पर झूठ तो बेशर्म व नीच! - Naya India
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पर झूठ तो बेशर्म व नीच!

डोनाल्ड ट्रंप ने लोकतंत्र परंपरा का लोकव्यवहार, सामान्य सद्भाव भी नहीं दर्शाया। लेकिन यह आर्श्चयजनक इसलिए नहीं है क्योंकि झूठ और नीचता में जिनका जीवन ढला होता है वे सोच नहीं सकते हैं कि क्या पाप है और क्या पुण्य!  डोनाल्ड ट्रंप ने, न अपने को गलत माना, न अपनी हार मानी, न गलत-तौर-तरीकों के लिए शर्मिंदगी जाहिर की और न शपथ समारोह में शामिल होने की हिम्मत जुटा पाए। इसलिए कि उन्होंने जो झूठ बनाया, झूठ की गंगोत्री बना अपने जो वोट पकाए, भक्त बनाए, लंगूर बनाए उनके आगे वे कैसे यह दर्शा सकते थे कि जो बाइडेन शपथ ले रहे हैं और वे उस सत्य के गवाह हों। हां, डोनाल्ड ट्रंप पूरे अमेरिकी इतिहास के वे कलंकित राष्ट्रपति बने हैं, जिनमें शपथ समारोह में उपस्थित होने व फिर व्हाइट हाउस में नए राष्ट्रपति का स्वागत कर विदाई लेने की हिम्मत नहीं थे, साहस नहीं था क्योंकि वह अपने झूठ को स्वीकारना होता। तथ्य है कि शपथ समारोह में उनके डिप्टी उपराष्ट्रपति पेंस उपस्थित थे तो सकुचाए, अकेले खड़े हुए से। उनका चेहरा अपने बॉस के झूठ की शर्मिंदगी की लाचारगी लिए हुए था।

तय मानें कि ट्रंप बेशर्मी के साथ समर्थकों को कहते रहेंगे कि वे चुनाव जीते हैं। डोनाल्ड ट्रंप लगातार, अभी भी झूठ के प्रोपेगेंडा से तैयार भक्तों में बेशर्मी से हल्ला बनाए हुए हैं कि वे ही असली विजेता हैं, वे ही सच्चे हैं। उनके झूठ के प्रोपेगेंडा के ही तो चलते अमेरिकी संसद पर उनके भक्तों का हमला हुआ। डोनाल्ड ट्रंप क्योंकि झूठ और नीच प्रवृत्ति के हैं और उसी से उनकी सत्ता, राजनीति का राज है तो वे हारने के बाद भी अमेरिका में विभाजन बनाए रखेंगे। अमेरिका को सामान्य नहीं होने देंगे। वे शपथ समारोह से पहले ही उड़ कर फ्लोरिडा के अपने घर इसलिए चले गए क्योंकि उन्हें आगे झूठ बनवाए रखना है। वे शपथ समारोह में शामिल हो कर भला कैसे इस सत्य पर ठप्पा लगाते कि जो बाइडेन जीते हैं। उनके और उनके भक्तों के झूठ के शोर ने ही शपथ तक दुनिया में यह सस्पेंस, यह बैचेनी बनाए रखी कि सत्य सचमुच क्या जीतेगा, क्या बाइडेन की शपथ हो जाएगी?

हां, कितनी बड़ी बात कि लोकतंत्र, चुनाव, सत्य के बावजूद ऐन वक्त तक बेचैन थी कि कहीं झूठ टेकओवर न कर जाए। कुछ ऐसा न हो जाए कि बाइडेन शपथ नहीं ले पाए। सत्य तीन नवंबर को चुनाव के साथ ही स्थापित था लेकिन इसके विश्वास में, 99.9 प्रतिशत संभावना के बावजूद अमेरिका खुफिया एजेंसी, अमेरिकी सेनाधिकारियों, वहां की व्यवस्था से लेकर दुनिया में 0.1 प्रतिशत बैचेनी थी कि डोनाल्ड ट्रंप के झूठ का ढिंढोरा कहीं जीत न जाए। कहीं बाइडेन के साथ, ऐन वक्त ऐसा कुछ न हो जाए कि शपथ न हो सके। सोचें, दुनिया के नंबर एक महाबली देश का ऐसी दशा में गुजरना क्या झूठ के भयावह रूप का प्रमाण नहीं है?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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