बात हुई, उत्साह गायब


लंबे इंतजार के बाद आखिरकार अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन किया। लेकिन इसको लेकर भारत सरकार में ज्यादा उत्साह नहीं देखा गया है। क्या इसका कारण लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनका जताया गया संकल्प है? मुमकिन है कि भारत सरकार को बाइडेन की ये टिप्पणी भी नागवार गुजरी हो कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति वचनबद्धता भारत- अमेरिका संबंधों का आधार है। भारतीय जनता पार्टी सरकार इन दिनों ऐसी बातों को लेकर खासा संवेदनशील हो गई है। बहरहाल, आज अमेरिका भारत को नजरअंदाज नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी मुख्य चिंता चीन की बढ़ती ताकत को नियंत्रित करना है। इसीलिए जो बाइडेन ने चार देशों के समूह- क्वैड की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर भी जोर डाला और दक्षिण सागर में मुक्त नौवहन के प्रति दोनों देशों के संकल्प की पुष्टि की। लेकिन दोनों देशों के बीच असहमति का एक नया मुद्दा म्यांमार में सैनिक तख्ता पलट के रूप में उभरा है।

अमेरिका ने तख्ता पलट की दो टूक निंदा की है, जबकि भारत की इस पर प्रतिक्रिया मद्धम रही है। जहां तक क्वैड का संबंध है, तो इंडो- प्रशांत में चीन की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने ये समूह बनाया है। क्वाड सदस्य देशों के बीच शिखर सम्मेलन और युद्ध अभ्यास होते आए हैं। भारत और अमेरिका ने पिछले दशकों में ज्यादातर मैत्रीपूर्ण संबंधों बनाए रखा है। दोनों देशों ने हाल के सालों में दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती उपस्थिति को देखते हुए रणनीतिक साझेदारी के तहत आपसी संबंधों को और गहरा किया है। आज यही संभवतः दोनों देशों के बीच सहमति का सबसे ठोस क्षेत्र है। डॉनल्ड ट्रंप के दौर में भारत और अमेरिका का रिश्ता एक दूसरे धरातल पर था। उसके बारे में कोई ठोस समझ बनाना मुश्किल था। ट्रंप की अस्थिर सोच समस्या पैदा करती थी। लेकिन बाइडेन के दौर में अमेरिका के एक सुसंगत नीति की तरफ लौटने की आशा है। वैसे अमेरिका में हालात ऐसे हो गए हैं कि लोकतंत्र की रक्षा के प्रति संकल्प जताने को अब अमेरिकी राष्ट्रपति की महज रस्म अदायगी नहीं समझा जा सकता। इसका पेच दोनों देशों के रिश्तों में आ सकता है, क्योंकि बाइडेन की पार्टी में आज राय यह है कि भारत लोकतंत्र के रास्ते से फिसल रहा है। ये भारत सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती है।


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