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ट्रंप की भक्तीः भय-खौफ का मनोविकार!

ट्रंप की भेड़े और बुद्धी का सवाल-4:  डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार कहा था- मैं फिफ्थ एवेन्यू (वाशिंगटन की सड़क) के बीच खड़े हो कर किसी को गोली मारू तब भी मुझसे मेरा वोटर नाराज नहीं होगा। हां, यही हकीकत है, एकदम अविश्वसनीय।

उनका यह कहां चुनाव हारने के बाद भी सत्य है। तभी अमेरिका में कयास है कि वे भक्तों की ताकत के बूते सन् 2024 के चुनाव में राष्ट्रपति उम्मीदवार होने की अग्रिम घोषणा कर सकते है। उन्हे विश्वास है कि अभी उन्हे जो 47 प्रतिशत वोट मिले है तो वे आगे भी उनके दिवाने रहेंगे। मतलब डोनाल्ड ट्रंप और उनके भक्तों का वोट आधार स्थाई है जबकि बाईडेन के वोट मनमौजी, स्वतंत्र है। वे इधर-उधर हो सकते है, उदासीन हो सकते है।

इसलिए अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के अंध भक्तों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण लगातार है और होता रहेगा। कोर सवाल है कि गौरे कट्टरपंथी लोग क्योंकर मान रहे है कि ट्रंप हारे नहीं है और चुनाव में जो हुआ है वह साजिश है। क्या यह पागलपन नहीं है? निश्चित ही है। क्या यह खुद लोगों के मूर्ख, पागल होने से है या डोनाल्‍ड ट्रंप ने लोगों को कोई भांग खिलाई हुई है जिससे सब ट्रंप के रॉकेट में बैठे अपने को आकाश में उड़ता बूझ मस्त है? ग्रेट डोनाल्ड, ग्रेट अमेरिका और ग्रेट गौरे अमेरिकी ईसाईयों की ग्रेट उड़ान!

जवाब मनोविज्ञान, दिमाग की तंत्रिकाओं याकि न्यूरोलोजिकल बुनावट में छुपा हुआ है। मतलब जो बाईडिन के 50-51 प्रतिशत मतदाताओं के मुकाबले ट्रंप के 47 प्रतिशत मतदाताओं का दिमाग अलग तरह से काम करता हुआ है। भक्तों के दिमाग की तंत्रिकाओं में ऐसी रसायनिक क्रिया-प्रतिक्रिया है जिससे ट्रंप की भक्ति का अंधापन बना है। साइकोलॉजीटुडे में ट्रंप भक्तों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए मनोवैज्ञानिक बॉबी एजारियन ने ये तीन वजह याकि थ्योरी बताई है। उस अनुसार खुलासा कुछ यों बनता है-

