ट्रंप खत्म कर रहे भारतीयों के अवसर

कई साल पहले जब तत्कालीन दिल्ली सरकार ने परिवहन की सुविधा के मद्देनजर शहर के तिपाहियो की संख्या बढ़ाने के लिए नए परमिट देने का ऐलान किया था तो मौजूदा तिपहिया चालक हड़ताल पर चले गए। उनका कहना था कि इससे हमारे बीच आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और हमारी कमाई कम हो जाएगी क्योंकि शहर में पहले से ही पर्याप्त तिपहिया स्कूटर है।

अब जब पिछले कुछ दिनों से अखबारों में अमेरिका की ट्रंप सरकार द्वारा एच-1बी वीजा पर सख्ती कर उसकी मदद से वहां आने वाले विदेशी खासतौर से भारतीयो को वहां नौकरी हासिल करने में मुश्किल/दुर्लभ बनाए जाने की खबर पढ़ी तो वह घटना याद हो आई। वहां भी एक वर्ग अदालत में गया है व उसकी दलील है कि इसके जरिए अमेरिकी कंपनियों को कम वेतन पर अच्छे इंजीनियर व दूसरे व्यवसायिक मिल जाएंगे व इससे उनके लिए कम वेतन की समस्या पैदा होगी। नौकरी की संभावनाएं भी कम हो जाएंगी।

भारत समेत तमाम देशों से बड़ी तादाद में पढ़े लिखे लोग जैसे इंजीनियर, डाक्टर, आईटी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक अमेरिका समेत दूसरे देशों में नौकरी करने जाते रहे हैं। पहले यह समस्या इतनी जटिल नहीं थी। भारतीयो को काफी पढ़ा लिखा होशियार व अंग्रेजी का जानकार माना जाता है। मेहनती होने के कारण वहां की विशिष्ट नौकरियों में उनकी काफी मांग अमेरिका समेत तमाम विकसित देशा में रही है। लोग पहले नौकरियों में आने ढेरो लोगों का प्राथमिकता देते हैं व उसके बाद ही उन्हें अपने देश में विशिष्ट योग्यता वाले लोग न मिलने पर बाहरी लोगों को नौकरी देने को छूट दी जाती है।

कुछ समय पहले अमेरिका ने इस समस्या से निपटने के लिए देश में बड़ी नौकरियो पर आने वाले एच-1बी वीजा की व्यवस्था की। इसके तहत अमेरिका की ऐसी कंपनियां जिन्हें कुछ विशिष्ट व्यवसायों में योग्य लोगों की जरूरत होती है वे लोग उन्हें तीन साल के एच-1 बी वीजा पर नौकरी करने के लिए बाहर से बुला सकते हैं जिसे बढ़ाकर छह साल तक किया जा सकता है। इसके लिए कंपनियों की ओर से संबधित कर्मचारी को वीजा देने के लिए आवेदन करना पड़ता है।

हर साल लाटरी के जरिए इस वीजा के लिए 85,000 लोगों को चुना जाता है। विश्वविद्यालयों व अनुसंधान के क्षेत्र में मुनाफा न कमाने वाले संगठनों को इसकी छूट दी गई हैं जिन्हें एच-1 बी वीजा मिल जाता है। उनके जीवन साथी को एच-4 वीजा दे दिया जाता है ताकि वे लोग वहां काम के लिए आवदेन कर सके। इसे राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने कार्यकाल 1995 में लागू किया था व उस साल जो 1.20 लाख वीजा दिए गए उनमें से 1.10 लाखा भारतीय थे वे इनमें से 84,000 महिलाएं थी।

