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भाजपा वोटों का घटना जब तय तो…

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यूपी में दीये और तूफान की लड़ाई-6: हर जन सर्वेक्षण समाजवादी पार्टी के वोट और सीट बढ़ने की रायशुमारी दिखा रहा है। मोटा मोटी मालूम हो रहा है कि भाजपा की सीटें घटेंगी क्योंकि वोट घट रहे हैं। साथ ही हर कोई कह रहा है, मान रहा है कि उत्तर प्रदेश में हिंदू-मुस्लिम की जगह जमीन पर जात राजनीति हावी है। मतलब कुछ भी हो जाए, अमित शाह कितना ही दम लगा लें वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को उतने जाट वोट नहीं दिलवा सकते, जितने 2017 में मिले थे। ऐसे ही गैर-यादव पिछड़ी जातियों में भाजपा को 2017 जितने वोट नहीं मिलने हैं। यहीं अनुमान ब्राह्मणों को लेकर है।  भाजपा को 2017 की तरह ब्राह्मण एकमुश्त वोट नहीं देंगे। up-assembly election bjp

तब निश्चित ही सन् 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिले 39.6 प्रतिशत वोटों में गिरावट तय है। मगर बावजूद इसके चुनावी सर्वे भाजपा को 41 से 43 प्रतिशत वोट मिलने के अनुमान कैसे बता रहे हैं? जातीय राजनीति, एंटी इनकम्बैंसी, योगी आदित्यनाथ के चेहरे से चिढ़े वोटों की जमीनी सच्चाई में भाजपा का 39.6 प्रतिशत वोट कम हो कर 30-33 प्रतिशत होने चाहिए या बढ़ कर 41-43 प्रतिशत?

चुनावी गणित में पहला हिसाब है कि जिसकी सरकार पांच साल सत्ता में होती है उस पार्टी के खिलाफ नाराजगी, एंटी इनकम्बैंसी का वोट बना होता है। सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ नाराजगी से उसका तीन-चार प्रतिशत वोट प्रमुख विपक्षी दल को जाने का रूझान होता है। उत्तर प्रदेश की मौजूदा स्थिति में समाजवादी पार्टी और उसके एलायंस को प्रमुख विरोधी माना जा रहा है। उसी से भाजपा को टक्कर की हवा है। मुख्यमंत्री के चेहरे के नाते योगी आदित्यनाथ बनाम अखिलेश यादव में मुकाबला है। तभी सरकार से नाराज वोट इधर-उधर बटेगा नहीं, बल्कि अखिलेश को मिलेगा। सत्तारूढ़ भाजपा सरकार व योगी आदित्यनाथ से नाराज सरकारी कर्मचारी से लेकर शहरी मध्यवर्ग का तीन-चार प्रतिशत वोट सपा को बिना कोशिश के मिलेगा।

सो, भाजपा को पहला नुकसान तीन-चार प्रतिशत एंटी इनकम्बैंसी वोट का है। इसके बाद फिर जाट, ब्राह्मण, राजभर, मौर्य, सैनी, पाल आदि अति पिछड़ी जातियों में घाटे का है। उत्तर प्रदेश के जातीय जंगल में जात विशेष का नेता अपनी कुव्वत से कैसे वोट (खासकर विधानसभा चुनाव में) डलवाता है, यह सभी जानते हैं। यहीं वजह है कि पिछड़ी जातियों के नेताओं की समाजवादी पार्टी की ओर भगदड़ हुई नहीं कि भाजपा आलाकमान के हाथ-पांव फूले। सन् 2017 में पश्चिम यूपी में अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी व किसान नेता राकेश टिकैत का मतलब नहीं था। जाट तब भाजपा के दिवाने थे। हिंदु-मुस्लिम दुराव में पश्चिमी यूपी भभका हुआ था। अब वैसा नहीं है तो संभव ही नहीं जो अमित शाह व भाजपा नेता जनसंपर्क से वापिस हिंदू-मुस्लिम पंगे का नैरेटिव बनवा सकें।

