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राज्य कहां से लाएंगे पैसा?

पिछले साल अक्टूबर के आसपास केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि राज्य वैक्सीन की खरीद नहीं करेंगे। यानी वैक्सीन की खरीद केंद्रीकृत होगी यह पिछले साल से तय था। वैक्सीन की केंद्रीकृत खरीद का फैसला पहले से हुआ था और देश के आम बजट में वैक्सीन खरीद के लिए 35 हजार करोड़ की भारी-भरकम रकम की मंजूरी हो गई थी तो राज्य क्यों अपने बजट में वैक्सीन के लिए प्रावधान करते!

राज्यों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि अचानक केंद्र सरकार एक दिन वैक्सीनेशन की नीति बदल देगी और कहेगी कि 18 से 44  साल तक की उम्र के लोगों को राज्य अपने पैसे से वैक्सीन लगवाएं। केंद्र सरकार ने राज्यों के वित्तीय प्रबंधन को संकट में डालने वाला इतना ही काम नहीं किया, बल्कि वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को अपनी मर्जी से कीमत तय करनी की छूट भी दे दी। अब राज्यों को कंपनियों की तय कीमत पर वैक्सीन खरीदनी है और अपनी सबसे बड़ी आबादी को अपने खर्च से वैक्सीन लगवानी है।

केंद्र सरकार ने वैक्सीनेशन नीति में बदलाव करके न सिर्फ करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में डाला है, बल्कि राज्यों के वित्तीय प्रबंधन को भी संकट में डाल दिया है। राज्यों के सामने अचानक हजारों करोड़ रुपए का अतिरिक्त बंदोबस्त करने की चुनौती आ गई है। ध्यान रहे इक्का-दुक्का राज्यों को छोड़ कर किसी राज्य ने इस साल के बजट में वैक्सीन खरीदने के लिए पैसे का प्रावधान नहीं किया। इसका कारण यह है कि केंद्र सरकार ने देश के आम बजट में वैक्सीन के लिए 35 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया, जिसे संसद ने मंजूरी दी है। उससे भी पहले केंद्र सरकार की ओर से यह कहा गया था कि स्वास्थ्यकर्मियों के लिए पीएम-केयर्स फंड से टीका खरीदा जा रहा है। इससे राज्यों में यह धारणा बनी कि केंद्र सरकार देश के सभी नागरिकों के लिए टीका खरीदेगी।

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राज्यों में यह धारणा बनने का एक कारण यह भी था कि पिछले ही साल अक्टूबर के आसपास केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि राज्य वैक्सीन की खरीद नहीं करेंगे। यानी वैक्सीन की खरीद केंद्रीकृत होगी यह पिछले साल से तय था। वैक्सीन की केंद्रीकृत खरीद का फैसला पहले से हुआ था और देश के आम बजट में वैक्सीन खरीद के लिए 35 हजार करोड़ की भारी-भरकम रकम की मंजूरी हो गई थी तो राज्य क्यों अपने बजट में वैक्सीन के लिए प्रावधान करते! उन्होंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि अचानक केंद्र सरकार एक दिन वैक्सीनेशन की नीति बदल देगी और कहेगी कि 18 से 44  साल तक की उम्र के लोगों को राज्य अपने पैसे से वैक्सीन लगवाएं। केंद्र सरकार ने राज्यों के वित्तीय प्रबंधन को संकट में डालने वाला इतना ही काम नहीं किया, बल्कि वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को अपनी मर्जी से कीमत तय करनी की छूट भी दे दी। अब राज्यों को कंपनियों की तय कीमत पर वैक्सीन खरीदनी है और अपनी सबसे बड़ी आबादी को अपने खर्च से वैक्सीन लगवानी है।

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केंद्र के मुकाबले राज्यों पर वित्तीय बोझ इसलिए भी ज्यादा पड़ गया क्योंकि बड़ी आबादी को उन्हें वैक्सीन लगवानी है। देश में 18 से 44 साल तक की उम्र के लोगों की संख्या करीब 60 करोड़ है, जबकि 45 से ऊपर की कुल आबादी 45 करोड़ के करीब है। दूसरे, अभी यह तय नहीं है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों को टीका कौन लगवाएगा। केंद्र सरकार ने जिस तरह से युवाओं के टीकाकरण से पल्ला झाड़ा है उससे लग रहा 18 साल से कम उम्र के लोगों को टीका लगाने की जिम्मेदारी भी राज्यों की होगी। यह आबादी एक चौथाई यानी करीब 35 करोड़ है। इस तरह राज्यों के ऊपर 95 करोड़ लोगों को टीका लगवाने की जिम्मेदारी आ जाएगी। वह भी केंद्र के मुकाबले कई गुना ज्यादा कीमत चुका कर। आखिर केंद्र सरकार को जो वैक्सीन डेढ़ सौ रुपए में मिल रही है वह राज्यों को तीन सौ और चार सौ रुपए की कीमत पर मिल रही है।

