समान हक की लड़ाई - Naya India
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समान हक की लड़ाई

महिलाएं कहीं भी हों, अपने हक के लिए उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। अगर एक मोर्चा फतह होता है, तो दूसरा सामने आकर खड़ा हो जाता है। यही कहानी अमेरिकी फुटबॉल के ढांचे में देखने को मिल रहा है। वहां काम की परिस्थितियां अब भले काफी हद तक महिला फुटबॉल खिलाड़ियों के अनुकूल हो गई हों, लेकिन समान वेतन के मुद्दे पर वहां अभी भी कोई सहमति नहीं बनी है। इसलिए मशहूर खिलाड़ी मेगन रेपिनो और उनकी साथी खिलाड़ी अब अदालत के पुराने फैसले के खिलाफ ऊंची अदालत में अपील करेंगी। अमेरिका की महिला फुटबॉल खिलाड़ी पुरुष खिलाड़ियों के साथ जिस बराबरी के लिए संघर्ष कर रही हैं, वह सिर्फ समान मेहनताने का मामला नहीं है। बल्कि उसमें किस क्लास में हवाई यात्रा होगी, किस होटल में खिलाड़ियों को ठहराया जाएगा, कहां ट्रेनिंग का आयोजन होगा और ट्रेनिंग के लिए किस स्तर के प्रशिक्षक मिलेंगे, ये सब शामिल था।

अब भविष्य में राष्ट्रीय महिला टीम की खिलाड़ियों को वही सुविधाएं मिलेंगी, जो पुरुष टीम के खिलाड़ियों को मिलती हैं। इन मामलों में दोनों टीमों में लैंगिक भेदभाव नहीं रहेगा। ये सब उस सहमति का हिस्सा है जो पिछले दिसंबर में महिला टीम और फुटबॉल संघ के बीच हुई थी। मगर इस समझौते को लागू करने के लिए वेतन के मसले को अलग कर दिया गया है। इसलिए उस पर अलग से कानूनी कार्रवाई होगी। महिला टीम की प्रवक्ता वेतन पर अदालती फैसले के खिलाफ अपील करने की घोषणा करते हुए कहा कि टीम पहले की ही तरह जोश में है, ताकि उसे कानूनी रूप से समान वेतन मिल सके। अमेरिका की महिला टीम ने 2019 में अपने ही संघ के खिलाफ भेदभाव का आरोप लगाकर मुकदमा दायर कर दिया था। इस मुकदमे के कुछ ही महीने बाद महिला टीम ने चौथा विश्व कप जीता। फाइनल मैच में भी टीम के समर्थन समान वेतन के नारे लगा रहे थे। महिला टीम को समान वेतन की मांग को जिन राजनेताओं का समर्थन हासिल है, उनमें उप राष्ट्रपति कमला हैरिस भी हैं। अमेरिका की महिला फुटबॉल टीम पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा कामयाब है, लेकिन उन्हें पुरुषों के मुकाबले बहुत ही कम फीस दी जाती है। अब ये तर्क स्वीकार करने को महिला खिलाड़ी तैयार नहीं हैं। यह उनका ऐसा जज्बा है, जो सारी दुनिया में लैंगिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है।

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