भावना पहले फिर बुद्धी की दुम!

आधे से कुछ ही कम अमेरिकी मतदाता डोनाल्ड ट्रंप को विजेता मान रहे है! वे चुनाव नतीजों का सत्य मानने को तैयार नहीं है। वे ट्रंप को चुनाव जीता मानते है। वे ट्रंप का यह कहां सच्चा मानते है कि साजिश है जिससे ट्रंप हारे। तभी सवाल है कि डोनाल्ड ट्रंप, उनकी रिपब्लिकन पार्टी और उन्हे वोट देने वाले कोई सात करोड बीस लाख अमेरिकियों के ऐसे सोचने को किस शब्द में बांधे? उन्हे मूर्ख भक्त कहे या बुद्धीहीन भेड़े या पागल या कोई नया शब्द गढ़े? अमेरिका जैसे पढ़े-लिखे, ज्ञान-विज्ञान, तर्क-बुद्धी वाले देश में यदि इतने मूर्ख-इतने झूठे है तो पृथ्वी के सात अरब लोगों में भारत-चीन आदि देशों की इंसानी भीड़ में मूर्ख-झूठी आबादी का क्या हिसाब बनेगा?

मानव सभ्यता पर विचार करने वाले दार्शनिकों, विचारकों की सदियों से राय है कि राजनीति और झूठ का चोली-दामन का साथ है। जो जितना हिट-सुपरहिरों नेता वह उतना ही झूठा और मूर्ख। इतिहास है कि तानाशाही हमेशा झूठ में चली है। नेता भावनाओं का भभका पैदा कर जनता का दिल जीतता है। नेता की बुद्धी, उसका दिमाग इसी कोशिश में खंपा रहता है कि कैसे लोगों को उल्लू बनाते रहा जाए। उन्हे बहकाते हुए, मूर्ख बनाए रखा जाएं। यह काम, झूठ के बीजों पर भावनाओं के उभार से बनती है। लोगों में भय, असुरक्षा, चिंता, आवेग, उमंग, जज्बा बना कर उनमें यह मनोविकार बनाया जाता है कि फंला के ही हाथों सुरक्षा है, फंला चेहरे से मेरा और मेरे देश का महान बनना संभव है।

जाहिर है मानव सभ्यता का विकास भले बुद्धी, तर्क, सत्य से हुआ है लेकिन इंसान का जीना भावना प्रेरित, इमोशनल ड्राइव में है। आम जीवन में भावना पहले है फिर बुद्धी-तर्क है। सन् 1739 में एक स्कॉट दार्शनिक डेविड ह्यूम ने पते की यह बात कहीं थी कि बुद्धी (तर्क) अनिवार्यतः भावनाओं की गुलाम है। राजनैतिक विचारकों ने राजनीति में झूठ के बोलबाले में ले देकर यह लाचारी बताई हुई है कि कोई कुछ नहीं कर सकता है क्योंकि लोग भावनाओं में बहते है और इसलिए नेता बोलेगा ही झूठ! इंसान की इस फितरत में एक मनोवेज्ञानिक का यह कहा बहुत लोकप्रिय हुआ है कि कुत्ते की पहले भावना और फिर बुद्धी-तर्क से हिलती पूछ! व्यक्ति यदि नैतिकता में फैसला करेगा तब भी पहले वह भावनात्मक होगा, या मन की सहजता, इन्टूइशन (बिना आगापीछा सोचे, प्रमाण के) से होगा। ऐसा करते हुए वह माने हुए होगा कि वह प्रमाण, तर्क में ऐसा कर रहा है जबकि हकीकत में फैसला आंख के पलक झपकाने जैसा है। बाद में भले चाहे जो सफाई हो पर असलियत कुत्ते की पहले भो-भो में भावना और फिर सोचने-बुद्धी की हिलती दुम!

क्या यह व्यवहार डोनाल्ड ट्रंप और उनके भक्तों का तीन नवंबर के बाद नहीं है? डोनाल्ड ट्रंप ने मतगणना पूरी होने से पहले ही चुनाव को फ्राड और अपने को विजेता घोषित किया तो उनकी भक्त जनता भी अपने नेता के साथ भावना में बहती हुई।

मैं यहां भटका हूं लेकिन इसलिए कि एक मूर्ख नेता और उसके मूर्ख भक्त मतदाताओं से राष्ट्र-राज्य, कौम, नस्ल का भावावेश की राजनीति से होता हुआ भयावह नुकसान जब अमेरिका से साबित है तो भारत जैसे देश का भविष्य में क्या बनेगा इसका अनुमान लगा सकते है। एक अकेले ट्रंप ने, झूठ की उनकी राजनीति ने इतना नुकसान किया कि सब सोच-सोच कर हैरान है कि अमेरिका कैसी मानसिक अवस्था में जा पहुंचा है। इससे वह उक्ति बेमतलब हो रही है कि राजनेता कुछ लोगों को लगातार मूर्ख बनाए रख सकते है लेकिन हमेशा नहीं! मगर अब लगता है कि देश विशेष के अधिकांश लोगों को नेता लगातार झूठ बोलते हुए हमेशा मूर्ख बनाए रख सकते है!