पिछले साल इसके लिए कुछ कुल 4.16 लाख लोगों के आवेदन आए जिनमें 74 फीसदी भारतीय थे। ज्यादातर आवेदन कंप्यूटर विशेषज्ञ थे। इसका शुरू में ही विरोध शुरू हो गया व 4 साल पहले 2015 में सेव जाब्स यूएसए नामक संगठन के लिए सूचना तकनीक कर्मचारी व एक सिस्टम एनालिस्ट ने अमेरिकी गृह मंत्रालय (होमलैंड सिक्योरिटी) के खिलाफ मुकमदा दायर किया। उनका दावा था कि उन्होंने 15 साल दक्षिणी कैलोफार्निया की एक कंपनी में काम किया। बाद में उन्हें एच-1-बी वीजा वाले लोगों के कारण नौकरी से निकाल दिया गया। होमलैंड सिक्योरिटी के द्वारा बाहरी लोगों को एच-4 वीजा दिया जाना आव्रजन कानूनों का उल्लंघन है व उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है।

वे लोग 2016 में जिला अदालत में यह मुकदमा डालकर ओबामा के सत्ता छोड़ने व डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता संभालने के पहले होमलैंड सिक्योरिटी ने अदालत से कहा था कि वह एच-4 वीजा समाप्त करने पर विचार कर रही है। फिर उसने कहा कि उसने इस मामले को 2020 तक टाल दिया है। दिसंबर 2018 में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि नौकरी बाजार में बाहरी लोगों के घुसने के कारण अमेरिकी कर्मचारियों को नुकसान पहुंचा है। हालांकि सरकार का कहना था कि एच-1-बी वीजा के कारण जहां एक और देश का जीडीपी बढ़ा है वहीं 2.4 खरब का कर राजस्व भी मिला है।

यहां याद दिला दे कि ट्रंप प्रशासन ने एच-1-बी वीजा के खिलाफ मानो अभियान छेड़ दिया था। उन्होंने नारा दिया था कि अमेरिकी खरीदो, अमेरकियों को नौकरी दो। यह हमारे यहां के स्वदेशी आंदोलन सरीखा था। पिछले साल सरकार ने उनके पेशे की सूची जारी की जिन्होंने एच-1-बी वीजा पर लोगों को काम पर रखा हुआ था। भारत की अमेरिका में काम करने वाली कंपनियां जैसे टाटा, विप्रो, इंफोसिस के 28 से 40 फीसदी आवेदनों को सरकार ने ठुकरा दिया जबकि अमेरिकी कंपनी ने जैसे अर्नप्ट एंड मंडा, डेलोटी, कोग्नीजैंट के 18 से 52 फीसदी आवेदन ठुकराए।

हालांकि एप्पल, गूगल जैसी कंपनियों को ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। अमेरिका में कार्यरत अपने एक इंजीनियर ने बताया कि वहां की कंपनियां भी इसका फायदा उठाती है और अमेरिकी नागरिको की तुलना में भारतीयो को कम वेतन देने के साथ-साथ उनका कार्यकाल बढ़ाए जाने के मुद्दे पर उन्हें सालाना वेतन वृद्धि नहीं देती है। वहां सबसे ज्यादा तकनीकी क्षेत्र में इसका असर देखा जा रहा है। भारतीयों समेत विदेशियों को रोकने के लिए ट्रंप सरकार ने ऐलान किया है कि वहां की कंपनियों को बाहरी लोगों को भी उतना ही वेतन देना पड़ेगा जोकि वह अमेरिकी लोगों को देती है।

यह तो लगभग दिल्ली जैसे शहर में आम भारतीय की तुलना में कम वेतन पर बांग्लादेश व म्यांमार से आए लोगों को कम वेतन पर घर की नौकरी के लिए रखने जैसा है। इससे भारत के पढ़े लिखे साइंस व तकनीकी क्षेत्र के विशेषज्ञ सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। यह बताता है कि दुनिया सही अर्थों में ग्लोबल विलेज बन गई हैं। हर जगह एक ही समस्या है। अमेरिका ने स्वास्थ्य संबंधी और चिकित्सा खर्च वहन न कर पाने वाले अप्रवासियों को वीजा देने से मना कर दिया है। वीजा आवेदन की फीस भी 10 डालर से बढ़ाकर 700 डालर कर दी गई है।

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