  • डनिंग-क्रुगर प्रभाव- इस अनुसार ट्रंप भक्त इग्नरन्स याकि अनभिज्ञता के मारे है। उन्हे तथ्य, हकीकत, सच्चाई ज्ञात नहीं है और ऐसा जानकारी न होने या दुष्प्रचार से है। ट्रंप ने हल्ला बनाया कि काले और वामपंथी लोग अमेरिका में जंगल राज ला देंगे। अमेरिका में अपराध सुरसा की तरह बढ़ रहे है, ओबामा ने आर्थिकी बरबाद की तो इस प्रचार के प्रतिवाद में लोगों के आगे यह हल्ला, सत्य प्रचारित नहीं था फंला हकीकत है। सवाल है अमेरिका में विपक्ष, मीडिया, संसद याकि जिंदादिल लोकतंत्र है तो भक्तों को जानकारी का टोटा कैसे हो सकता है? इस सवाल पर डनिंग-क्रुगर प्रभाव थ्योरी में यह व्याख्या है कि किसी का इग्नरन्स याकि अनभिज्ञ होना समस्या नहीं है लेकिन यह पता नहीं होना ज्यादा बड़ी समस्या है कि वह यह मानने को ही तैयार नहीं होता कि तथ्य, हकीकत दूसरी भी हो सकती है। लोगों का यह नहीं सोचना, मानना कि वे अनभिज्ञ, सत्य नहीं जानते है, अज्ञानी है तो इस अबूझपने से दिमाग की तंत्रिकाएं दोहरे भार में जकड़ी होती है। अध्ययनों से प्रमाणित है कि ज्ञान विशेष से जो लोग अनभिज्ञ होते है वे दिमाग में कॉग्निटिव़् याकि संज्ञानात्मक, उस ज्ञान विशेष बाबत यह पूर्वाग्रह, यह झूठ पाले होते है कि वे सब जानते है। दिमाग मानेगा ही नहीं कि वे विशेषज्ञ नहीं है जो आर्थिकी, सुरक्षा, महामारी जैसे मामलों में विशेषज्ञता वाली जानकारी नहीं लिए हुए है। मैं तो सब जानता हूं जबकि इसके पीछे छुपा सत्य यह है कि उसे पता नहीं कि उसे विषय विशेष का ज्ञान नहीं है। तभी दिमाग सही फैसले में समर्थ नहीं होता। मनोवैज्ञानिक डेविड डनिग ने इसी भाव में लोगों के राजनैतिक फैसले करने की बात कही है। मतलब लोग इतने समझदार, स्मार्ट भी नहीं जो समझे कि वे नादान है और उन्हे विदेश नीति, सुरक्षा नीति, आर्थिक आदि मसलों में जानकारों की राय जान कर, पढ़ कर अपने को जानकार बना कर फिर राय बनानी चाहिए, फैसला करना चाहिए।
  • खतरों को ले कर अतिसंवेदनशीलता (हाइपर्सेन्सिटिविटी)- अपना मानना है यह इंसान के दिमाग, बुद्धी की तंत्रिकाओं के संजाल का सर्वाधिक घना और नंबर एक रिएक्टीव, प्रतिक्रियात्मक सत्य है। विज्ञान से यह प्रमाणित है कि जो लोग सोच में अनुदारवादी, कंजरवेटिव, कठमुल्ला होते है वे जब कोई खतरा बूझते है तो तंत्रिकाएं तुरंत उत्प्रेरित हो तिल का ताड़ बना देती है। ‘साइंस’ पत्रिका में सन् 2008 में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। उसका निचोड़ था कि आक्समिक शौर या ग्राफिक इमेज देख कंजरवेटिव व्यक्ति का शारीरिक रिएक्शन भारी होगा बनिस्पत लिबरल, उदार सोच वाले व्यक्ति के। ऐसे ही ‘करंट बॉयलोजी’ पत्रिका में छपे ब्रेन इमेजिंग अध्ययन का सार है कि राजनैतिक तौर पर दक्षिणपंथी बडा एमिग्डाला/ प्रमस्तिष्कखंड लिए होते है। मतलब दिमाग का वह ढ़ाचा जो भय-चिंता में इलेक्ट्रीकली सचेत रहता है। सन् 2014 में एफएमआरआई अध्ययन में यह पाया गया कि खतरनाक इमेज जैसे क्षत-विक्षित लाशों को देखने, खतरनाक-धमकाती इमेज को बूझते हुए मस्तिष्क, ब्रेन को यदि मॉनिटर करें तो उससे मालूम हो जाएगा कि कौन व्यक्ति उदारवादी है और कौन कट्टर, अनुदारवादी! मतलब डरा हुआ दिमाग कंजरवेटिंव होता है। मतलब जिसका दिमाग भय-चिंता का मारा होता है वह कंजरवेटिव!

दिमाग की यह क्रिया-प्रतिक्रिया आटोमेटिक है, ये तर्क, लॉजिक, वजह विशेष से संचालित नहीं होती। यह दिल-दिमाग में बैठे खतरे से संचालित है। डोनाल्ड़ ट्रंप को इतना भर करते रहना है कि वे मुसलमान, मेक्सिकों के घुसपैठियों, प्रवासियों का डर बनाए रखे तो अपने आप कंजरवेटिव गोरों के दिमाग में खतरे की लाल बत्ती जलती रहेगी जिसका बटन ट्रंप के हाथ में होगा। वे डर को कम-तेज करके समर्थकों को सुरक्षा की चिंता में सुलगाएं रहेंगे और वोट पाते जाएगें। भय और उससे सुरक्षा दिलाने वाला महानायक जब दिमाग की पहली प्राथमिकता है तो वह नेता बाकि कुछ भी करें सब माफ!

  • आंतक प्रबंधन थ्योरी- सोशल साइकोलॉजी का यह सिंद्धात इस बात का खुलासा है कि डोनाल्ड ट्रंप का भय बनवाना कैसे दोगुना प्रवाभी था। इस सिद्दाधंत के अनुसार इंसान अपनी नश्वरता को लेकर खास तरह से जागरूक होता है। मौत होनी है, इस बोध से उसके भीतर बाहरी खतरों, चिंताओं, आंतक की बात चुपचाप, अचेतन पैंठी रहती है। मन का यह भय, आंतक, खौफ व्यक्ति के दिमाग में हम और वे का भेद, वैश्विक सांस्कृतिक नजरिया कुलबुला देता है जिससे धर्मं, राजनैतिक विचारधारा, राष्ट्रीय पहचान जैसी बातों से आश्वस्तता, मन का लगाव बनता है। ऐसा होना नश्वर जीवन के बोध के बीच जीवन के अर्थ और जीवन मूल्यों का बफर है। सो आंतक प्रबंध थ्योरी के अनुसार नश्वरता व मौत की याद कराते हुए जब कोई भय-खौफ का नैरेटिव बनता है तो लोग उस नेता, उस व्यक्ति को आंख मूंद समर्थन देंगे जो उनका नजरिया लिए, उनकी विश्व, धर्म, राष्ट्रीय, नस्लीय पहचान लिए हुए होता है और जो अधिक आक्रामकता से उस नजरिए को उकेरता है। यह थीसिस सैकड़ों अध्ययनों से प्रमाणित है और कुछ में यह निष्कर्ष दो टूक है कि दक्षिणपंथी, कट्टरपंथी, अनुदारवादी दिमाग मौत के विचार से तुरंत ट्रीगर होते है।

सो भय, खतरे और मौत की चिंता दिल-दिमाग में राष्ट्रवाद को पैंठाती है। उस राष्ट्रपति उम्मीदवार को वोट अधिक मिलते है जो कंजरवेटिव रूझान जाहिर किए हुए होते है। नश्वरता, मौत, खतरे के मनोविज्ञान ने ही कंजरवेटिव राष्ट्रपतियों को दुनिया में सैनिक हस्तक्षेप को प्रेरित किया है और वे जीतते भी रहे!