वजह क्या वे मुद्दे, वे मसले नहीं है जिनसे लोगों में भय, असुरक्षा का वह भावावेश पैंठता है जिससे अस्तित्व की चिंता में प्राण सूखने लगते है। न समझ आने वाली बात है कि शीत युद्ध, परमाणु हथियारों की प्रतिस्पर्धा के खतरे में सोवियत संघ से कंपीटिशन में अमेरिकी लोग इतने भयाकुल नहीं हुए जितने छह सालों से है।  डोनाल्ड ट्रंप के बिना गौरे नस्लवादी अपनी रक्षा नहीं समझ रहे है। इनमें कालों, इस्लामी जेहादियों, वामपंथियों, प्रवासियों से इतना भय आवेग बना है जितना कम्युनिस्टों के पीक वक्त नहीं बना!

लोकतंत्र में नेताओं द्वारा झूठ के बीज-खाद-पानी से वोटों की फसल उपजाना पुरानी बात है लेकिन 21 वीं सदी के सन् 2020 के विनाशकाल में नेताओं के धोखे-झूठ की जनता दीपावली मनाती हुई है तो अमेरिका जैसे सभ्य देश में गृहयुद्ध का लोग हुंकारा मारते हुए!  तभी डोनाल्ड ट्रंप और उनका झूठ अर्से तक दुनिया में विश्लेषण का मसला रहेगा। सोचे ट्रंप ने चार साल के अपने कार्यकाल में कितने झूठ बोले? सन् 2016 के चुनाव से पहले प्रचार के वक्त, फिर तीन नवंबर के चुनाव से पूर्व के राष्ट्रपति कार्यकाल में और अब झूठ से अमेरिका में जो दो फाड़ बनाया है तो उसका लेखाजोखा क्या बनेगा? अपना मानना है कि वे खुद भी अपने झूठ के शिकार हुए है।  वैसे दुनिया में माना जा रहा है कि ट्रंप की नंबर एक उपलब्धि खुद का ग्रेट झूठा बनना है और अमेरिका को झूठा बनाना है। मगर उनके दिवाने है जो मानते है कि उन जैसा सत्यवादी दूसरा कोई नहीं! ट्रंप खुद अपने को अब्राहम लिंकन जैसा महान, सत्यवादी, अश्वेतों के हित में काम करने वाला कहते है तो उनके भक्त मतदाताओं में यह भावना, यह जज्बा है कि उन जैसा मर्द राष्ट्रवादी, छप्पन इंची राष्ट्रवादी कभी नहीं हुआ।

सीधा अर्थ है ट्रंप और उनके ट्रंपवाद ने झूठ का वह अतिवाद, उसकी वह सुनामी बनाई है जिसके चपेटे में लोगों का सोचना संभव ही नहीं! जब चौबीस घंटे झूठ है, हर पल, हर क्षण झूठ है तो व्यक्ति भले बीमार हो लेकिन वह ट्रंप के इस कहे को माने रखेगा कि महामारी कल खत्म हो जाएगी, परसो या अप्रैल में, सितंबर, चुनाव से पहले खत्म होगी!

एक अमेरिकी विश्लेषक का यह विश्लेषण पते का है कि जिन लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप को 2016 में जीताया वे उनकी सत्ता याकि ट्रंपशाही के अवगुणों पर इसलिए विचार नहीं कर सकते है क्योंकि उन्होने वोट दे कर जीताया है। लोग कुछ भी कहे वोट दे चुके मतदाता मुश्किल से पाला बदलते है। ट्रंप को ले कर अमेरिका में एक विश्वविद्यालय में अध्ययन हुआ कि लोग नेता विशेष के भक्त है या रीति-नीति-विचारधारा के प्रतिनिधी नेता होने से वफादारी बनी है तो निष्कर्ष निकला कि डोनाल्ड ट्रंप ने रिपब्लिकन पार्टी के विचारों, तौर-तरीकों से विद्रोह कर अपनी दादागिरी बनाई तो अनुदारवादी, कंजरवेटिव लोग नीतियों के बजाय ट्रंप के निजी तौर पर यह सोचते हुए भक्त बने है कि कैसा गजब मर्द राष्ट्रवादी नेता है! सो विचारधारा के बजाय नेता के प्रति वफादारी वाले भक्त।