2017 बनाम 2022 के चुनावी माहौल में एक फर्क किसान आंदोलन की हवा से भी है। पश्चिम उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल सभी ओर देहात में वोट जातीय सोच के साथ किसानी संकट व बदहाली के अनुभव में गड़बड़ाया हुआ है। जैसे पश्चिम यूपी में गुर्जर बहुल सीट में शहरी-कस्बाई गुर्जर अलग तरह से सोचते हुए हैं तो गांव में खेतिहर गुर्जर वैसे ही सोच रहा हैं जैसे जाट। मतलब माना जा रहा हैं कि पश्चिम यूपी में भाजपा सरकार के खिलाफ जाट-गुर्जर की नाराजगी एक सी है। इनके पचास फीसदी वोट भी यदि सपा-रालोद को गए तो सन् 2017 के भाजपा वोट प्रतिशत में ढलाव बनेगा। अन्य शब्दों में भाजपा के बूते याकि पन्ना प्रमुख, माइक्रो बूथ प्रबंधन के किसी भी लेवल पर जाट, पिछड़ी जातियों और ब्राह्मण वोटों की 2017 जैसी कतार बनवाना संभव नहीं है। संभव नहीं जो बागपत, शामली, कैराना में जाट 2017 की तरह भाजपा को वोट दें। 2017 के वोटों में यदि दो-तीन जातियों के थोक वोटों में भाजपा को उनके 50 प्रतिशत भी कम वोट मिले तो सपा-रालोद के वोटों में जंप तय है। सोचें, तब भाजपा के पास 2017 के आधार से खिसके वोटों की भरपाई का विकल्प क्या है?

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उत्तर प्रदेश में जात-पांत के चार समूह दलित, मुसलमान, ब्राह्मण और राजपूत पूरे प्रदेश में फैले हुए हैं। संख्या पर नंबर एक में 20.5 प्रतिशत दलित (इसमें 11.5 प्रतिशत जाटव), फिर 20  प्रतिशत मुस्लिम और नंबर तीन पर दस प्रतिशत ब्राह्मण व आठ प्रतिशत राजपूत संख्या अनुमानित है। अपना मानना है कि राजपूत योगी आदित्यनाथ के ठाकुर राज की दिवानगी में भाजपा को एकमुश्त वोट देंगे। इससे चिढ़ और नाराजगी में ब्राह्मण वोटों में गुस्सा और कंफ्यूजन दोनों है। भाजपा को यदि सन् 2017 के मुकाबले ब्राह्मणों का पच्चीस-पचास प्रतिशत वोट भी कम मिला तो भाजपा को सीधे ढाई से पांच प्रतिशत वोटों का नुकसान। ब्राह्मण या तो योगी को हराने के लिए वोट करेगा या मोदी और हिंदूशाही की भक्ति में वोट देगा। सन् 2017 और 2019 की तरह वह अंधा हो कर एकमुश्त भाजपा को जिताता हुआ नहीं है।

अगला अहम वोट दलित का है जो मायावती के डूबते जहाज में बैठा रहेगा या भाग कर इधर-उधर जाएगा, इस पर मतभेद है। ध्यान रहे सन् 2017 में बसपा को 22 प्रतिशत वोट मिला था। वह दलित-मुस्लिम वोट का मिक्स था। बसपा को तब 11.5 प्रतिशत जाटव वोट पूरा मिला हुआ हो सकता है। इस दफा मायावती के लड़ाई से बाहर होने की पहले से हवा है और बसपा की वोट कटवा इमेज बनी है तो आर्थिक तौर पर मजबूत मुस्लिम उम्मीदवारों के बावजूद बसपा को बीस प्रतिशत में एक-दो प्रतिशत मुस्लिम वोट भी मिल जाए तो बड़ी बात होगी। मुस्लिम उम्मीदवार खर्च के दम पर जाटव वोट भले पा लें लेकिन वे खुद के गली-मोहल्ले के मुस्लिम वोट भी नहीं ले सकेंगे।

निराशा की स्थिति में दलित वोट क्या बसपा से टूटेंगे? मतलब दूसरी पार्टियों को जाटव वोट जाएंगे? इस सवाल में जातीय समीकरण में कयास है कि या तो युवा दलित नेता चंद्रशेखर की पार्टी में दम फूंकने के लिए उनकी पार्टी को वोट देंगे या कांग्रेस और भाजपा की तरफ जाएंगे। जात पर चुनाव हो रहा है और पिछड़ी जातियां अखिलेश-रालोद-राजभर एलांयस की हवा बनाए हुए हैं तो दलितों का जमीनी स्तर पर पिछड़ों से अधिक पंगा रहता है। उनके राजपूत से रिश्ते अपेक्षाकृत सहज होते हैं तो योगी आदित्यनाथ के लिए भी कुछ दलितों का रूझान बनेगा।