डोनाल्ड ट्रंप ने ओबामा राज के विलोम में गौरे-नस्लीय-ईसाई अनुदारवादी अमेरिकियों में भय-चिंता बना कर वोट पकाएं। उन्होने वे मनोवैज्ञानिक हालात बनाए जिससे भयाकुल लोगों का दिमाग पोजिटिविटी में उनके लिए दौडते हुए था। सोचने, समझने, बुद्धी की जरूरत ही नहीं। लोगो को सुध नहीं हुई कि यह सब देश-समाज में विभाजकता वाला प्रोपेगेंडा है। पर भय-चिंता में भरा दिमाग जब एक दिशा में बढ़ता है तो आंतक प्रबंध थ्योरी में लोग भक्त बनते जाते है। और एक बार भक्त हो गए तो ट्रंप को भले दुनिया हारा व फेल माने मगर फिर भी भक्त के लिए वे रक्षक।

  • मन-मस्तिष्क को सघनता से बांधना- (High Attentional Engagement)- डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन की उम्मीदवार बहस और विज्ञापनों की चालीस मिनट की क्लीपिंग में सहभागियों की ब्रेन एक्टिविटी को मॉनिटर कर उसका निष्कर्ष, अध्ययन हाल में प्रकाशित हुआ है। पाया गया कि ट्रंप में वह खास काबलियत है जो हिलेरी क्लिंटन में नहीं थी। हिलेरी जहां श्रोताओं-दर्शकों का केवल ध्यान बनवाए हुए थी वहीं ट्रंप लोगों के दिल-दिमाग, ध्यान और भावना दोनों को पूरे सत्र उभारे-भभकाएं हुए थे। ट्रंप की यह कला, यह जादूगरी इसलिए कि एक तरफ शोमेनशीप, सिंपल मैसेज मदारीपने, झूठ, शैली में वे हिलेरी के आगे अव्वल थे तो दूसरी और विसेरल लेवल याकि खोपंड़ी की आंतों की हलचल को भभकाए रहने वाला उनका अंदाज था, जुमले थे। अमेरिकियों को मनोरंजन और रियलिटी शो पसंद है। सो ट्रंप से दर्शकों को दोनों तरह का मजा मिलता है। जो विरोधी है वे भी यह सोचते हुए देखेंगे कि आज वे क्या मूर्खतापूर्ण झूठ और बेहूदा बात कहेंगे। समर्थक अलग तरह सोचेंगे पर वे भी देखेंगे। इससे दिल-दिमाग का ध्यान और भावनाओं का उद्वेलन ट्रंप से बनेगा ही। ट्रंप भक्त अपनी अलग-अलग दिमागी चिंता, भय और यथास्थिति से चिढ़ जैसी बातों में उनके लिए पोजिटिवीटी में रिएक्ट होते हुए होंगे। तभी भक्तों के बीच ट्रंप को अधिक मेहनत की जरूरत नहीं होती है।

बावजूद इसके ट्रंप हार गए। वह भी जो बाईडेन से, जिनमें जादूगरी का, लोगों को मूर्ख, भक्त बनाने वाली एक काबलियत नहीं है। तो कैसे यह हुआ? एक ही जवाब बनता है। और वह अमेरिका में गैर-भक्त लोगों में बना यह डर कि ट्रंप दुबारा राष्ट्रपति बने तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। अमेरिका खत्म हो जाएगा! तभी इतिहास का रिकार्डतोड मतदान हुआ। ट्रंप वफादारों ने भी रिकार्ड तोड़ वोटिंग की तो ट्रंप से बरबादी की आंशका पाले अमेरिकीयों ने भी वोट का मौका चूका नहीं। इसलिए सन् 2020 का अमेरिकी चुनाव मनोविज्ञान अखाड़े वाला वह शक्ति परीक्षण था जिसमें झूठ के मुकाबले सत्य इसलिए जीता क्योंकि अमेरिका अपेक्षाकृत अधिक बुद्धीबल लिए हुए है। बुद्धी से पैदा चिंता में लोग तमाम विपरित परिस्थितियों के बावजूद जैसे भी हो वोट डालने की धुन में थे। अब इससे यह भी विचार बनाता है कि अगले चार साल भी अमेरिका भक्त मूर्खों बनाम सत्यवादी बुद्धीमानों में खींचा रहेगा। ट्रंप अमेरिका को सामान्य-सहज नहीं बनने दे तो आश्चर्य नहीं होगा। ट्रंप से अमेरिका की मुक्ति आसान नहीं है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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