संपूर्ण मानवता के खिलाफ हिमालयी भूल!


हिमालय की चोटियों पर और उसकी तलहटी में भी कुछ ऐसा हो रहा है, जिसे आंख मूंद कर विकास की होड़ में लगे लोग देख नहीं पा रहे हैं। बार-बार हिमालय की ओर से इसका संकेत भी दिया जा रहा है। जून 2013 में हिमालय की पहाड़ियों में हाल के समय की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा आई थी। हजारों लोग मारे गए थे और पहाड़ों में बहुत कुछ तहस-नहस हो गया था। दुर्भाग्य की बात है कि इस घटना से सबक लेकर प्रकृति के साथ चलने या प्रकृति के अनुरूप निर्माण करने की बजाय सरकारों ने ज्यादा पक्के निर्माण शुरू कर दिए। केदारनाथ धाम तक जाने वाली सड़कों को बेहतर बनाने के नाम पर पक्का बनाया गया, हेलीपैड नए बनाए गए और विकास के नाम पर कंक्रीट के कुछ अन्य निर्माण भी कर दिए गए।

अब करीब सात साल के बाद एक बार फिर हिमालय ने अंधाधुंध निर्माण के खतरे का संकेत दिया है। इस बार चमोली में ग्लेशियर टूट कर नदी में गिरा है, जिससे आई बाढ़ में पनबिजली की दो परियोजनाएं पूरी तरह से बह गईं, नदियों के किनारे बसे गांवों के घर बह गए, बड़ी संख्या में मवेशियों और चरवाहों को नदी का बहाव लील गया। कम से कम नौ राज्यों के दो सौ से ज्यादा लोग मारे गए या लापता हैं।

इन दोनों घटनाओं से बहुत पहले 1991 में उत्तरकाशी में और फिर 1999 में चमोली जिले में बड़ा भूकंप आया था। पहाड़ और जंगल में प्रकृति का संतुलन बिगड़ने का उसे शुरुआती संकेत माना जा सकता है। लेकिन तब भी कोई सबक नहीं लिया गया। उससे बहुत पहले हिमालय क्षेत्र में चिपको आंदोलन शुरू हो गया था। स्थानीय लोग जिनके लिए पहाड़, नदी, पेड़, पशु सब परिवार के सदस्य होते हैं उन्होंने विकास के नाम पर होने वाली पेड़ों की कटाई का विरोध किया था। सोचें, कितने दूरदर्शी, ईमानदार और प्रतिबद्ध लोग थे, जिन्होंने चिपको आंदोलन चलाया था। आज अगर वे लोग आंदोलन करते तो उनको आंदोलनजीवी बता कर उनका मजाक उड़ाया जाता। लेकिन उन दूरदर्शी लोगों को समझ में आ गया था कि अगर पेड़ काटे जाते रहे तो न हिमालय बचेगा और न उसकी गोदी में बसे गांव-शहर बचेंगे।

दुनिया भर के भूकंप वैज्ञानिक और प्रकृति का अध्ययन करने वाले लोग पहले ही बता चुके हैं कि उत्तराखंड का पूरा इलाका भूकंप की ऐसी फॉल्ट लाइन पर है, जहां भूकंप, भूस्खलन या ग्लेशियर का टूटना आम बात है। बड़े भूकंप आते रहने की संभावना भी हमेशा बनी रहती है। लेकिन स्थानीय लोग इस बात को जानते हुए भी इस इलाके में बसे रहे तो इसका कारण यह था कि वे प्रकृति के साथ कदमताल कर रहे थे। वे प्रकृति के विरूद्ध नहीं जा रहे थे, पहाड़ के विरूद्ध नहीं जा रहे थे, जंगल काट नहीं रहे थे, बल्कि उसे बचा रहे थे। अगर जंगल और पहाड़ से छेड़छाड़ नहीं होती तो भूकंप या भूस्खलन या ग्लेशियर आदि से ज्यादा बड़ा नुकसान नहीं होता। यह प्रकृति के अपने चक्र की तरह चलता रहता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चिपको आंदोलन के व्यापक असर के बावजूद विकास के नाम पर पहाड़ों को काटना, नदियों का रास्ता बदलना, जंगल काटना, कंक्रीट के निर्माण करना, सड़कें और होटलों का बनना जारी रहा। किसी को पहाड़ से निकल रही नदियों का दोहन करना था तो किसी को पहाड़ के सौंदर्य का कारोबारी इस्तेमाल करना था। कहीं पनबिजली की परियोजना लग रही थी तो कहीं पर्यटकों के लिए होटल बन रहे थे। विकास की इस अंधी दौड़ का कुल जमा नतीजा 2013 की केदारनाथ की और 2021 की चमोली की घटना है।

