनाने के तरीके बदलते जा रहे हैं। महाभारत का जब अश्वधामा मारा गया, तब ‘हाथी’ शब्द धीरे कह कर युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य को बेवकूफ बनाया था। जब हम छोटे थे तो देसी घी में डालडा मिलाने या शहद में गुड़ व चीनी मिलाने की खबरें सुनते थे। फिर जब तकनीकी का विकास हुआ व एक तरह से इलेक्ट्रानिक व सूचना तकनीक में क्रांति का युग शुरु हुआ तो लोगों ने बैकों से पैसे गायब करने व सहायता के झूठे समाचार भेज कर ठगने के तमाम मामले सामने आने लगे। अब नवीनतम मामला खबारिया चैनलों द्वारा टीआरपी घोटाला करने का है। जिसमें इस देश का सबसे बड़ा चैनल होने का दावा करने व खुद को चैनल उद्योग का युधिष्ठिर साबित करने वाले अर्नब गोस्वमाी बुरी तरह से फंस गए प्रतीत हो रहे हैं। अरनब गोस्वामी ने खबरिया व चैनल पत्रकारिता को नया आयाम दिया व ‘नेशन वांटस टू नो’ ‘देश जानना चाहता है’, बार-बार चिल्ला चिल्ला कर खुद को देश का सबसे बड़ा हितैषी पत्रकार साबित करने की कोशिश की।

यह जानना जरुरी हो जाता है कि आखिर टीआरपी घोटाला व टीआरपी क्या बला है? तमाम चैनलों की कमाई का आधार उन्हें अपने विज्ञापनों से होने वाली आय होती है व उनके विज्ञापनों की दर इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कितने लोग व सबसे ज्यादा किस कार्यक्रम को लोग देख रहे हैं? इसे टेलीविजन रेटिंग पाइंटस कहते हैं  व ब्राडकास्ट आडिंयस रिसर्च काउसिंल या बीएआरसी, टेलीविजन पर देखे जाने वाले कार्यक्रमों की लोकप्रियता का आकलन करता है।

इसके आधार पर उन कार्यक्रमों को दिखाने वाले चैनलों को विज्ञापन मिलते हैं व उसकी दरें तय की जाती है। हाल ही में मुंबई पुलिस ने पाया कि टीआरपी तय करने के काम में बहुत बड़ा घोटाला है। टीआरपी के लिए यह पता लगाया जाता है कि किस सामाजिक व आर्थिक श्रेणी के लोग कौन-कौन से कार्यक्रम ज्यादा देखते है व किस चैनल पर उन्हें कितनी देर तक देखा गया। यह अवधि कुछ घंटों से लेकर महीनों तक की हो सकती है। इनकी गणना मिनटों के आधार पर की जाती है व हर हफ्ते यह जानकारी सार्वजनिक की जाती है।

टेलीकाम रेगुलेटरी अथारटी या ट्राई ने इसे दर्शकों की पसंद पता करने का सबसे विश्वसनीय तरीका माना । जिन कार्यक्रमों की रेटिंग ज्यादा होती है उन्हें चैनल ज्यादा दिखाते हैं व उन्हें उसके लिए काफी अच्छी दरों पर विज्ञापन मिलते हैं। पिछले साल फिक्की की एक रिपोर्ट में यह कहा गया था कि हमारे टीवी उद्योग का आकार 78,700 करोड़ रुपए हैं व उसके आय का सबसे बड़ा आधार विज्ञापन ही है। ट्राई या ब्राडकास्टिग आडियंस रेगुलेटरी काउंसिल का गठन विज्ञापनदाताओं, विज्ञापन एजेंसियों व ब्राडकास्टिंग कंपनियों ने मिलकरकिया है।

इसके अलावा इसमें इंडियन सोसायटी आफ एडवरटाइजिंग व ‘द इंडियन ब्राडकास्टिंग फांउडेशन  व विज्ञापन एजेंसियों के संगठन के लोग भी शामिल है। इसका गठन 2010 में ही कर लिया गया मगर सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने इसकी आचार संहित 2014 में जारी की व जुलाई 2015 के बाद का पंजीकरण किया गया। कार्यक्रम की लोकप्रियता का पता लगाने वाली टीआरपी का पता लगाने के टीआरपी मीटर लगाए गए। इस समय ये मीटर देश के विभिन्न कोनों में 45,000 घरों में लगाए गए है।

इनके जरिए यह पता चलता है कि किस कार्यक्रम को कितनी देर देखा गया। देखने वाले लोगों को 12 श्रेणियों में बांटा गया। इसे परिवार की कमाई करने, उसकी आय व उस घरों में मौजूदा उपकरणों जिनसे बिजली की खपत से लेकर कार तक शामिल होती है रखा जाता है। घर के जितने सदस्य होते है उतने ही उपकरण मीटर के आईडी या बटन होते है। जब कोई अपनी मनपसंद का कोई कार्यक्रम देखता है तो वह अपना आईडी बटन दबा देता है व इससे उसकी आयु, शिक्षा, पसंद आदि रिकार्ड में दाखिल हो जाता है।

यह पता चलता है कि कौन सा चैनल व कार्यक्रम कितनी देर तक देखा गया व इसके आधार पर विज्ञापन की दरे तय की जाती है। अब मुंबई पुलिस ने जो मामला पकड़ा है वह टीआरपी में हेरा फेरी करते यह पाया गया कि टीआरपी उपकरण लगाने वाली कंपनी उसे लगाने वाले घरों को कोई खास चैनल या कार्यक्रम देखते रहने के लिए पैसे दे रही थी ताकि उसकी टीआरपी बढ़ जाए व उसकी विज्ञापनों से ज्यादा कमाई हो।

हालांकि सरकार को यह पहले ही पता चल गया था कि इस मामले में बहुत हेराफेरी हो रही है व उससे निपट पाना बहुत मुश्किल है व इससे निपटने के लिए कोई कानून भी नहीं है। हाल ही में पुलिस ने पाया कि टीआरपी मीटर लगाने वाली कंपनी ने एजेंट लोगों को एक खास टीवी चैनल जिसमें ‘रिपब्लिक टीवी व मराठी के फकत टीवी भी शामिल है को ज्यादा देखने के लिए रोज 400 से 600 रुपए तक दिए।

अरनब गोस्वामी का अंग्रेजी का शो ऐसे लोग देखते पाए गए जिन्हें अंग्रेजी का एक अक्षर तक नहीं आता था। मुंबई पुलिस का दावा है कि टीआरपी का आकलन करने की जिम्मेदारी जिस एजेंसी को दी गई थी उसके कुछ लोग कुछ एजेंसियों की टीआरपी बढ़ाने के लिए रोज के हिसाब से एक विशेष चैनल को देखने के लिए पैसे दे रहे थे। पुलिस सबसे ज्यादा हल्ला मचाने वाले चैनल के प्रमुख व उसके कुछ अधिकारियों से भी पूछताछ कर रही है।

मजेदार बात तो यह है कि खबरिया चैनल इस मामले में एक दूसरे पर कीचड़ उछालने व उन्हें दोषी ठहराने में लग गए है। ऐसे भी जो बुलडाग चैनल पूरी दुनिया में भौंक भौंक कर अपने कटघरे में खड़ा कर सवाल दागते हुए पूछता था कि देश तुमसे यह जानना चाहता है आज खुद वही चैनल बुरी तरह से पूरे देश के लिए जवाबदेह बन गया है। इसे कहते है वक्त का फेर। उसे ईमानदारी का प्रमाण पत्र कौन देगा जो कल दूसरो की नियत पर शक जताता रहा था।

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