ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने हाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिंग स्थायी रूप से रोकने की धमकी दी है। इसके पहले वे संयुक्त राष्ट्र के एक अन्य एजेंसी यूनेस्को से अमेरिका को निकाल चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में हुई पेरिस जलवायु परिवर्तन संधि से भी ट्रंप प्रशासन किनारा कर चुका है। विश्व व्यापार संगठन में जजों की नियुक्तियां रोक कर हर व्यावहारिक रूप में इस संस्था को ट्रंप निष्प्रभावी बना चुके हैँ। ट्रांस पैसिफिक करार और नाफ्टा जैसे बहुपक्षीय व्यापारिक समझौते उनकी नीति का शिकार बन चुके हैं। ये तमाम कदम ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के अनुरूप है। हालांकि इस नीति पर चलते हुए उनके नेतृत्व में अमेरिका ने वैश्विक नेता की अपनी हैसियत भी गंवा दी है। वह ना तो अब नैतिक रूप से और ना ही कूटनीतिक रूप से विश्व जनमत का नेतृत्व का करता है। अनेक जानकार उन दिन को ज्यादा दूर नहीं मानते जब सैनिक तौर पर भी अमेरिका के पास साथी देशों की कमी हो जाएगी। इसी नीति को ट्रंप अब अपने एक और कदम से आगे बढ़ाने जा रहे हैं।

अमेरिका ने 35 देशों वाली ओपन स्काई संधि से निकलने की धमकी दी है। इस संधि के तहत सदस्य देश एक दूसरे के वायु क्षेत्र में निगरानी के लिए उड़ान भर सकते हैं। ट्रंप प्रशासन ने रूस पर संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि संधि से औपचारिक तौर पर बाहर आने में छह महीने का समय लग सकता है। फिलहाल अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पूरे मामले को रूस पर डाल दिया है। कहा है कि रूस के साथ अमेरिका के संबंध वैसे बहुत अच्छे हैं, लेकिन रूस इस संधि का पालन नहीं कर रहा है। जब तक वह ऐसा नहीं करता, तब तक अमेरिका इससे बाहर रहेगा। इस पर 1992 में दस्तखत हुए और 2002 से इस पर अमल शुरू हुआ। इसका मकसद सदस्य देशों को एक दूसरे के वायु क्षेत्रों में निगरानी उड़ानों की अनुमति देना है, ताकि उनमें आपसी विश्वास मजबूत हो सके। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि रूस लगातार एक साल से पड़ोसी जॉर्जिया और बाल्टिक तट पर रूसी इलाके कालिनिनग्राद में अमेरिकी उड़ानों के लिए अड़चनें पैदा कर रहा है। अब जबकि डोनल्ड ट्रंप फिर से राष्ट्रपति चुनाव में उतर रहे हैं, यह उनके लिए अपनी मर्दाना नीति दिखाने का एक और मौका है। जाहिर है, ये संधि सचमुच खतरे में है।

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