ब्लू टिक… वक्त को खाता नया नशा! - Naya India
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ब्लू टिक… वक्त को खाता नया नशा!

बूढ़ा या जवान, शहरी या आम आदमी, ग्रामीण या सूट टाई वाला– हर कोई अपने फोन पर (और जियो के सौजन्य से भी) अपने सोशल मीडिया अकाउंट देख रहा है, वर्चुअल विश्व में मशहूर होने का हर आम और खास तरीका आजमा रहा है।… अपने को महान, खास बनाने की यह भूख भी नए नशेड़ी बना लोगों को भटका रही है, खोखला बना रही है।   

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इन दिनों शहर में, देश की राजधानी…. ठीक-ठीक कहूं तो दिल्ली में ट्विटर के लुटियन जोन में नई चिंता है। गुजरे कुछ दिनों से ट्विटर के ब्लू टिक वाले खाते गजब का तनाव झेल रहे हैं क्योंकि फॉलोअर घटते जा रहे हैं। दूसरी ओर ट्विटर से बहुत सारे लोगों को झटका मिला है। लोगों के वेरीफिकेशन कराने या ब्लू टिक पाने के निवेदन खारिज हुए हैं। इस पर बहुतों ने गहरी नाराजगी जताई। एक पुरानी, मशहूर अंग्रेजी पत्रिका के संपादक भौंचक थे कि उन्हें भी ब्लू टिक देने से इनकार किया गया। उन्होंने निराशा में ट्विट किया- “must admit my vanity was hurt”! हिंदी में कहूं तो, ‘मानना पड़ेगा मेरा घमंड, अहम चूर हुआ’! और मैं झूठ नहीं बोलूंगी, मैंने भी अपने लिए, इस अखबार, संपादक, साथी लेखक के लिए वेरीफिकेशन का आवेदन किया था। लेकिन सबके लिए आखिर में एक से जवाब की ही ई-मेल थी कि इस अकाउंट को वेरीफाई नहीं किया जाएगा क्योंकि इस समय यह हमारी शर्तें पूरी नहीं करता है।

‘शर्तें’! क्या मतलब है इसका? इस शब्द की व्याख्या करते हुए जवाब में किसी खास मानक (जैसे इंग्लैंड की महारानी या अमेरिका के राष्ट्रपति का इंटरव्यू लिए होने की जरूरत), सिद्धांत (जैसे बुजुर्ग होना या कछुए की तरह अनुभवी होना जरूरी) या आवश्यकता (पूरी तरह गलत कारणों से बहुत ज्यादा वायरल हुए हों) का कोई उल्लेख नहीं है।

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क्या मुझे भी आघात लगा?… यों हिंदी के पत्रकारों, संपादकों, रिपोर्टर्स, संवाददाताओं के लिए बिना पैसे-वित्तीय ताकत के ब्रांड बनना और जलवा बनाना कभी भी आसान नहीं रहा है। विशाल भारत की हकीकत में या वर्चुअल संसार में, अंग्रेजी वालों के लिए यह सब आसान है और इसलिए वे फुदकते होते हैं। लुटियंस जोन की एक संस्था, आईआईसी (इंडिया इंटरनेशनल सेंटर) हिंदी संपादकों के आवेदन देखते ही इसलिए खारिज कर देती है कि अंग्रेजीदां लोगों की भीड़ में भला हिंदी भाषी का क्या काम! … लुटियन दिल्ली के इन अंग्रेजीदां, ब्लू टिक वाले ट्विटरबाजों को देश-दुनिया सात सालों से देख रही है कि कैसे ये अहंकारी सत्तावानों के बनाए नैरेटिव में मिमियाते हुए हैं और जो लुटियन की नेटवर्किग और ब्लू टिक की चूं चूं से दूर हिंदी में कलमघसीटी करते हुए, बोलते हुए हैं वे ही अहंकारी सत्तावानों को आईना दिखलाने की हिम्मत लिए हुए हैं। फिर भले मसला नोटबंदी की बरबादी का हो या महामारी में लावारिस मौतों का।

