दुष्चक्र में फंस गया वैक्सीनेशन! - Naya India
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दुष्चक्र में फंस गया वैक्सीनेशन!

भारत का वैक्सीनेशन अभियान खराब फैसलों और कुप्रबंधन के ऐसे दुष्चक्र में फंस गया है, जिसमें से इसका निकलना कम से कम अभी मुश्किल दिख रहा है। इस दुष्चक्र से निकलने में जितना अधिक समय लगेगा, वायरस का संकट उतना गहराता जाएगा और कोरोना के भंवर जाल से निकलना भारत के लिए उतना ही मुश्किल होता जाएगा। फिर भारत उसी तरह दुनिया के लिए संकट बनेगा, जिस तरह ऑक्सीजन की कमी के समय बना था। अप्रैल के महीने में भारत में ऑक्सीजन का ऐसा संकट बना कि सारी दुनिया चिंतित हो गई थी। दुनिया के देशों ने भारत के संकट का वैश्विक खतरा बूझा और भारत को मदद भेजनी शुरू की। ऑक्सीजन सिलेंडर, कंसट्रेटर, वेंटिलेटर, क्रायोजेनिक टैंकर आदि बड़ी मात्रा में दुनिया के देशों से भारत पहुंचे और भारत में स्थिति काबू में आई।

मुश्किल यह है कि दुनिया के देश इस तरह की मदद वैक्सीन के मामले में नहीं कर सकते हैं क्योंकि वैक्सीन की कमी उनके यहां भी है। किसी भी मुल्क के पास इतनी मात्रा में वैक्सीन नहीं उपलब्ध है कि वह भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश की मदद कर सके। अमेरिका एक-दो करोड़ डोज उपलब्ध करा दे तो वह उसकी कृपा होगी। इसी तरह थोड़े समय के बाद दुनिया के दूसरे विकसित देश भी कुछ वैक्सीन डोज दे सकते हैं लेकिन भारत की जरूरत तात्कालिक है। दुनिया के देश वैक्सीन के मामले में भारत की ज्यादा मदद करने की स्थिति में इसलिए भी नहीं हैं क्योंकि वैक्सीन बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नीतियां और शर्तें ऐसी हैं, जिन्हें स्वीकार करना भारत के लिए मुश्किल है। तभी भारत का वैक्सीन संकट ज्यादा चिंता वाला है।

सबसे पहले तो यह समझने की जरूरत है कि भारत में वैक्सीनेशन की रफ्तार घटने का पहला और बड़ा असर क्या होगा? भारत में वैक्सीनेशन की रफ्तार घटने और कम लोगों को वैक्सीन लगाए जाने का सबसे पहला और बड़ा असर यह होगा कि भारत में कोरोना को फलने-फूलने का मौका मिलेगा। दुनिया के वैज्ञानिकों ने इसे लेकर चिंता जताई है। अमेरिका की कोविड रिस्पांस टास्क फोर्स की सदस्य और कोविड वैक्सीन कम्युनिकेशन वर्क ग्रुप की प्रमुख डॉक्टर सायरा मडाड ने भारतीय मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा है- भारत में वैक्सीन लगने में जितनी देरी हो रही है और वैक्सीनेशन की रफ्तार जितनी धीमी है वह वायरस को म्यूटेट होने का उतना ज्यादा मौका दे रहा है और यह दुनिया के लिए खतरा हो सकता है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि यह दुखद है कि भारत से जिस तैयारी की उम्मीद थी, उस मुताबिक उसने तैयारी नहीं की।

दुनिया भर में वायरोलॉजी और इम्यूनोलॉजी के जानकार इस बात पर एक राय हैं कि जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी वैक्सीन लग जानी चाहिए। इसमें अगर समय लगा या वायरस को म्यूटेट होने का ज्यादा समय मिला तो वैक्सीनेशन का पूरा मकसद ही विफल हो जाएगा। अगर वायरस ने नया स्वरूप ग्रहण कर लिया, उसमें नए फीचर डेवलप हो गए तो पुरानी वैक्सीन उस पर कारगर नहीं रह पाएगी। तभी अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन या चीन और रूस जैसे देश युद्धस्तर पर वैक्सीन लगवा रहे हैं और जल्दी से जल्दी अधिकतर आबादी को वैक्सीन लगवाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके उलट भारत में खतरा बढ़ने के साथ ही वैक्सीनेशन की रफ्तार धीमी पड़ गई। वैक्सीन लगने की रफ्तार इसलिए धीमी पड़ी है क्योंकि भारत में वैक्सीन उपलब्ध नहीं है और अगले कुछ दिनों तक आसानी से वैक्सीन उपलब्ध होने की उम्मीद भी नहीं दिख रही है।

