Yogi Adityanath Narendra Modi योगी का कंधा और मोदी का टेकओवर!
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योगी का कंधा और मोदी का टेकओवर!

Yogi Adityanath Narendra Modi

बूंद भी नहीं और झाग ही झाग! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो दिन लखनऊ में रह कर सूर्य उगा डाला। योगी के कंधे पर हाथ रखे अपनी एक फोटो से ऐसा हल्ला बनाया मानो वे योगी के त्राता। मतलब योगी ने सत्यानाश कर दिया था लेकिन अब उन्होंने उनके कंधे पर हाथ रख दिया है तो सब ठीक। और भोले योगी ने ख्यालों की उड़ान में तुकबंदी कर डाली कि सूर्य उगाना है! आकाश से ऊंचा जाना है! Yogi Adityanath Narendra Modi

उफ! ये सूर्य उगाएंगे, ये आकाश से उंचे जाएंगे! अपना मानना है पूरा फोटोशूट नरेंद्र मोदी की रणनीतिक टीम के आइडिया में था। मोदी ने खुद न केवल योगी को बुला कर उनके कंधे पर हाथ रख कर फोटोशूट करवाया, बल्कि एजेंसी को फोटो जारी करने, व योगी को कविता दे कर उनसे ट्विट करवा कर प्रायोजित झाग बनवाया ताकि यूपी के भक्त हिंदू वोटों में भरोसा लौटे। वहीं योगी भी आकाश में उड़ने लगे। सवाल है कि भला योगी को आकाश में उड़ाने की क्यों जरूरत? इसलिए कि मोदी-शाह ने मोटा-मोटी योगी को अगला मुख्यमंत्री नहीं बनाने का इरादा बनाया है। यह काम तब आसान होगा जब चुनाव से पहले योगी के भक्तों के टिकट कट जाएं। ये फालतू बातें हैं कि मोदी-योगी के ताजा फोटो से अमित शाह आउट हैं या योगी भावी प्रधानमंत्री याकि नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी! 

हां, मेरे इस आकलन को नोट रखें कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों का योगी आदित्यनाथ से पिछले चार सालों का भारी कटु अनुभव है। यदि नहीं होते तो नरेंद्र मोदी ने गुजरात की आनंदीबेन पटेल को राजभवन में नहीं बैठाया होता। गुजरात के वक्त से अपने खास अफसर एके शर्मा को नौकरी छुड़वा कर लखनऊ में सरकार में बैठाने की कोशिश नहीं की होती। पुरानी बात नहीं है और लखनऊ का हर राजनीतिक जानकार जानता है कि एके शर्मा को ले कर योगी आदित्यनाथ ने क्या तेवर दिखाए और नरेंद्र मोदी व अमित शाह को कैसे खून के घूंट पीने पड़े।

मतलब पिछले पांच सालों में मोदी-शाह को जैसा अनुभव योगी आदित्यनाथ से हुआ वैसा किसी दूसरे मुख्यमंत्री व भाजपा नेता से नहीं हुआ। पोस्टर, होर्डिंग, विज्ञापनों में नरेंद्र मोदी के बराबर साइज में योगी के फोटो अपने आप यह मैसेज देते हुए थे कि योगी को गर्व है अपनी शख्सियत पर। वे अधिक पॉपुलर, अधिक अखिल भारतीय लोकप्रियता लिए हुए और हिंदुत्व के सच्चे भगवाधारी महानायक।

इसे योगी का मुगालता, अहंकार कुछ भी कहे लेकिन अपना मानना है कि योगी आदित्यनाथ ने मुसलमान, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद आदि को लगातार फोकस में रख कथित माफियाओं पर अपने राज की गाज में जो शासन किया है वह मामूली नहीं था। योगी ने खुली सांप्रदायिक राजनीति की। नरेंद्र मोदी-अमित शाह की तरह कुर्सी-पद का लोकलाज नहीं। तब भला वे क्यों न अपने को बड़ा हिंदू नेता मानें? नरेंद्र मोदी नहीं, बल्कि वे सच्चे-प्रामाणिक हिंदू नेता! पूरे देश में भाजपा के स्टार प्रचारक के नाते उम्मीदवारों-कार्यकर्ताओं के बीच उन्हीं की अधिक मांग। असम हो या पश्चिम बंगाल या केरल सब तरफ योगी के भक्त तो भला उत्तर प्रदेश में उनके आगे किस दूसरे नेता का मतलब? न जात, न ब्राह्मण का मतलब और न ओबीसी नेताओं का मतलब। जातियों से ऊपर हिंदुओं को संगठित बनाने वाला इकलौता चेहरा योगी आदित्यनाथ। साधु-संतों में सर्वप्रिय चेहरा तो राममंदिर निर्माण हो या काशी विश्वनाथ कॉरिडोर या तमाम धार्मिक केंद्रों पर ध्यान देने का काम योगी की ही कमान में है तो योगी बड़े नेता या नरेंद्र मोदी या अमित शाह?