बहरहाल, मसला हिंदी भाषी और भाषा का नहीं है, बल्कि इस खामोख्याली, इन फिजूल बातों का है कि ट्विटर के ब्लू टिक का मतलब कुछ खास बात और अंग्रेजी में ट्विट मतलब देश-दुनिया में पहचान! सोचें, हिंदी सात साल से सत्ता की पसंदीदा भाषा है बावजूद इसके न्यू इंडिया में इस भाषा को अभी भी दोयम दर्जे का, अनगढ़ और कम महत्वपूर्ण माना जाता है। पर जैसा कि मैंने कहा, मसला भाषा का नहीं है, बल्कि न्यू इंडिया में छिछली प्रतिष्ठा और भौतिकवाद के बने नए जलवे का है। भारत के मौजूदा काल में दुनियावी धन-दौलत-ऐश्वर्य से जो रोब होता है तो वह है ही लेकिन साथ ही अब सोशल मीडिया की दुनिया में ऊंची पहचान का अलग एक रोग पैदा हो गया है।

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देश अभी कोविड की त्रासदी के बाद की स्थितियां झेल रहा है। लोग बीमारी और मौत से डर कर जी रहे हैं फिर भी चाहना उस वेबसाइट पर खास पहचान पाने की है, जिसने वास्तविकताओं को विद्रूप, झूठा बनाया है दबाया, कुचला और बरबाद किया है। भला ट्विटर के ब्लू टिक का कैसे इतना महत्वपूर्ण हो जाना? ऐसे मानो व्यक्ति के काम की पहचान हो, आत्मविश्वास का आधार हो! जाहिर है हमेशा बड़ी इमेज की लालसा, छवि को लगातार बढ़ाते जाना (देश के सुप्रीम लीडर जैसी), ज्यादा से ज्यादा फॉलोअर बनाने की इच्छा, कमेंट से ज्यादा हार्ट और चख-चख की इच्छा-भूख का यह नया शगल ऐसा है कि लोग ट्विटर पर घंटों लगा देते हैं सही फोटो की तलाश और सही शब्दों के मिलान में। सब इस उम्मीद में कि जो पोस्ट किया जाए वह वायरल, सुपर हिट हो। सही या गलत का मतलब नहीं है ज्ञान और सत्य नहीं छिछोरा-उकसाने-बदनाम करने वाला कोई वाक्य, कोई गलत कारण, जिससे प्याले में तूफान आ जाए। सोशल मीडिया के चखचखबाजों में खराब प्रचार ही तो अच्छा प्रचार है।

बेशक, हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब ट्विटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक और ऐसे ही दूसरे मंचों ने हमें अपनी उस नई दुनिया में खींच लिया है, सोख लिया है, जिसमें बुद्धि-विचार-समय की बरबादी है तो घमंड, अहंकार में लोग ट्रोल किए जाने, हर्ट होने और हां, ब्लू टिक मिलने की फिजूली का नशा भी है। आज के समय में लक्ष्य अब, ‘परिश्रम के साथ सफलता’ नहीं है, बल्कि, ‘सोशल मीडिया पर अधिकतम उपस्थिति से सफलता पाना है’।

बहस करने वाले तर्क देंगे कि सोशल मीडिया सूचना पाने का साधन है, सहायता मांगने और पाने का मंच है वैसे ही जैसे कोविड की दूसरी लहर के दौरान उपयोग दिखा था। ठीक है, सही बात है। पर तब सवाल है कि कितने लोगों ने तकलीफ की अपील की और कितनों को कोई जवाब मिला? अधिकांश अपीलें भीड़ में खोती हुई थीं। यही नहीं, इस स्वार्थी, भौतिक जमाने में कोई संत नहीं है। दवाइयों और जरूरी चीजों की जमाखोरी करके जब पैसे बनाए जा रहे थे तो ट्विटर से लोकप्रयिता बनाने का मिशन भी बना हुआ था। उस मुश्किल समय में एक बहुत प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी के एक नामालूम से राजनेता से जब एक पत्रकार ने सहायता के लिए कहा था तो उन्होंने संदेश भेजा कि, “इस अपील को अपने (वेरिफायड) ट्विटर अकाउंट से ट्विट करें और पांच अन्य (वेरिफायड) अकाउंट से रिट्विट करवाएं तो समझ लेना कि आपका काम हो गया।” क्या यह किस्सा आश्चर्य में डालने वाला नहीं है?