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अभी अगर सिर्फ 18 से 44 साल के लोगों के टीकाकरण का खर्च जोड़ें तो उतने से ही राज्यों की वित्तीय स्थिति डगमगाती दिखती है। सभी राज्यों को कुल मिला कर 60 करोड़ आबादी के लिए 120 करोड़ डोज खरीदने की जरूरत है। कोवीशील्ड वैक्सीन उन्हें तीन सौ रुपए प्रति डोज के हिसाब से मिल रही है और कोवैक्सीन की एक डोज की कीमत चार सौ रुपए है। इसके अलावा राज्यों को पांच फीसदी जीएसटी केंद्र सरकार को देनी है और वैक्सीनेशन के बंदोबस्त पर जो खर्च होगा वह अलग है। इस तरह एक व्यक्ति पर होने वाला खर्च आठ सौ से एक हजार रुपए के करीब बैठेगा। इसके लिए राज्यों का कुल खर्च 96 हजार करोड़ रुपए से लेकर एक लाख 20 हजार करोड़ रुपए तक होगा। अब सोचें, राज्य इतनी बड़ी अतिरिक्त रकम का इंतजाम कहां से करेंगे? उनकी हालत पहले से खराब है। पिछले साल के लॉकडाउन और आर्थिकी बंद होने की वजह से अप्रत्यक्ष करों की वसूली बहुत कम हुई। इस साल उस तरह का लॉकडाउन नहीं लगा है और आर्थिकी में उतनी गिरावट नहीं है फिर भी स्थानीय स्तर पर लगाए गए लॉकडाउन की वजह से करों की वसूली आने वाले दिनों में घटेगी। सो, सरकारों का राजस्व पहले से घटा हुआ है ऊपर से इतनी बड़ी रकम का अतिरिक्त बंदोबस्त करने की मजबूरी आ गई।

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ऐसी स्थिति में राज्यों के सामने दो ही रास्ते हैं। एक रास्ता तो यह है कि वे अपने स्वास्थ्य बजट में ही वैक्सीनेशन का खर्च एडजस्ट करें। अगर राज्य सरकारें ऐसा करती हैं तो स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाओं के विकास का काम रूकेगा, जिसकी इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है। इसके अलावा डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के वेतन, भत्ते, पेंशन आदि की व्यवस्था भी प्रभावित होगी। मिसाल के तौर पर दिल्ली सरकार ने अपने 69 हजार करोड़ रुपए के बजट में से 9,934 करोड़ रुपए स्वास्थ्य के लिए आवंटित किए हैं। लेकिन उसने सिर्फ 50 करोड़ रुपए वैक्सीनेशन के लिए रखे थे। अब दिल्ली सरकार को मोटे तौर पर आठ सौ से एक हजार करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। इससे उसका स्वास्थ्य बजट बुरी तरह से प्रभावित होगा। यह स्थिति देश के हर राज्य की होनी है। उन्हें अपने बजटीय आवंटन के मुताबिक खर्च के लिए भी पैसे का इंतजाम करना है, जो कि बहुत मुश्किल होता जा रहा है।

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राज्यों की आर्थिक हालत पहले से बहुत खराब है। कोरोना वायरस के एक साल ने उनकी कमर तोड़ दी है। इस साल 31 मार्च को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में राज्यों का घाटा पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ गया। भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2020 से पहले राज्यों के सकल उत्पाद यानी जीडीपी के मुकाबले उनका औसत घाटा 2.4 फीसदी रहता था, लेकिन 31 मार्च को खत्म हुए वित्त वर्ष में जीडीपी के मुकाबले यह घाटा बढ़ कर औसतन 4.6 फीसदी यानी लगभग दोगुना हो गया। उत्तर प्रदेश का घाटा 4.17 फीसदी है तो देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक बिहार का घाटा बढ़ कर सात फीसदी पहुंच गया। सोचें, ऐसी आर्थिक स्थिति के बीच राज्यों के ऊपर वैक्सीन का अतिरिक्त बोझ मुसीबत की तरह है। वह भी ऐसे समय में जब आर्थिकी में सुधार की उम्मीदें एक बार फिर धूमिल पड़ने लगी हैं।

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अब राज्यों को या तो अपने पूंजीगत खर्च में बड़ी कटौती करनी होगी या कर्ज लेना होगा या अपनी संपत्तियों को बेच कर या लीज पर रख कर पैसे का इंतजाम करना होगा। केंद्र सरकार ने भी राज्यों से कहा है कि वे इस्तेमाल नहीं होने वाली अपनी संपत्ति बेचें, जमीन लीज पर दें और कर्ज उठाएं। जाहिर है केंद्र सरकार को राज्यों की स्थिति का पता है। केंद्र को पता है कि राज्यों की वित्तीय हालत बहुत खराब है। तभी उसने राज्यों को कर्ज लेने या संपत्ति बेचने का सुझाव दिया है फिर भी वैक्सीन के अतिरिक्त खर्च का बोझ राज्यों के ऊपर डाल दिया! कई राज्यों ने अभी से अपने ऋण की रिस्ट्रक्चरिंग के प्रयास शुरू कर दिए हैं और पूंजी जुटाने के दूसरे स्रोतों को तलाशना शुरू कर दिया है। तमिलनाडु के वित्त मंत्री पलानिवेल त्यागराजन ने कहा है कि सरकार को खर्च में कुछ कटौती करनी होगी, पूंजी जुटाने के नए स्रोत पर ध्यान देना होगा, कर्ज की रिस्ट्रक्चरिंग करानी होगी और संपत्ति बेच कर पैसे जुटाने होंगे। दक्षिण के दूसरे राज्य तेलंगाना ने संपत्ति बेच कर साढ़े 14 हजार करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा है।

पर इसमें भी मुश्किल यह है कि आज न तो राज्यों की संपत्ति का कोई खरीदार है और न लीज पर लेने वाला कोई है। जब भारत सरकार खुद ही अपनी कंपनियों को नहीं बेच पा रही है और विनिवेश के लक्ष्य का एक चौथाई भी नहीं पूरा कर पा रही है तो राज्य सरकारें कहां से विनिवेश के जरिए पैसा जुटा पाएंगी! सो, यह तय मानें कि आने वाले दिनों में राज्यों की वित्तीय हालत बहुत खराब होने वाली है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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