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यूनियनों का ‘भारत बंद’

Unions Bharat Bandh

इसके लिए खुद ट्रेड यूनियनें भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने बदलते वक्त के मुताबिक अपनी रणनीति और तौर-तरीकों को नहीं बदला। मजदूरों में राजनीतिक चेतना लाना बहुत पहले उनके एजेंडे से निकल चुका है। ऐसे में यूनियनों की गतिविधि का सारा मकसद मजदूर वर्ग को फौरी राहत दिलवाना भर रह गया है। Unions Bharat Bandh

 मजदूर संगठनों की दो दिन आम हड़ताल का छिटपुट असर तो रहा, लेकिन यह वैसा प्रभाव नहीं पैदा कर पाया, जिसकी अपेक्षा ट्रेड यूनियनों ने की थी। इस हड़ताल का समर्थन किसान संगठनों ने भी किया था। इसलिए भी इस पर नजर टिकी हुई थी। ऐसे कयास लगाए गए कि क्या मजदूर और किसान मिल कर संघर्ष का कोई ऐसा मॉडल बना पाएंगे, जिसको लेकर वर्तमान सरकार चिंतित हो। स्पष्टतः फिलहाल ऐसा नहीं हुआ है। इससे ये बात फिर रेखांकित हुई है कि भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन अपनी चमक और आकर्षण खो चुका है। इसकी वजहें उद्योग और कारोबार जगत का बदलता स्वरूप है, लेकिन सिर्फ यही नहीं है। इसके लिए खुद ट्रेड यूनियनें भी जिम्मेदार रही हैं, जिन्होंने बदलते वक्त के मुताबिक अपनी रणनीति और तौर-तरीकों को नहीं बदला। मजदूरों में राजनीतिक चेतना लाना बहुत पहले उनके एजेंडे से निकल चुका है। ऐसे में यूनियनों की गतिविधि का सारा मकसद मजदूर वर्ग को फौरी राहत दिलवाना भर रह गया है। इसमें जब-तब सफलता मिल सकती है, लेकिन इससे मजदूर आंदोलन वह रूप नहीं ले सकता, जिससे वह व्यवस्था की निरंकुशता पर लगाम लगाने में सफल हो।

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गौरतलब है कि केंद्रीय श्रम संगठनों के एक साझा मंच ने केंद्र सरकार की कई नीतियों के खिलाफ दो दिनों के भारत बंद का ऐलान किया। कहा गया था कि इस वजह से पूरे देश में बैंक, यातायात, बिजली और टेलीकॉम जैसी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। श्रम संगठनों ने दावा किया था कि बंद में संगठित और असंगठित क्षेत्र के 20 करोड़ से भी ज्यादा कर्मचारी शामिल होंगे। बैंक, सड़क यातायात, रेल, स्टील, तेल, टेलीकॉम, कोयला, डाक, आय कर और बीमा जैसे क्षेत्रों के कर्मचारियों के हड़ताल भी शामिल होने की संभावना जताई गई थी। ऐसा नहीं है कि बंद का बिल्कुल असर नहीं हुआ। कई जगहों पर मजदूरों ने अपनी मांगों के समर्थन में जुलूस निकाले या सभाएं कीं। लेकिन यह सब एक सामान्य गतिविधि की तरह बना रहा। बंद में आइएनटीयूसी, एआईटीयूसी, एचएमएस, सीआईटीयू जैसे कई श्रम संगठनों ने हिस्सा लिया। संगठनों के साझा मंच की प्रमुख मांगों में लेबर कोड को खत्म करना, सरकारी कंपनियों के निजीकरण को रोकना, नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (एनएमपी) को खत्म करना, मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ाना और अनुबंध पर काम करने वाले कर्मचारियों को पक्का रोजगार देना शामिल हैं।

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