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और नहीं, समस्या सिर्फ लुटियन दिल्ली में ही नहीं है। बेंगलुरू और पुणे जैसे महानगरों में भी है। पांचवीं फेल आकाश किसी तरह गुजारा करता है पर अपना खाली समय वह फेसबुक या इंस्टाग्राम पर गुजारता है। आंकड़े झूठ नहीं बोलते। भारत (फिलीपींस और नाइजीरिया के बाद) तीसरे नंबर पर है, जहां लोग हर दिन औसतन दो घंटा 36 मिनट सोशल मीडिया पर गुजारते हैं। इसका मतलब हुआ कि बूढ़ा या जवान, शहरी या आम आदमी, ग्रामीण या सूट टाई वाला– हर कोई अपने फोन पर (और जियो के सौजन्य से भी) अपने सोशल मीडिया अकाउंट देख रहा है, वर्चुअल विश्व में मशहूर होने का हर आम और खास तरीका आजमा रहा है। खास जगहों की अपनी तस्वीरें पोस्ट कर रहा है, जोधपुर के किले में रंग-बिरंगे कपड़ों में अपनी तस्वीरें पोस्ट कर रहा है। एडवेंचर और फर्जीपना उड़ेल दे रहा है कि शायद कुछ हो जाए। दिन बन जाए। इससे संकेत मिलता है कि यह नई भूख वह बात है जो अमीर और गरीब दोनों को शिकार बना बैठी है जो सामाजिक तौर पर नुकसानदेह होने के साथ-साथ निजी तौर पर भी बरबादी का कारण है। जो इसमें फंस जाते हैं उनकी खुशी और मन की शांति खत्म हो सकती है। यह एक ऐसी दौड़ है, जिसका चित्रण मारक वेबसाइट क्रूरता के साथ करते हैं और उसे बहुत फूहड़ ढंग से आगे बढ़ाते हैं। इसका कोई अंत नहीं है। अपने को महान, खास बनाने की यह भूख भी अंततः नशेड़ी को खोखला बनाती है।

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मैंने भी कई बार इस भंवर में अपने को फंसा महसूस किया है। मुझसे बार-बार कहा जाता है आप जितना ट्विट करेंगे आपके फॉलोअर उतने बढ़ेंगे। फॉलोअर और लाइक पाने की कुंजी निरंतरता है। ऐसे में मैं कई बार दिन भर के अपने कामों में, “आज पांच ट्विट जरूर करना है” भी दर्ज कर लेती हूं। मुझे लगने लगता है कि अगर मैं अपने लेख के ज्यादा पाठक चाहती हूं तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मेरे कई मिलियन-ट्रिलियन फॉलोअर होने चाहिए।

पर नहीं, फालतू बात! तभी फॉलोअर की संख्या कम होने के कारण मुझे ब्लू टिक नहीं मिला तो मुझे दुख नहीं हुआ। अखबार के सभी लोगों ने हैरानी जताई कि वेरीफिकेशन के लिए आवेदन ही क्यों किया था? जो हो, आप मुझे पढ़ रहे हैं यही पर्याप्त है। ठीक है, मनुष्य को समय के अनुकूल होना चाहिए पर क्या इसका मतलब यह है कि मानसिक शांति को छोड़ लाखों अनजान फॉलोअर और एक ब्लू टिक के भंवर में फंसे? फिजूल का शगल, फिजूल की खुशी का यह वह नया झमेला है, जो पढ़ने, विचारने, लिखने की गहराई को छिन्न-भिन्न बना डाल रहा है।

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