विकास के नाम पर असल में हिमालय की पूरी पारिस्थितिकी के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। सोचें, पूरी दुनिया में क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रत्यक्ष लक्षण क्या है? सबसे प्रत्यक्ष लक्षण ग्लेशियर यानी हिमखंडों का पिघलना है। अंटार्कटिका में भी बर्फ पिघल रही है और हिमालय में भी बर्फ पिघल रही है। क्या विकास के नाम पर पनबिजली की परियोजना लगा रहे लोगों को इसका पता नहीं है? अगर उनको पता है कि धरती का तापमान बढ़ने या जलवायु के गर्म होने का सबसे पहला असर ग्लेशियरों पर हो रहा है फिर ग्लेशियरों के इतने नजदीक पनबिजली की परियोजना लगाने की अनुमति कैसे मिली? यह सवाल पहले उठाया जाना चाहिए था। फिर भी देर से ही सही और दुर्घटना के बाद ही सही, लेकिन यह सवाल पूछा जाना चाहिए। यह आपराधिक कार्रवाई है, जो ग्लेशियरों के पिघलने की पुख्ता सूचना के बावजूद ग्लेशियरों के इतने नजदीक जाकर पनबिजली की परियोजना शुरू की गई और सैकड़ों-हजारों लोगों का जीवन खतरे में डाला गया।

ग्लेशियल लेक यानी ग्लेशियर पिघलने से बनने वाली झीलों की बढ़ती संख्या से बहुत पहले से यह अंदाजा लग जाना चाहिए था कि अगर विकास के नाम पर होने वाली गतिविधियों को रोका नहीं गया तो प्रलय आ सकती है। लेकिन लालच के मारे इंसान ने उस संकेत पर भी ध्यान नहीं दिया। काठमांडो स्थित संस्थान इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट ने 2005 में सेटेलाइट इमेज के आधार पर बताया था कि उत्तराखंड में 127 ग्लेशियल लेक हैं यानी ग्लेशियर पिघलने से बनने वाले झीलें हैं। इसके पांच साल बाद यानी 2010 में हैदराबाद की एक संस्था नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर में काम करने वाले दो वैज्ञानिकों ने बताया कि अब इस इलाके में 362 ग्लेशियर लेक बन गए हैं। यानी पांच साल के अंदर ग्लेशियर पिघलने से बनने वाली झीलों की संख्या दोगुने से भी ज्यादा हो गई। पांच साल में 235 नए झील बन गए। अगले दस साल में इनकी संख्या में और इजाफा ही हुआ होगा लेकिन अफसोस की बात है कि इनका साल दर साल का हिसाब-किताब नहीं रखा जाता है।

असल में जलवायु परिवर्तन और धरती का तापमान बढ़ने से पूरे हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर पिघल रहे हैं और इसकी वजह से नए-नए झील बन रहे हैं। यह परिघटना सबसे पहले 1960 में देखी गई थी। लेकिन तब इस इलाके में निर्माण की गतिविधियां नहीं चल रही थीं और पेड़ भी नहीं काटे जा रहे थे इसलिए ग्लेशियर का पिघलना मौसमी परिघटना थी। लेकिन 1990 के बाद से इसमें तेजी आ गई और सिर्फ गर्मियों में नहीं, बल्कि ग्लेशियर सालों भर पिघलने लगे।

तभी यह कहने में हिचक नहीं है कि चमोली की दुर्घटना एक मनुष्य निर्मित आपदा है। इसे प्राकृतिक आपदा कहना ठीक नहीं होगा। प्राकृतिक आपदा तो इस क्षेत्र में पहले भी आती थी। अलकनंदा में 1970 में आई बाढ़ या भागीरथी की 1978 की बाढ़ की यादें इस क्षेत्र के लोगों के जेहन में आज भी ताजा है। 1991 का उत्तरकाशी का भूकंप और 1999 का चमोली का भूकंप भी लोगों को याद है। फर्क यह है कि वह प्राकृतिक आपदा थी और केदारनाथ या चमोली की घटना मानवजनिक आपदा है। इसे इंसान ने पैदा किया है और बढ़ाया है। अगर अब भी इसे प्राकृतिक आपदा बताते रहे तो आगे भी ऐसी घटनाएं नहीं रूकेंगी। इसे मनुष्य निर्मित आपदा मानना चाहिए और उन तमाम इंसानी गतिविधियों को तत्काल रोकना चाहिए, जो पहाड़ों में चल रही हैं। जरूरी नहीं है कि हर जगह उद्योग लगा कर या कंक्रीट का निर्माण करके ही विकास होगा। विकास के वैकल्पिक तरीके निकालने होंगे, जो प्रकृति के अनुरूप हों, उसके विपरीत नहीं।


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