हरिशंकर व्यास कॉलम | अपन तो कहेंगे | बेबाक विचार

देश, कौम का जिंदा होना क्या?

इसे जानना हो तो दुनिया पर गौर करें। एक अमेरिका है और दूसरा भारत! एक अमेरिका है और उसके आगे रूस या चीन हैं। क्या फर्क बूझ पड़ता है? फर्क यह कि अकेले अमेरिका जिंदा और जिंदादिल देश है। क्यों? इसलिए कि वहां हर व्यक्ति बुद्धि की चेतना लिए हुए है। व्यक्ति को वहां बुद्धि-दिमाग में उड़ने के पंख की आजादी और अवसर दोनों हैं। मंगलवार की सुबह अमेरिकी चुनाव की शुरुआत में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति देखने को मिली। उन्होंने सपने लिए हुए बाहरी लोगों को अमेरिकी नागरिकता देने का कार्यक्रम व्हाइट हाउस में किया।

अपने हाथों पांच विदेशियों (जिसमें एक हिंदू भी) को अमेरिका का नागरिक बनने का प्रमाणपत्र दिया। ये पांचों जब अमेरिका गए होंगे तो पहले पढ़ाई की, डिग्री ली और करियर बना कर अपनी जो सिद्धि बनाई, बुद्धि दिखाई तो नागरिकता का भी फैसला हुआ। बुद्धि बल के साहस से उड़ते हुए इनका अमेरिका के अवसर में आजादी से मौका बनाना इनका कमाल था तो अमेरिका का भी कमाल है। इस समारोह के बाद ट्रंप ने व्हाइट हाउस में ही अपनी पत्नी मेलानिया याकि अमेरिका की प्रथम महिला का चुनावी भाषण करवाया। उनकी जुबानी जानने को मिला कि कम्युनिस्ट यूगोस्लाविया में जन्मी मेलानिया ने अमेरिका का सपना देखते हुए 26 साल की उम्र में अमेरिका में प्रवेश किया। उन्हें सन 2006 में अमेरिका की नागरिकता मिली और आजादी से उड़ने के पड़ाव में वे डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी बनीं और पांच भाषाओं की जानकार मेलानिया ट्रंप साढ़े तीन वर्षों से अमेरिका की बतौर प्रथम महिला राष्ट्रपति भवन को संभाले हुए हैं।

मंगलवार को डोनाल्डर ट्रंप ने एक और झांकी दिखलाई। उनके विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने इजराइल के यरूशलम से रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन को संबोधित किया। यहूदियों के पवित्र शहर और अरब-इस्लामी दुनिया में खदबदाहट बनवाने, सभ्यता के संघर्ष के प्रतीक वाले शहर से अमेरिकी चुनाव के लिए भाषण अकल्पनीय बात है। बावजूद इसके वह है तो यह डोनाल्ड ट्रंप की लीडरशीप के दुस्साहस का प्रमाण है तो इस बात का भी सबूत है कि अमेरिका की जिंदादिली कभी ऐसे संशय मे नहीं रहती कि दूसरा क्या सोचेगा या कहीं दूसरे बिगड़ न जाएं।

क्या भारत, रूस, चीन जैसे देश ऐसा व्यवहार अपनाए हुए हो सकते हैं? क्या भारत खुले दिल दुनिया से लोगों को भारत आने दे सकता है? क्या उन्हें भारत में वैसे अवसर, वैसी स्वतंत्रता, वैसे नागरिक अधिकार मिलेंगे, जैसे अमेरिका में कल उसके राष्ट्रपति ने एक भारतीय महिला, उसके परिवार को दिए हैं? क्या कल्पना कर सकते हैं कि भारत का समाज और खासकर हम हिंदू लोग 2006 में नागरिक बनी महिला को प्रथम महिला का मान, सम्मान दे सकते हैं? क्या भारत के प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री किसी में हिम्मत है जो इस्लामी बिरादरी या चीन या अमेरिका को नाराज करने की हिम्मत दिखलाते हुए यरूशलम जैसे स्थान से देश, कौम, हिंदू सभ्यता की निडरता का अहसास कराए?

जरा मेरे इस ऑब्जर्वेशन पर गौर करें कि अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप, रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी, अमेरिकी नागरिक और अमेरिका खुद कभी अपनी जय नहीं बोलते। भारत और अमेरिका का फर्क यह है कि हम जय हिंद से लेकर भारत माता की जय के नारों से मुंगेरीलाल जीवन जीते हैं, जबकि अमेरिका प्रार्थना करता है गॉड ब्लेस अमेरिका! अमेरिका क्योंकि बुद्धि से सतत नए संकल्प, नए सत्य की ओर उड़ता है, सतत उड़ान, यात्रा, सपनों की सिद्धि की धुन लिए हुए है तो सभी अमेरिकी, सभी नेता ईश्वर से आशीर्वाद दिए रहने के लिए कहते हैं जबकि भारत में हम लोग अपने ही जयकारे में अपनी हकीकत विस्मृत किए हुए होते हैं। हम भूखे हैं तब भी जय है, मुर्दा हैं तब भी जय है। चीन से दबे हुए हैं तब भी जय है, महामारी में मर रहे हैं तब भी जय है। जबकि अमेरिका में न लिंकन की जय बोली जाती है न देश-संविधान निर्माताओं का जयकारा लगता है। इन नेताओं को महान नेताओं वाला सम्मान है,येअनुकरणीय हैं लेकिन अमेरिका के पूरे इतिहास में कभी कोई नेता भगवान नहीं माना गया। नेता की भक्ति और उसका जयकारा नहीं लगा। नेता और जनता सब बराबर और हर अमेरिकी क़ृपा बनाए रखने के लिए प्रभु से कहते हुए, अवसर और स्वतंत्रता से बनने-बनाने का संकल्प लिए होता है।

