झूठ से ट्रंप का क्या बना तो अमेरिका का क्या? - Naya India
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झूठ से ट्रंप का क्या बना तो अमेरिका का क्या?

अमेरिका पर ताली बजाएं या अमेरिका को लोकतंत्र का फ्रॉड, धोखा करार दें? डोनाल्ड ट्रंप की मानें तो उनके साथ धोखा हुआ। वे अमेरिकी चुनाव के फ्रॉड से हारे हैं। उन्होंने चुनाव नतीजों को मानने से इनकार किया है। वे सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं। वे जब ऐसा कह रहे हैं तो उन्हें वोट देने वाले सात करोड़ अमेरिकियों में असंख्य लोग होंगे, जो चुनाव में फ्रॉड हुआ मान रहे होंगे। जब अमेरिका में ऐसा है तो दुनिया में अमेरिकी लोकतंत्र क्या कलंकित नहीं हुआ? तभी सोचें कि अमेरिका के भीतर और अमेरिका के बाहर राष्ट्र-राज्य, कौम के गौरव को ट्रंप ने कितना कलंकित किया है! ट्रंप ने चुनाव, चुनाव प्रक्रिया, संघीय-विकेंद्रित ढांचे, अदालत, विरासत, व्यवस्था सबको झूठ के काले रंग में पोता और खुद अपना चेहरा भी काला-भस्मासुरी बना डाला। तभी आश्चर्य नहीं जो हारते हुए ट्रंप की ट्विट और उनकी प्रेस कांफ्रेस को ट्विटर व टीवी चैनल लाइव करते हुए कहते मिले कि यह फालतू बकवास है। हम चुनाव में फ्रॉड हुआ नहीं मानते, इसका साक्ष्य नहीं है इसलिए पाठकों-दर्शकों, यह मिसलीड करने वाला ट्रंप का ट्विट है या यह कि ट्रंप फिर बकवास कर रहे हैं इसलिए छोड़िए इस प्रेस कांफ्रेस को व दूसरी खबर पर गौर करें!

उफ! जैसे चार साल ट्रंप ने झूठ, मूर्खता, दुष्टता में गंवाए, अमेरिका को बरबाद किया वैसे चुनाव हारने के बाद भी वे अमेरिका को करते हुए हैं। क्यों? इसलिए कि वह नेता हमेशा झूठ में जीता है जो झूठ से बनता है। राजनीति का सनातनी सत्य है कि झूठ से सत्ता आती है, झूठ से लोगों का बहकाया जाता है तो इसका गुरू, ग्रांडमास्टर नेता भी खुद झूठ में जीते हुए झूठ के मकड़जाल में फंसता जाता है। उसी में फिर मरते हुए, मरते वक्त वह तब सोचता है कि वह साजिश से मरा है। उसे न अपने हाथों देश का हुआ विनाश समझ आता है और न अपना विनाश।

डोनाल्ड ट्रंप को समझ नहीं आ रहा है कि उन्होंने, जहां अमेरिका को बरबाद किया, उसे कमजोर बनाया तो वहीं खुद अपने हाथों अपने को इतिहास का कलंक बनाया! ट्रंप और उनके करीबी, उनका कुनबा, उनके पार्टी भक्त सब आज भी मान रहे हैं कि वे ग्रेट, उनसे अमेरिका ग्रेट तो वे भला कैसे हार सकते हैं! इसलिए वे चुनावी फ्रॉड और साजिश से हारे हैं।

जाहिर है झूठ की खेती का कमाल है जो वह अपने हरे-भरेपन, लहलहाती फसल से अपने आप पर इतनी मुदित रहती है कि यह ध्यान नहीं बनता कि झूठ के बीजों की फसल कांटों की है। बबूल की है, मौके के जाया होने, बरबादी व विनाश की है। बबूल की खेती है न कि आम की। उससे लोगों का जीना, राष्ट्र-कौम का अनुभव सहज नहीं होगा तो खुद की भी आपात बेमौत, बेगर्द मौत होती है!

डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी लोगों के दुख, उनकी नब्ज पकड़ कर, परिस्थितियों का लाभ उठा कर अपनी लोकप्रियता बनाई। उसके लिए दस तरह के झूठ बोले। जैसे ये कि वे इस्लाम को ठोक देंगे। अमेरिका को आत्मनिर्भर बना देंगे। अमेरिका वापिस सोने की चिड़िया होगा आदि, आदि। उनका झूठ बोलना हिलेरी क्लिंटन से ज्यादा हिट हुआ तो राष्ट्रपति बने ट्रंप ने झूठ से बनी कामयाबी में अपने को न केवल ग्रेट माना, बल्कि समझा कि झूठ से आगे चक्रवर्ती राज और उसकी कीर्ति है। वे अब्राहम लिंकन से अधिक महान हो जाएंगे। उन्होने झूठ के इस नफे, उसके गुमान, अहंकार में अमेरिका की उन तमाम खूबियों, संस्थाओं के ऊपर अपनी अहमन्यता लाद दी, जिससे ‘ट्रंप इज अमेरिका और अमेरिका इज ट्रंप’ हुआ। देश में फिर यह भेद बना डाला, देश को बुरी तरह बांट डाला कि जो मेरे साथ वह देशभक्त और जो मेरा विरोधी वह राष्ट्रदोही!

नतीजतन अमेरिका का बाजा बजना ही था। ट्रंप ने अमेरिका को दो हिस्सों में बांट डाला। पूरा अमेरिका ट्रंप की धुरी में उनके पक्ष या उसके विरोध में ढला। वे पुतिन, नरेंद्र मोदी, शी जिनफिंग की कैटेगरी के अवतारी राष्ट्रपति हुए, जो अपने को राष्ट्र का रक्षक, माईबाप, सर्वज्ञ और भगवान मानते हैं।

गौर करें वह अवतारी भगवान आज अपने कपड़े फाड़ते हुए चिल्ला रहा है कि मेरे साथ फ्रॉड हुआ। उस अमेरिका को, उस संविधान, उस व्यवस्था, उस चुनाव प्रक्रिया पर वह बिफरा हुआ है, जिससे चार साल पहले बतौर राष्ट्रपति निर्वाचित हुआ था! हां, डोनाल्ड ट्रंप आज हार के इस सत्य से घायल हैं कि उनकी महानता, उनके अवतार को बतौर जोकर, मूर्ख, दुष्ट राष्ट्रपति करार देते हुए साढ़े सात करोड़ अमेरिकियों ने उन्हें लात मार सत्ता से बाहर कर दिया। देश के 244 साल के इतिहास में ट्रंप उन चार बिरले राष्ट्रपतियों में एक हो गए हैं, जिन्हें लोगों ने दोबारा नहीं चुना। उन्हें इतिहास अब दिवालिया आर्थिकी, महामारी के आगे नंबर एक फेल देश के बतौर राष्ट्रपति याद रखेगा। वे अमेरिकी इतिहास में नंबर एक झूठे, मूर्ख, अहंकारी, तुगलकी और जोकर राष्ट्रपति के रूप में याद किए जाएंगे।

हां, डोनाल्ड ट्रंप और उनके समर्थक भक्तों को ज्यादा सदमा इस झूठे मुगलाते से है कि उन जैसे महान राष्ट्रवादी का ऐसा हस्र कैसे? जान लें सन् 2020 का अमेरिकी चुनाव इस नाते इतिहासजन्य, अभूतपूर्व है कि फैसला सिर्फ और सिर्फ ट्रंप के झूठ और मूर्खता पर है। उन्हें जो बाइडेन ने नहीं हराया है, बल्कि वे सत्य बनाम झूठ की लड़ाई में हारे रावण हैं। वे 244 साल के अमेरिकी इतिहास के सर्वाधिक झूठे व मूर्ख राष्ट्रपति के रूप में जनता से खारिज हैं। चुनाव का नतीजा जो बाइडेन की जीत नहीं, बल्कि सत्यवादी-समझदार, बुद्धिमान लोगों की जीत है। इससे प्रमाणित होता है कि अमेरिका में ज्ञानवान, विवेकवान, सत्यवादी लोग अधिक हैं। जो बाइडेन और उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी का अपने बूते ट्रंप से जीतना बस में नहीं था। ट्रंप लोगों को लुभाने, मसखरापन, दंबगी, उल्लू बनाने की कारीगरी, दुःस्साहस, साधनों में बहुत आगे थे। उनके आगे 78 वर्षीय बाइडेन बेचारे से थे। लेकिन ट्रंप ने झूठ बोल-बोल कर अमेरिकी लोगों में आमने-सामने का वह दंगल बनवा दिया, जिसमें एक तरफ अनुभव से जागी सत्यवादी जनता थी तो दूसरी और ट्रंप के झूठ में हुंकारा मारते नस्ली गोरे और झूठ की मूर्खताओं में जीने वाली जनता थी।

फैसला ट्रंप के कोई सात करोड़ समर्थक वोटों बनाम विरोधी साढ़े सात करोड़ लोगों के वोट से हुआ। कह सकते हैं कि झूठ के सात करोड़ वोट कम नहीं हैं। ट्रंप सात करोड़ लोगों के तो महानायक हैं। होंगे पर उससे होता क्या है। हिटलर, स्टालिन जैसे तमाम झूठे, मूर्ख, तानाशाह का भी कभी देश दिवाना था, पतन के बाद सबका क्या हुआ? झूठ का कौन सा शहंशांह मानव सभ्यता में यादगार है?

