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मायावती का मैसेज कितना काम आएगा?

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अपने मतदाताओं को एक मैसेज किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की एक टिप्पणी का जवाब देते हुए मायावती ने कहा कि सत्तारूढ़ पार्टी के पास सरकारी पैसा है, जिससे वे खूब खर्च कर रहे हैं और एक के बाद एक रैलियां कर रहे हैं। ऐसी रैलियां बसपा नहीं कर सकती है। उन्होंने कहा कि अगर वे कांग्रेस और भाजपा की रणनीति पर काम करें और ज्यादा रैलियां व सभाएं करें तो उनके लोग इसका खर्च नहीं उठा पाएंगे। इस तरह मायावती ने अपने वोट बैंक को यह मैसेज दिया है कि 10 साल सत्ता से बाहर रहना उनके लिए भारी पड़ रहा है और पार्टी के पास पैसा नहीं है और इसलिए वे अभी तक चुनावी कार्यक्रम नहीं शुरू कर पाई हैं। ध्यान रहे मायावती ने पिछले करीब तीन महीने से कोई रैली या जनसभा नहीं की है। आखिरी बार उन्होंने लखनऊ में पार्टी की ओर से आयोजित ब्राह्मणों की सभा में हिस्सा लिया था। उसके बाद वे भी शांत हैं और उनकी पार्टी भी शांत बैठी है। उन्होंने दो-तीन बार प्रेस कांफ्रेंस जरूर की है लेकिन उनके शांत बैठने से यह प्रचार हो रहा है कि वे भाजपा के साथ मिली हुई हैं, इस चुनाव में उनका वोट भाजपा को ट्रांसफर हो रहा है और उनका वोट आधा रह जाएगा।

इस बीच मायावती ने अपने को और अपनी पार्टी को आर्थिक रूप से लाचार या कमजोर बता कर जो मैसेज दिया है उससे वे सहानुभूति हासिल कर सकती हैं। उनके मतदाताओं में यह मैसेज जा सकता है कि बहनजीमुश्किल में हैं तो उनके साथ खड़ा हुआ जाए। इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि उनका करीब 10 फीसदी का जाटव वोट एकजुट हो जाएगा। भीम आर्मी के चंद्रशेखर के साथ जा रहा तबका भी मायावती के बारे में सोचेगा। गैर जाटव वोट में भी प्रदेश से दलित लीडरशिप खत्म होने का मैसेज जाएगा। उत्तर प्रदेश के दलित, वंचित समाज में अपनी पार्टी और अपने नेता के कमजोर होने का मैसेज जाएगा तो उनमें एकजुटता का भाव बनेगा। पिछले 40 साल में आखिर कांशीराम और मायावती ने ही उत्तर प्रदेश में और एक तरह से पूरे देश में दलित अस्मिता और स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व किया है। आज बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के नाम का जो जयकारा सारी पार्टियां लगा रही हैं उसका श्रेय मायावती और उनकी पार्टी को जाता है। कांशीराम और मायावती ने इस देश की चुनावी राजनीति में दलित विमर्श स्थापित किया। वे पहली दलित नेता थीं, जो सीधे जनता के समर्थन से सत्ता हासिल करके शक्तिशाली बनी थीं। किसी बड़ी पार्टी या बड़े नेता की कृपा से हासिल हुई आभासी सत्ता नहीं, बल्कि वास्तविक सत्ता उनके पास थी।

सो, पता नहीं मायावती ने सोच-समझ कर यह बात कही या अमित शाह की टिप्पणी का कुछ जवाब देना था इसलिए अनायास यह बयान दे दिया पर इस बयान का असर हो सकता है। उत्तर प्रदेश में चाहे समाजवादी पार्टी का राज रहा हो या भाजपा का, दलित हमेशा हाशिए में रहे हैं। उलटे सामाजिक व आर्थिक रूप से मजबूत जातियों के मुख्यमंत्री होने से दलितों पर किसी न किसी रूप में अत्याचार हुआ है। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ समय में दलित बच्चियों और महिलाओं के साथ जिस तरह की घटनाएं हुई हैं, वैसा मायावती के शासन में सोचा भी नहीं जा सकता था। योगी आदित्यनाथ की सरकार कानून-व्यवस्था सुधार देने का डंका जरूर बजा रही है लेकिन उससे दलितों, वंचितों या हाशिए पर के लोगों को बहुत सुरक्षा हासिल हुई हो ऐसा नहीं है। वंचित व हाशिए पर की जातियों के नेता पारंपरिक रूप से बेहतर प्रशासक साबित होते हैं और उनके राज में कानून व्यवस्था की स्थिति अमूमन बेहतर होती है। अत्याचार सहने वाली जातियां सत्ता में आने पर अत्याचार नहीं करती हैं, बल्कि अपने जैसे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं। सो, मायावती के शासन में दलितों, वंचितों और कमजोर तबके के मन में सुरक्षा, सत्ता में साझेदारी और सत्ता से जुड़ाव का जैसा भाव रहा होगा वह किसी दूसरे शासन में संभव नहीं है। इस लिहाज से मायावती का बयान एक बड़े तबके को एकजुट कर सकता है।

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लेकिन इसका खतरा यह है कि कमजोर जान कर उनका काडर और वोट बैंक बिखर भी सकता है। ध्यान रहे इन दिनों सत्ता में हिस्सेदारी की चाह से जातियां निर्देशित हो रही हैं। अगर उनको लगेगा कि मायावती और बसपा उनको सत्ता में हिस्सेदारी नहीं दिला सकते हैं तो वे उन पार्टियों की ओर देखेंगे, जिनके सहारे सत्ता में भागीदारी हासिल करने की सबसे ज्यादा संभावना होगी। उनको कमजोर और लाचार नेता नहीं चाहिए। मायावती जिन दिनों नोटों की माला पहनती थीं और इसके लिए उनकी चौतरफा आलोचना होती थी, उन दिनों भी उनका समुदाय इसमें गर्व महसूस करता था। भाजपा और दूसरी विपक्षी पार्टियां मायावती को जब तक दलित की नहीं, दौलत की बेटी कहते रहे तब तक उनकी ताकत बढ़ती रही। अब अगर वे खुद दौलत खत्म होने या नहीं होने की बात कह रही हैं तो इससे उनकी दलित राजनीति भी खतरे में आ सकती है।

सो, उनका मैसेज दोधारी तलवार की तरह है। उनकी लाचारगी, असहायता और आर्थिक कमजोरी उनके कोर वोट को जागृत कर सकती है और उसे एकजुट करके उनके पक्ष में खड़ा कर सकती है। ऐसा हुआ तो बिना कुछ कहे उनके वोट पड़ेंगे और वे एक मजबूत राजनीतिक ताकत बनी रहेंगी। फिर तो दलित राजनीति कर रही बाकी सारी पार्टियों की छुट्टी हो जाएगी। लेकिन अगर मैसेज उलटा गया तो उनका खेमा पूरी तरह से उजड़ भी सकता है। देखने वाली बात यह होगी कि वे इस आधार पर कोई नैरेटिव बनाती हैं या चुपचाप बैठी रहती हैं। वे अपनी लाचारी को ही चुनावी मुद्दा बना कर प्रचार में निकल जाएं तो अपनी राजनीतिक पूंजी बचाने में कामयाब हो सकती हैं।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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