रिसर्चरों से यह तथ्य प्रमाणित है कि आम आदमी के लिए जीवन की दैनिंदिनी के व्यवहार में झूठ को पकड़ना, समझना मुश्किल होता है। लोग भोले होते है, वे ठग गए, ठगे जा रहे है यह उन्हे बोध नहीं हो पाता।

अलबामा विश्वविद्यालय के टीम लेविन ने अपनी आगामी पुस्तक “ठगे” (Duped) में क्रमिक विकास याकि ईवोलूशन के दबाव का असर बताया है जो लोग सहजता में मानते है कि दूसरा झूठ नहीं बोल रहा। आम व्यवहार में जब सत्य है तो दूसरा भी सत्य ही कह रहा होगा, यह माना जाता है। इसलिए अच्छा वक्ता, मार्केटिंग वाला अपना भाषण बेहतर बनाने का खास ध्यान रखेगा। नेता को पता है कि सुनने वाले को कैसे बांधना है। यह संभव ही नहीं है कि सुनने वाले तथ्य जांचते हुए कही गई बात ग्रहण करें। यदि डोनाल्ड ट्रंप ने कह दिया कि ईस्टर तक वायरस खत्म हो जाएगा तो हो जाएगा। लोगों के दिमाग में जब ट्रंप (या किसी भी नेता) की वायरिंग है तो उससे जो सुनेगा वह सही मानेगा। टीम लेविन ने इसे ठगे जाने की वायरिंग (hard-wired to be duped) बताई है।

एक और बात, यदि राजा याकि सत्तावान जब आम जनता से कुछ कहता है तो लोगों का दिमाग जल्द उसके आगे समर्पित होता है। ‘अथोरिटी के प्रति वफादारी’ में तब सोचना-विचार स्थगित या बंद हो जाता है। सन् 1961 में मनोवेज्ञानिक स्टेनली मिलग्राम का एक प्रयोग-अध्ययन यह थ्योरी लिए हुए है कि यदि लोग यह जाने हुए हो कि ऊपर, सुपीरियर के कहे को वह फोलो कर रहा है तो जो कहां जाएगा वह सहजता से करता रहेगा। न वह आगा-पीछा सोचेगा और न परिणाम पर। (तभी सोचे भारत की नौकरशाही पर)

भोलेपन में बहकने, ठगे जाने, फोलो करने की लोगों की सहजता में फेक न्यूज का अलग तड़का बना है। फर्जी खबरों ने लोगों में अंर्तनिर्मित भोलेपन को घातक रूप से फैला दिया है। साइंस नाम की विज्ञान पत्रिका में छपे एक अध्ययन अनुसार सत्य की बजाय झूठ बहुत व्यापकता में तेजी से, गहराई में फैल रहा है और खासकर फर्जी राजनैतिक खबरों से। फर्जी खबरे मतदाताओं को झूठ में जीने का आदी बना दे रही है।

जो हो, ट्रंप के कारण अमेरिका में यह विश्लेषण खूब है कि झूठ को पंख इतने कैसे लगे जो इतने करोड लोग बतौर भक्त व्यवहार कर रहे है। मनोविज्ञान एक पहलू है लेकिन राजनीति का इतना झूठा हो जाना वह नई गुत्थी है जिससे लोकतांत्रिक देश हमेशा के लिए झूठ की कैंसर गांठे बनाए बीमार हो सकते है। तब भविष्य क्या होगा?  सोचे झूठ ने आज दुनिया के सर्वाधिक ज्ञानवान देश को कैसा बदल डाला है? डोनाल्‍ड ट्रंप खुद सोचते हुए आश्चर्य में होंगे कि उन्हे अपने पर जितना विश्वास नहीं है उससे अधिक उनके भक्त मतदाताओं में है जो महामारी में मरते हुए भी ट्रंप को चाह रहे है और चुनाव के सत्य को झूठ करार दे रहे है।

कैसे? जवाब में फिर दार्शनिकों के मनुष्य स्वभाव के इस निचोड़ की गांठ बाधे कि बुद्धी (तर्क) अनिवार्यतः भावनाओं की गुलाम है। (जारी)

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