यह संभव है। लेकिन पिछले पांच वर्षों में योगी राज के खिलाफ जैसा दलित आंदोलन हुआ और दलित उत्पीड़न की खबरों का लगातार जो हल्ला रहा उसमें बसपा से थोक में वोट टूट कर भाजपा को मिलें, यह आसान नहीं है। फिर भाजपा ने खुद ओबीसी-पिछड़ों को अधिक टिकट दिए हैं तो जाटव, दलित वोट भाजपा के ओबीसी उम्मीदवार को वोट देने से पहले सोचेगा कि इससे बेहतर बसपा को ही ठप्पा लगाना ठिक। जाहिर है बसपा के सन् 2017 के 22 प्रतिशत वोट घटकर 12-14 प्रतिशत हुए तो उसके टूटे आठ-दस प्रतिशत वोटों में भाजपा की कमाई का अनुमान होते हुए भी वह सपा की कमाई से कम है।

कैसे? ध्यान रहे सपा को सन् 2017 में 21.8 प्रतिशत वोट मिले थे। उसमें इस दफा बीस प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं में अधिकतम वोट मिलने (बसपा-कांग्रेस-पीस पार्टी आदि को छोड़े जाने से) की संभावना में आठ-दस प्रतिशत वोटो का जंप अपने आप है।

चार प्रमुख वोट बैंक के 58.5 प्रतिशत (दलित, मुसलमान, ब्राह्मण, राजपूत) के बाद ओबीसी और अन्य जातियों का जहां सवाल है तो पहला तथ्य है कि ये प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में केंद्रित हैं। जैसे जाट पश्चिम यूपी की 60-65 सीटों में असरदार है तो मौर्य 25 सीटों, राजभर 35-40 सीटों, कुर्मी 10-15 में जीत-हार को प्रभावित कर सकते हैं। यहीं स्थिति यादवों की है पर यादवों की प्रदेश के कुल वोटों में क्योंकि 8.5 प्रतिशत संख्या है और मध्य व पूर्व की काफी सीटों पर ओबीसी के कुल वोटों की गणित में वह धुरी है तो उसका महत्व अलग है। जाट-मुस्लिम समीकरण से 60-65 सीटों का फैसला होता है। 2017 में जाट और मुस्लिम खुन्नस हुई तो भाजपा की पौ-बारह बनी।

मगर इस चुनाव में किसान नेता टिकैत के आंसू के बाद मोदी-शाह जाटों में नंबर एक विलेन हैं। इस कदर की शनिवार को टीवी चैनलों के एंकरों की भीड़ के साथ अमित शाह कैराना पहुंचे तो मीडिया से हवा का नैरेटिव चाहे जो हुआ लेकिन वहां से अपने को खबर है कि जाटों में उलटे नैरेटिव बना। जाट चौपालों में नैरेटिव था- भाजपा की हवा का शोर होता तो अमित शाह गली-गली भटकते? देखो बनिए के घर जा कर हल्ला बना रहे हैं। मतलब जाट बुरी तरह बिदका हुआ है। तभी जाटों के जानकारों के बीच से फीडबैक है कि 65 सीटों पर सन् 2017 के मुकाबले भाजपा को जाट वोट 15-20 प्रतिशत भी मिला तो बड़ी बात होगी। तब इस नुकसान की भरपाई में मतदान के दिन भाजपा के पास दूसरे वोट कौन से होंगे?

अपना मानना है सन् 2017 और 2020 के चुनाव में यादव, जाट, कुर्मी, दलित के नौजवान वोटों में सोशल मीडिया और मोदी के जादू से भाजपा के लिए वोट पड़े थे। जैसे मुस्लिम में यूथ के ओवैसी से जुड़ने के लक्षण हैं वैसे ओबीसी-दलित जातियों के यूथ में भाजपा को लेकर रूझान है। लेकिन इस दफा किसान आंदोलन, बेरोजगारी, बेहाली और योगी के ठोकोशासन में नीचे के प्रशासन अनुभव ने यूथ वोटों से भाजपा को नया अप्रत्याशित लाभ मिले इसके अवसर कम हैं।

तभी मीडिया के हल्ले के विपरीत भाजपा के नए वोट जमीन पर ढूंढे नहीं मिलेंगे। 2017 के वोटों की टूट में बसपा के दलित वोट को भाजपा पटाए या ब्राह्मण और ओबीसी वोटों को येन केन प्रकारेण पहले की तरह पकड़े तो बात अलग है तब भाजपा अपने को सपा वोटों से नीचे जाने से रोक सकेगी। अन्यथा आमने-सामने की लड़ाई से मोदी-शाह के लिए न तो सपा की ओर वोट का रूझान रोकना संभव है और न अपने वोटों में गिरावट को रोकना मुमकिन है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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