वैक्सीन की कमी दूर करने के लिए ग्लोबल टेंडर इन दिनों फैशन में है। पर असलियत यह है कि दुनिया की कोई भी कंपनी भारत को वैक्सीन देने नहीं आ रही है और न भारत के राज्यों की आर्थिक हैसियत ऐसी है कि वे दुनिया की महंगी वैक्सीन अफोर्ड कर सकें। दुनिया के अमीर देशों में लगाई जा रही वैक्सीन भारत नहीं आ रही है। अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना ने पंजाब सरकार से दो टूक अंदाज में कहा है कि वह राज्यों के साथ वैक्सीन का सौदा नहीं करेगी। वह सीधे केंद्र सरकार से बात करेगी। अब सवाल है कि केंद्र सरकार क्यों उसके साथ सौदा करेगी, जब उसने देश की बहुसंख्यक आबादी को वैक्सीन लगवाने की जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ दी है! अगर उसे खुद सौदा करके सबके लिए वैक्सीन खरीदनी होती तो वह वैक्सीनेशन नीति में बदलाव ही क्यों करती?

दूसरी मुश्किल यह है कि मॉडर्ना और फाइजर इन दोनों कंपनियों की शर्त है कि वे तभी वैक्सीन की आपूर्ति करेंगे, जब यह करार किया जाए का वैक्सीन के किसी साइड इफेक्ट के लिए उनको जिम्मेदार नहीं माना जाएगा। वे भारत सरकार से इन्डेमनिटी बांड यानी किसी किस्म की हानि से अपनी सुरक्षा का करार करना चाहते हैं। भारत सरकार इसके लिए शायद ही तैयार होगी। इन वैक्सीन के साथ खास कर फाइजर के साथ यह मुश्किल भी है कि उसके लिए स्टोरेज की व्यवस्था भारत में नहीं है। इनको माइनस से नीचे के तापमान पर रखना होगा। इसी बात का हवाला देते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि उनकी सरकार ग्लोबल टेंडर नहीं निकालने जा रही है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पहले ही यह बात कह चुके हैं। पंजाब के अनुभव से यह भी पता चल गया है कि राज्यों को ये वैक्सीन वैसे भी नहीं मिलने वाली है। सो, ले-देकर राज्यों को अपने देश में वैक्सीन बना रही कंपनियों पर ही निर्भर रहना होगा। सीरम इंस्टीच्यूट या भारत बायोटेक की वैक्सीन का ही भरोसा है। तीन-चार महीने में कुछ और कंपनियों की वैक्सीन भारत में बनने लगी। रूसी वैक्सीन स्पुतनिक-वी का उत्पादन भी भारत में होने लगेगा और जायडस कैडिला की वैक्सीन भी आ जाएगी। लेकिन तब तक क्या होगा?

भारत में इस समय 15-16 लाख वैक्सीन रोज लग रही है। अगर भारत सरकार चाहती है, जैसा कि 21 मई को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से कहा गया कि साल के अंत तक देश की पूरी व्यस्क आबादी को वैक्सीन लगा दी जाएगी तो उसके लिए हर दिन 70 लाख डोज लगानी होगी। अगर हर दिन 70 लाख डोज लगाई जाती है तब जाकर साल के अंत तक पूरी व्यस्क आबादी का फुल वैक्सीनेशन हो पाएगा यानी दोनों डोज लग पाएगी। मौजूदा स्थिति में तो यह असंभव लग रहा है। इसलिए भारत को किसी ऐसे असंभव लक्ष्य के बारे में सोचने से पहले 25 फीसदी आबादी के पूर्ण वैक्सीनेशन का लक्ष्य बनाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि चार महीने में देश की सिर्फ तीन फीसदी आबादी का पूर्ण वैक्सीनेशन हुआ है। इसी रफ्तार से चलने पर 25 फीसदी आबादी के पूर्ण वैक्सीनेशन में एक साल लगेंगे। सो, स्पीड दोगुनी करके साल के अंत तक 25 फीसदी व्यस्क आबादी को वैक्सीन लगाने का बंदोबस्त करना चाहिए।

अब सवाल है कि भारत इस संकट की स्थिति में कैसे फंसा? तो इसका जवाब है कि गलत और खराब फैसलों और कुप्रबंधन की वजह से। सरकार ने पिछले साल अगस्त में वैक्सीन के ऑर्डर नहीं दिए, वैक्सीन बना रही कंपनियों को एडवांस या अनुदान नहीं दिया, वैक्सीन की मंजूरी होने के बाद भी बड़े ऑर्डर नहीं दिए गए, वैक्सीन बन कर आने लगी तो अपने लोगों को लगाने की बजाय उसे वैक्सीन डिप्लोमेसी के तहत दुनिया को बांटा जाने लगा या निर्यात किया जाने लगा और अंत में जब वैक्सीन खत्म हो गई तो अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर केंद्र ने वैक्सीन की जिम्मेदारी राज्यों के सिर पर डाल दी। ये सारे खराब और गलत फैसले थे। इनकी वजह से भारत ऐसे दुष्चक्र में फंसा है, जिससे दुनिया के देश भी आसानी से बाहर नहीं निकाल पाएंगे। इस दुष्चक्र से निकलने के लिए सिर्फ यह प्रार्थना की जा सकती है कि वायरस म्यूटेट होकर ज्यादा घातक न होता जाए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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