nayaindia वैक्सीन लगवाएं, घर में रहें! - Naya India
बेबाक विचार | नब्ज पर हाथ| नया इंडिया|

वैक्सीन लगवाएं, घर में रहें!

वैक्सीन लगने के बावजूद लोगों को संक्रमण हो रहा है। इसका मतलब है कि अब तक वैज्ञानिक समुदाय भी अंधेरे में है और इसलिए वायरस का खतरा पूरी भयावहता के साथ मानवता के सामने मौजूद है। सो, आंकड़े कम होने के मुगालते में तो कतई नहीं रहना चाहिए। ऊपर से भारत में तो इतने लोगों को वैक्सीन भी नहीं लगी है कि हर्ड इम्यूनिटी विकसित होने का भ्रम पाला जाए।

यह भी पढ़ें: संघीय ढांचे के लिए चुनौती

यह नया इंडिया की अपील है। पर सिर्फ अपील नहीं  बल्कि भारत में वायरस की हकीकत का बयान है। लोगों को राज्य सरकारों की ओर से दिए जा रहे आंकड़ों या अखबारों में छप रही सकारात्मक खबरों या आंकड़े कम होने के टेलीविजन पर दिखाए जा रहे ग्राफिक्स के झांसे में नहीं आना चाहिए। ये आंकड़े अधूरी तस्वीर दिखाते हैं। वैसे भी झूठ और सफेद झूठ से आगे झूठ का तीसरा प्रकार आंकड़ों को ही बताया गया है। इसलिए आंकड़ों में उलझने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह बाजीगरी है। पहले भी इस बाजीगरी के झांसे में आकर देश के लोगों ने अपना बड़ा नुकसान किया है। अगर पहली लहर के बाद लोग झांसे में नहीं आए होते दूसरी लहर शायद इतनी भयावह नहीं होती। इतने लोग नहीं मरते और न मानवता इतनी शर्मसार होती। इसलिए लोगों को सकारात्मक आंकड़ों के बावजूद अपने को बचाने के जतन करने चाहिए और इस समय बचाने के जतन के नाम पर आप दो ही काम कर सकते हैं- टीका लगवाएं और अगर संभव हो तो घर में रहें।

यह भी पढ़ें: झूठे आंकड़ों से बढ़ेगा संकट

इस समय हर व्यक्ति को प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन लगवाने का प्रयास करना चाहिए। उन्हें वैक्सीन को लेकर हो रहे दुष्प्रचार पर भरोसा नहीं करना चाहिए। यह विज्ञान है और ध्यान रहे सच्चे विज्ञान के दम पर ही लोगों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है। इसलिए जो लोग कह रहे हैं कि वैक्सीनेशन के कारण कोरोना फैल रहा है या वैक्सीनेशन की वजह से ही दूसरी लहर आई या वैक्सीन लगवाने वालों को भी अगर कोरोना हो ही रहा है तो उसे लगवाने की क्या जरूरत है तो ऐसे लोगों को मूर्खों के अपने बनाए स्वर्ग में रहने दें और जैसे भी हो वैक्सीन लगवाने का प्रयास करें क्योंकि उसी से सुरक्षा है।

यह भी पढ़ें: कांग्रेस अध्यक्ष के अलावा सारे चुनाव होंगे!

यह सही है कि कई देशों में वैक्सीनेशन शुरू होने के बाद कोरोना की लहर ज्यादा तेज हुई। भारत से लेकर ताइवान और वियतनाम जैसे देशों का इसमें जिक्र किया जा सकता है। लेकिन वैक्सीनेशन के साथ कोरोना फैलने का कारण वैक्सीन नहीं है, बल्कि इसका कारण टीका लगवाने के दौरान हुई भीड़, लापरवाही और टीकाकरण की धीमी रफ्तार है।

