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विदेश नीति की दो उपलब्धियाँ

भारतीय विदेश नीति की कल दो उपलब्धियों ने मेरा ध्यान बरबस खींचा। एक तो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन द्वारा भारत की सराहना और दूसरी भारत और ब्रिटेन के प्रधानमंत्रियों के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर हुई बातचीत! इन मुद्दों पर यह शक बना हुआ था कि भारत की नीति से इन दोनों राष्ट्रों को कुछ न कुछ एतराज जरुर है लेकिन वे संकोचवश खुलकर बोल नहीं रहे थे। अब यह स्पष्ट हो गया है कि रूस और ब्रिटेन, दोनों ही भारत की नीति से संतुष्ट हैं और उनके संबंध भारत से दिनोंदिन घनिष्ट होते चले जाएंगे।

पहले हम रूस को लें। भारत ने यूक्रेन पर रूसी हमले का कभी दबी ज़ुबान से समर्थन नहीं किया लेकिन उसे अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्रों की तरह रूस के विरुद्ध आग भी नहीं बरसाई। उसने यूक्रेन से अपने हजारों नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला, उसे टनों अनाज भेंट किया और कुछ प्रस्तावों पर संयुक्तराष्ट्र संघ में उसका साथ भी दिया। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शांघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में साफ़-साफ़ कह दिया कि यह वक़्त युद्ध का नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध तुरंत बंद होना चाहिए।

शायद इसी का असर था कि पूतिन ने परमाणु-युद्ध की आशंका से त्रस्त सारे विश्व को आश्वस्त किया कि उनका इरादा परमाणु बम चलाने का बिल्कुल नहीं है। अब उन्होंने मास्को के एक ‘थिंक टैंक’ में भाषण देते हुए न केवल मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा की बल्कि कहा कि इस संकट के दौरान भारत के साथ रूस का कृषि व्यापार दुगुना हो गया, उर्वरक निर्यात 7-8 गुना बढ़ गया और आपसी व्यापार 13 अरब से कूदकर 18 अरब डाॅलर का हो गया। रूसी तैल ने भारत की जरूरत पूरी कर दी। पूतिन ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की जमकर तारीफ की है। यह तब है जबकि भारत अमेरिका के साथ कई मोर्चों पर पूरी तरह सहयोग कर रहा है।

चीन को इससे काफी जलन हो रही है लेकिन भारत के बारे में रूस का मूल्यांकन सही है। इसी तरह ब्रिटेन-भारत मुक्त व्यापार समझौते के संपन्न होने के पूरे आसार दिखाई पड़ने लगे हैं। ऋषि सुनाक ने प्रधानमंत्री बनते ही अपने विदेश मंत्री को सबसे पहले भारत भेजा है। मोदी और सुनाक की बातचीत से मुक्त व्यापार का रास्ता काफी साफ हुआ है। लंदन में यह डर बताया जा रहा था कि उक्त समझौता यदि हो गया तो ब्रिटेन में भारतीयों की भरमार हो जाएगी और वे ब्रिटिश बाजारों पर कब्जा कर लेंगे।

इसके अलावा ब्रिटेन चाहता है कि उसकी मोटर साइकिलों, शराब, केमिकल्स और अन्य कई चीज़ों पर भारत ज़्यादा टैक्स-ड्यूटी न लगाए। ऐसे ही भारत भी अपने कृषि-पदार्थों, कपड़ों और चमड़े आदि के समान पर ड्यूटी घटवाना चाहता है। उम्मीद है कि कुछ दिनों में यदि उक्त समझौता हो गया तो अन्य कई यूरोपीय देशों के दरवाज़े भी भारतीय माल के लिए खुल जाएंगे।

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By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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