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उस नाते तटस्थता से विचार करें तो भाजपा की कोर भगवा हिंदू राजनीति का नंबर एक सत्तावान नेता यदि कोई है तो वह आज योगी आदित्यनाथ का चेहरा है। योगी ने साढ़े चार साल में एक ऐसा काम नहीं किया है, जिससे कट्टरपंथी हिंदू भावना घायल हुई हो। जबकि बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के असंख्य ऐसे काम हैं, जिससे हिंदू मतदाता गुस्सा है, घायल है और रोते हुए है। यदि तीन कृषि कानूनों को खत्म करने का नरेंद्र मोदी को फैसला लेना पड़ा है तो वह भी एक प्रमाण है, जिससे मोदी सरकार की अलोकप्रियता जाहिर है। तभी किसानों का गुस्सा हो, मंहगाई और बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली जैसी तमाम बातों में नरेंद्र मोदी और उनका नेतृत्व भाजपा के लिए अब नंबर एक लायबिलिटी है। इसलिए यूपी में योगी का मुख्यमंत्रित्व भाजपा की अलोकप्रियता का कारण नहीं है, बल्कि नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्रित्व जिम्मेवार कारण है।

यह वास्तविकता हालिया उपचुनावों से जाहिर थी और आगामी चुनावों में भी देखने को मिलेगी। लोग केंद्र सरकार, नरेंद्र मोदी की रीति-नीति की तकलीफों से भाजपा के खिलाफ वोट देते हुए होंगे। उत्तराखंड के भाजपाई मुख्यमंत्रियों व प्रदेश सरकार की एंटीइन्कंबैंसी का फैक्टर उतना काम करता हुआ नहीं होगा, जैसा कि केंद्र की मोदी सरकार की बदौलत बनी महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की नाराजगी का होगा।

इस बात को योगी और उनके रणनीतिकारों ने समझा हुआ था। तभी योगी ने पिछले छह महीने से मोदी-शाह की यूपी चिंता को तरजीह नहीं दी। उनके चाहे अनुसार मंत्रिमंडल फेरबदल नहीं किया। वे अपने अकेले दौरों, सभाओं और हिंदू-मुस्लिम राजनीति के बीज डालते हुए चुनाव तैयारी में थे।

इस अनुभव में ही मोदी-शाह ने पहले प्रदेश नेताओं में मतभेद का हल्ला बनवाया। योगी अकेले चलते हैं, मनमानी करते हैं का हल्ला बनवा कर ओबीसी नेताओं का दबाव उभारा। मेल-मुलाकात करवाई। मतलब यूपी में सब ठीक नहीं है इसका हल्ला कर मुख्यमंत्री को केशव प्रसाद मौर्या जैसे नेताओं के मान-सम्मान के लिए कहा गया। जबकि असलियत यह है कि जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सांसदों को महत्व नहीं दिया और प्रशासन में जनप्रतिनिधियों की कम से कम दखल की प्रवृत्ति में भाजपा को ढाला है वैसे ही योगी आदित्यनाथ ने विधायकों-मंत्रियों को औकात में रखा। उनकी परवाह नहीं की। सब कुछ सीएमओ से संचालित।

उस नाते योगी का राजकाज सचमुच प्रधानमंत्री मोदी की ट्रू कॉपी है। पर इससे नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी आहत हुए क्योंकि योगी ने उनसे पूछ कर, उनकी मंशा भाप कर (जैसे बाकी भाजपा सीएम करते है) राज नहीं किया। योगी ने मोदी-शाह को यह सोचने का मौका ही नहीं दिया कि लखनऊ के राज से प्रदेश में भाजपा की हवा बिगड़ी हुई है इसलिए हमें संभालना होगा। दूसरे शब्दों में जैसे गुजरात या उत्तराखंड में मोदी-शाह का आकलन हुआ, फैसले हुए वैसा योगी ने मौका नहीं बनने दिया। उलटे योगी के मूड में विधायकों ने जाना-समझा कि उनके टिकट का फैसला कहीं योगी की इच्छा में न हो। तभी विधायकों ने दबाकर हाइकमान में योगी के खिलाफ गुहार लगाई। चुनाव हार जाएंगे, डूब जाएंगे का शोर करके मोदी और शाह को इतना बुरी तरह डराया कि मोदी को कृषि कानून वापिस लेने का फैसला लेना पड़ा।

बहरहाल, किसान कानून की वापसी से योगी आदित्यनाथ पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना है कि मोदी-शाह-नड्‍डा, राजनाथ सिंह और पार्टी-संघ सभी यूपी को लेकर भारी चिंता में है इसलिए यदि चुनाव की कमान हाईकमान ले रहा है, नरेंद्र मोदी उनके कंधे पर हाथ रख रहे हैं तो अच्छा है और शायद इसी से अंबर से ऊंचा उड़ना संभव हो, मोदी उन्हें ही आगे प्रधानमंत्री बनाएं! 

अपना मानना है उलटे चुनाव जीते जाने के बाद मोदी-शाह और विधायक योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री नहीं बनाएंगे। यह नामुमकिन नहीं कि जमीनी हकीकत में थोक में भाजपा विधायकों के टिकट कटे और इसकी रणनीति में अमित शाह, राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा क्षेत्रीय आकलन के आधार पर उम्मीदवारों की ऐसी लिस्ट बनवाएंगे, जिसमें योगी के समर्थकों के टिकट अपने आप कटेंगे और विरोधियों की उम्मीदवारी अधिक बनेगी। योगी के कंधों पर क्योंकि मोदी ने हाथ रख दिया है तो योगी इसी के मुगालते में अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर उम्मीदवार तय कराने की रणनीति छोड़ बैठेंगे। सो, पिछले छह महीने की यूपी में हुई योगी-भाजपा की राजनीति को याद करें और सोचें कि किस खूबसूरती से मोदी-शाह ने योगी को चक्रव्यूह में घेर डाला है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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