वैक्सीन लगवाने के अलावा बचाव का दूसरा तरीका आइसोलेशन है। जो लोग आइसोलेशन में रह सकते हैं यानी घर में बंद रह सकते हैं वे घर से नहीं निकलें। जिनके लिए रोजी-रोटी का संकट है और बाहर निकलने की मजबूरी है उन्हें तो घरों में बंद नहीं किया जा सकता है लेकिन जो लोग घर में बंद रह कर अपने जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकते हैं उन्हें जान जोखिम में डालने से बचना चाहिए। सरकार को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि अनलॉक शुरू होने के बावजूद लोगों को वर्क फ्रॉम होम की इजाजत मिले। सरकारी विभागों और निजी कंपनियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे अपने कर्मचारियों को कार्यालय में बुलाने की बजाय उन्हें घर से ही काम करने दें ताकि कम से कम लोग घर से निकलें। जितने ज्यादा लोग वैक्सीन लगवाएंगे और जितने कम लोग बाहर निकलेंगे वायरस से उतनी ज्यादा सुरक्षा हासिल होगी।

यह भी पढ़ें: सरकार का पूरा फोकस, ध्यान भटकाओं!

वैक्सीन लगवाने में भी सरकारों को प्राथमिकता वाले समूहों की पहचान करनी चाहिए। अभी भारत में वैक्सीनेशन की नीति उम्र पर आधारित है। सरकार ने 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को वैक्सीन लगवाने की मंजूरी दी है। इस नीति में एक बुनियादी कमी है। भारत के पास अपनी एक सौ करोड़ से ज्यादा की व्यस्क आबादी को लगाने के लिए न तो पर्याप्त वैक्सीन है और न इतनी बड़ी आबादी के वैक्सीनेशन के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा है। इसलिए सरकार को प्राथमिकता के साथ उन लोगों को वैक्सीन लगानी चाहिए, जिनको अनिवार्य रूप से घर से बाहर निकलना है। जिस तरह से पहले डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को टीका लगाया गया उसी तरह अब दुकानदारों, रिक्शा-ठेला चलाने वालों, फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों-कर्मचारियों, घरों में काम करने वाले महिला-पुरुषों, ड्राइवरों, पत्रकारों सहित उन सभी लोगों को प्राथमिकता के आधार पर टीका लगाया जाए, जिनको घर से बाहर निकलना है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस आधार पर एक पहल की है, जिसे सभी राज्यों को आजमाना चाहिए।

यह भी पढ़ें: महान असफलताओं के दो साल!

ये दो काम इसलिए जरूरी है क्योंकि वायरस के कम होते केसेज की बीच यह मानना आत्मघाती होगा कि वायरस खत्म हो गया या दूसरी लहर चली गई या तीसरी लहर नहीं आएगी। महाराष्ट्र में 15 दिन के लिए लॉकडाउन बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने ठीक बात कही कि भले वायरस की दूसरी लहर में केसेज कम हो गए हैं पर नए केसेज की संख्या अब भी पहली लहर के पीक के लगभग बराबर है। यह बात सिर्फ महाराष्ट्र के बारे में ही सही नहीं है, बल्कि पूरे देश के बारे में सही है। पूरे देश में सोमवार को 50 दिन के बाद सबसे कम केस आए तब भी उनकी संख्या एक लाख 26 हजार 649 थी और मरने वालों की संख्या 2,781 थी। याद करें पिछले साल 17 सितंबर को जब पहली लहर का पीक आया था तब देश में कुल 97 हजार नए केस मिले थे और उस समय औसतन एक हजार से 11 सौ लोगों की मौत हो रही थी। इसका मतलब है कि देश में वायरस का संक्रमण अब भी पहली लहर से ज्यादा फैला हुआ है।

यह भी पढ़ें: आंसुओं को संभालिए साहेब!

