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दुःस्वप्न का साकार होना

यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि हम अपने देश का क्या करना चाहते हैं? हम इसे प्रगति के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं या इसे निरंतर युद्ध की मानसिकता में धकेल कर अप्रिय घटनाओं की स्थिति बनाए रखना चाहते हैं?

जो आशंकाएं मन में घुमड़ रही हों, अगर वो सच होने लगें, तो जाहिर है, उसमें कोई आश्चर्य तो नहीं होता, लेकिन उससे पैदा होने वाली व्यग्रता अंदर तक जख्मी करती है। उदयपुर की घटना कुछ इसी तरह की है। धार्मिक उन्माद में की गई जघन्य हत्या भारत में बन रहे खतरनाक माहौल का ही एक संकेत है। जब भावनाएं लगातार उबलती रहें, तो उनके कहीं विस्फोट होने की गुंजाइश भी लगातार बनी रहती है। राजस्थान पुलिस की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उसने आरोपियों को अविलंब पकड़ लिया। राजस्थान सरकार ने स्थिति को काबू में रखने के लिए जो चुस्ती और परिपक्वता दिखाई, उसकी भी प्रशंसा होनी चाहिए। लेकिन अगर तमाम राजनीतिक शक्तियों ने इस घटना के बाद जिम्मेदारी का परिचय नहीं दिया और इस घटना का इस्तेमाल भी सियासी रोटी सेंकने में जुट गईं, तो फिर इस समय तमाम विवेकशील लोग जिन दु-स्वप्नों को जी रहे हैं, उनके सच हो जाने की परिस्थितियां और गंभीर रूप में सामने आ सकती हैँ।

यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि हम अपने देश का क्या करना चाहते हैं? हम फिर से इसे प्रगति और विकास के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं या इसे निरंतर युद्ध की मानसिकता में धकेल कर उदयपुर जैसी घटनाओं की स्थिति बनाए रखना चाहते हैं? कभी समझा जाता था कि मजहबी और अन्य भावनात्मक मुद्दों का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां सत्ता पाने के लिए करती हैं- लेकिन जब एक बार सत्ता मिल जाती है, तो फिर वे उदार रुख अपना कर पहले भड़काई गई भावनाओं को काबू में ले आती हैं। इसलिए कि आगे बढ़ना तो दूर, कोई भी समाज लगातार उबलती मानसिकताओं के साथ शांति और स्थिरता को बनाए रखने की कल्पना भी नहीं कर सकता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में जनता ने जिन लोगों को सत्ता सौंपी, उन्होंने अपना हित लगातार ऐसी मानसिकता बनाए और उसे भड़काए रखने में देखा है। लेकिन अब स्थिति खतरनाक हद को पार करती दिख रही है। इसलिए अभी से भी रास्ता बदलने की जरूरत है। कानून, अपराध, और न्याय की धारणाओं हाल में जैसे जख्म लगे हैं, अब उन पर मरहम लगाने की जरूरत है।

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