यह जिंदा, जिंदादिल कौम, देश का स्वाभाविक रूख है। कल जिस भारतीय महिला को अमेरिका की नागरिकता मिली उसने बुद्धि, बुद्धि से बने सपनों में जब अमेरिका जाने, डिग्री लेने, करियर बनाने का सफर शुरू किया तो वह दुस्साहस की, पुरुषार्थ की जिंदादिली लिए हुए थी तो मन में कामना लिए हुए रही होगी कि प्रभु कृपा बनाए रखना। गॉड ब्लेस मी, गॉड ब्लेस यू, गॉड ब्लेस अमेरिका।

कुएं में, पिंजरे में, ख्यालों में, मूर्खताओं में, भक्ति में जीने वाला जिंदा होते हुए भी मुर्दा होता है। फिर भले वह अपना जयकारा खुद लगाए या लगवाए। उड़ते हुए पुरुषार्थी, ज्ञानी-बुद्धिमान व्यक्ति की सत्य साधना ईश्वर के आशीर्वाद की कामना लिए हुए मिलेगी जबकि पंखविहीन, मुर्दा, मूर्ख, आलसी, अंधविश्वासी, झूठे लोग और कौम आत्ममुग्धता में जय, जय की टर्र,टर्र लिए हुए होती है। ऐसे लोग भले लोकतंत्र में रहते हों या तानाशाही में, उनके जयकारे की आदत इसलिए है क्योंकि गुलामी में जीने के इतिहास के साथ माईबाप सरकार के धर्मादे, उसकी अनुकंपा में जिंदा रहना नियति है जैसा कि चीन, भारत और रूस में जीना होता है।

मंगलवार को ड़ोनाल्ड ट्रंप ने जिन पांच विदेशियों को नागरिकता प्रमाणपत्र दिया, उसमें राष्ट्रपति या अमेरिकी व्यवस्था की अनुकंपा नहीं थी, बल्कि भारत, घाना, बोलीविया, सूड़ान, लेबनान से गए पांच लोगों का अमेरिका के अवसर में अपने आपको सफल साबित करने से था। इनमें कोई खैरात, आरक्षण-कोटे पर जीने वाला निकम्मा, बुद्धिहीन, नाकाबिल नहीं था, बल्कि हर शख्स वह काबलियत लिए हुए था, जिससे इमिग्रेशन विरोधी ट्रंप ने भी चुनाव वक्त में सोचा कि जब देश निज स्वंतत्रता व सपनों की उड़ान में बना है तो उस बुनियादी बात पर ही फोकस बना कर चुनाव प्रचार शुरू हो।

दो मुसलमान, चार अश्वेत, तीन महिला की अमेरिकी नागरिकता का व्हाइट हाउस में समारोह प्रमाण है कि ट्रंप के राज में गोरों के वर्चस्व वाली नस्ली राजनीति का कितना ही हल्ला हुआ हो लेकिन वह देश क्योंकि जिंदादिल, निड़र, साहसी होने के साथ सभी के लिए अवसर और आजादी लिए हुए है तो न चीन उसके पासंग हो सकता है और न हम! विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी और बाइडेन की हवा में डोनाल्ड ट्रंप ने पार्टी अधिवेशन में दक्षिणपंथ विचारों में स्वतंत्रता, अवसर, पूंजीवाद, टैक्स रियायतों आदि से नैरेटिव को बदलने का जो प्रयास किया है और विरोधी को समाजवादी, पश्चिमी सभ्यता के मूल्यों पर सांस्कृतिक खतरा बताने का जो पैंतरा चला है तो यह भी वह बात है, जिससे जिंदादिल कौम में वैचारिक मंथन होते रहने की निरंतरता झलकती है। अमेरिका के दोनों पालों से आज, चुनाव पूर्व विचार और बुद्धि का जो घमासान उभरता दिख रहा है तो तय मानें कि अगले 67 दिन वहां जो राजनीति होगी तो उससे दुनिया जानेगी कि जिंदा और मुर्दा कौम में फर्क कैसा, क्या होता है? तभी भला कहां चीन, रूस या भारत उसके समतुल्य बनते हैं?

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