nayaindia two pictures of india भारत की दो तस्वीरें
बेबाक विचार | लेख स्तम्भ | संपादकीय| नया इंडिया| two pictures of india भारत की दो तस्वीरें

भारत की दो तस्वीरें

two pictures of india

अब अगर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी सरकार को मनरेगा जैसे स्कीम पर न सिर्फ चुस्ती से अमल, बल्कि उसके विस्तार का सुझाव दे, तो देहाती इलाकों में हालात कैसे बन गए हैं, इसका अंदाजा लगाया गया जा सकता है। इन तीनों आकलनों में एक बात यह भी समान है कि इनकी चिंता अर्थव्यवस्था है।

रघुराम राजन वामपंथी सोच वाले अर्थशास्त्री नहीं हैं। बल्कि वे नव-उदारवादी सोच वाले विशेषज्ञ की है। यही बात मुंबई स्थित थिंक टैंक पीपुल्स रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकॉनमी (प्राइस) पर लागू होती है। हिंदुस्तान यूनिलिवर लिमिटेड (एचयूएल) तो खैर खुद ही एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है। अब तीनों ने एक समान बात कही है। रघुराम राजन ने भारतीय अर्थव्यवस्था की अंग्रेजी के अक्षर K शेप में हो रही रिकवरी को लेकर चेतावनी दी है। इसका अर्थ होता है कि जो ऊपर है, वह और ऊपर जा रहा हो और नीचे है, वह और नीचे जा रहा हो। प्राइस ने अपने एक ताजा सर्वे के आधार पर कहा है कि 2015 के बाद के पांच वर्षों में टॉप 20 फीसदी आबादी की आमदनी लगातार बढ़ी है, जबकि निचली 60 प्रतिशत आबादी की आमदनी में गिरावट आई है। महामारी काल में ये गिरावट अत्यधिक हो गई। एचयूएल ने पिछले दिनों जब अपने कारोबार की सालाना रिपोर्ट जारी की, तो उसमें उसने बताया कि भारत के ग्रामीण इलाकों में क्रय शक्ति में भारी गिरावट आने के कारण उपभोग में भारी कमी आ गई है। इस वजह से कंपनी के उत्पादों की बिक्री गिरी है। अब अगर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी सरकार को मनरेगा जैसे स्कीम पर न सिर्फ चुस्ती से अमल, बल्कि उसके विस्तार का सुझाव दे, तो देहाती इलाकों में हालात कैसे बन गए हैं, इसका अंदाजा लगाया गया जा सकता है।

Read also बोस थे हिंदू विरोधी, मुस्लिमपरस्त

इन तीनों आकलनों में एक बात यह भी समान है कि इनकी चिंता अर्थव्यवस्था है। यानी ये ऑक्सफेम या दूसरी स्वयंसेवी एजेंसियों की की तरह सामाजिक कल्याण की भावना से चिंतित नहीं हैँ। यह अर्थव्यवस्था का आम सिद्धांत है कि आर्थिक वृद्धि तभी होती है, जब उपभोक्ता बाजार फैल रहा हो। साधारण प्रश्न है कि अगर बिक्री की संभावना ही ना हो, तो कोई पूंजीपति क्यों निवेश करेगा? ऊपरी 20 फीसदी आबादी के उपभोग का स्वरूप अलग होता है। उनके बीच उच्च यानी महंगी श्रेणी की वस्तुओं का बाजार तो होता है, लेकिन आम मैनुफैक्चरिंग या सेवाओं के कारोबार को उनसे कोई लाभ नहीं होता। लेकिन यह तबका समाज में खुशफहमी बनाए रखने में जरूर मददगार बनता है। संभवतः सरकार का सारा ध्यान उसकी तरफ है। बहरहाल, वित्त मंत्री के पास अगले एक फरवरी को इस आकलन को गलत साबित करने क मौका मिलेगा। वे चाहें, तो गैर-बराबरी घटाने वाली योजनाओं का एलान उपरोक्त चिंताओं को दूर करने की दिशा में एक पहल कर सकती हैँ।

Leave a comment

Your email address will not be published.

six − 5 =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
एशियाई शेरों के लिए बाघों की अदला-बदली करेगा महाराष्ट्र
एशियाई शेरों के लिए बाघों की अदला-बदली करेगा महाराष्ट्र