पहली लहर के मुकाबले इस बार ज्यादा खतरे और चिंता की बात इसलिए है क्योंकि इस बार मौतें बहुत ज्यादा हुई हैं और मृत्यु दर एक फीसदी से बढ़ कर 1.2 फीसदी हो गई है। दूसरी चिंता यह है कि इस बार वायरस पूरे देश में पहुंचा और फैला हुआ है, जबकि पिछली बार बहुत से दूर-दराज के ग्रामीण इलाके इससे बचे रह गए थे। तीसरी चिंता यह है कि वायरस को जितना ज्यादा समय मिला है यह उस समय में म्यूटेट होकर नए रूप धारण करता रहा है। अब भी दुनिया में वायरस के नए वैरिएंट मिल रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इससे पहले के तमाम इस किस्म के दूसरे वायरस म्यूटेट होकर नया रूप धारण करने के बाद कमजोर होते रहे हैं और धीरे धीरे खत्म हो गए हैं। लेकिन कोरोना वायरस के साथ ऐसा नहीं हो रहा है। यह म्यूटेट होकर नया रूप धारण कर रहा है तो ज्यादा संक्रामक भी हो जा रहा है और ज्यादा घातक भी। जैसे ब्रिटेन में पहली बार मिला वैरिएंट बी.1.1.7 पहले के वैरिएंट सार्स-सीओवी-2 के मुकाबले 70 फीसदी ज्यादा तेजी से फैलने वाला है। भारत में पहली बार मिला वैरिएंट बी.1.617 और बी.1.617.2 भी तेजी से फैलने वाला वैरिएंट है। इस बीच खबर है कि वियतनाम में एक नया वैरिएंट मिला है, जो हाईब्रीड है। इसमें ब्रिटेन में पहली बार मिले वैरिएंट वाले गुण हैं तो भारत में पहली बार मिले वैरिएंट के गुण भी हैं। इस तरह यह ज्यादा घातक हो गया है। इनके अलावा दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया या ब्राजील में पहली बार मिले वैरिएंट अपनी जगह अलग म्यूटेट हो रहे हैं।

यह भी पढ़ें: कमान हाथ में लेने की नाकाम कोशिश!

यह वायरस इतना संक्रामक या घातक क्यों है या म्यूटेट होने के बाद खत्म क्यों नहीं हो रहा है इस पर दुनिया के वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं और एक अनुमान यह है कि ये वायरस प्राकृतिक नहीं है यानी अपने आप चमगादड़ या किसी दूसरे जीव में विकसित नहीं हुआ है, बल्कि इसे लैब में तैयार किया गया है। अमेरिका, ब्रिटेन और नार्वे के वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि चूंकि इसमें जेनेटिकली कुछ बदलाव करके लैब में तैयार किया गया हो सकता है इसलिए यह खत्म नहीं हो रहा है या म्यूटेट होकर ज्यादा खतरनाक हो जा रहा है। वैज्ञानिकों का यह भी अंदाजा है कि लैब में बने होने की वजह से ही वैक्सीन तैयार करने वाले वैज्ञानिक इसकी वास्तविक प्रकृति नहीं पकड़ पा रहे हैं और इसलिए वैक्सीन लगने के बावजूद लोगों को संक्रमण हो रहा है। इसका मतलब है कि अब तक वैज्ञानिक समुदाय भी अंधेरे में है और इसलिए वायरस का खतरा पूरी भयावहता के साथ मानवता के सामने मौजूद है। सो, आंकड़े कम होने के मुगालते में तो कतई नहीं रहना चाहिए। ऊपर से भारत में तो इतने लोगों को वैक्सीन भी नहीं लगी है कि हर्ड इम्यूनिटी विकसित होने का भ्रम पाला जाए।

बहरहाल, वायरस का खतरा बताने का मकसद लोगों को डराना नहीं है, बल्कि वास्तविक तस्वीर पेश करके आगाह करना है। इस तस्वीर को देखिए और जितनी जल्दी हो वैक्सीन लगवाइए और जहां तक संभव हो घर में बंद रहिए। इसमें आपको आर्थिक नुकसान होगा, करोड़ों लोगों का हुआ है, यह तथ्य है कि देश के 97 फीसदी परिवारों की आमदनी कम हुई है पर याद रखिए- जान है तो जहान है!

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

Leave a comment

Your email address will not be published.

nineteen + five =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
लोजपा जैसा शिव सेना का घटनाक्रम
लोजपा जैसा शिव सेना का घटनाक्रम