मैंने तीन नवंबर को लिखा था– ‘तय मानें डोनाल्ड ट्रंप आसानी से सत्ता नहीं छोड़ेंगे। बावजूद इसके अपना मानना है कि दुनिया के नंबर एक देश की जनता की सामूहिक बुद्धि इतनी समर्थवान तो होगी कि अच्छे-बुरे में वह दो टूक फैसला ले। रिकार्ड तोड़ मतदान से अपने को उम्मीद है कि अमेरिकी लोग लेबनान के रास्ते पर नहीं जाएंगे।‘ वहीं हुआ। अमेरिका में सत्ता परिवर्तन समझदार लोगों के बूते है। बुद्धिमान-सत्यवादी लोगों ने ठान लिया कि बहुत हुआ अब इस झूठे-मूर्ख-दुष्ट राष्ट्रपति को हराना है। वे ट्रंप के कारण गोलबंद हुए और ट्रंप को हराने का हर तरह का उपाय सोचा। जो बाइडेन को खर्च के लिए खूब पैसा दिया, लोग उनके वॉलंटियर बने और यह बात गांठ बांध ली कि महामारी के चलते खतरा है तो पोस्टल मतदान से समय रहते पहले वोट डालो ताकि मतदान के दिन की भीड़ और ट्रंप के भक्त और लुच्चे समर्थकों के शोरगुल में उनका वोट मतपेटियों में सुरक्षित हो जाए।

सचमुच मतदान की तारीख से पहले पोस्टल वोट की सुविधा से मतदाताओं द्वारा रिकार्ड तोड़ मतदान करना, जहां ट्रंप के खिलाफ लोगों में ट्रंप से पीछा छुड़ाने के निश्चय का प्रमाण है तो अमेरिकियों की समझदारी व विवेक का भी प्रमाण है। वायरस और महामारी का डर कारण हो या ट्रंप को हराने के दोनों फैक्टर में पोस्टल बैलेट से मतदान अमेरिकियों की समझदारी जाहिर होती है। इसमें जो बाइडेन या डेमोक्रेटिक पार्टी के बंदोबस्तों का मतलब नहीं है, बल्कि मतदान करवाने वाले पचास राज्यों और दस हजार जिलों याकि काउंटी की बनाई स्वतंत्र व्यवस्था और शिड्यूल का जरूर अहम योगदान है।

ऐसी ही बातों से अमेरिका महान बना है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी झूठी-फर्जी महानता को अमेरिकी महानता का पर्याय बनाने का भोंड़ापन किया। अब उनका प्रलाप है कि उन जैसे महान के साथ अमेरिका ने फ्रॉड किया। अमेरिकी व्यवस्था ने फ्रॉड किया! नहीं, अमेरिका ने, अमेरिका के समझदार लोगों ने ट्रंप से मुक्ति पा गलती सुधारी है। अमेरिका को बचाया है। डोनाल्ड ट्रंप कितने झूठे थे और हैं यह उनके चुनाव हारने के बाद के झूठ से और प्रमाणित व दुनिया में सर्वाधिक प्रचारित है। उनके समर्थक टीवी चैनल, रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता भी ऐसे झूठे से नाता नहीं रखने के बयान देने लगे हैं। ट्रंप को उनके कई भक्त समझा रहे हैं कि इतना झूठ मत बोलो। कम से कम राजनीतिक मौत के समय तो सच बोलो! पर जो मूर्ख नेता होता है उसके पास झूठ के अलावा जनता के सामने बोलने के लिए न पहले कुछ होता है और न मौत के वक्त कुछ होता है। न हिटलर के पास कुछ था तो न स्तालिन के पास कुछ था और न डोनाल्ड ट्रंप के पास कुछ है और न आगे पुतिन जैसे झूठे तानाशाहों के पास कुछ होगा।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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