लंदन में बातें और मुलाकातें

मेरा लंदन आना कई बार हुआ लेकिन इस बार लंदन को जैसे देख रहा हूं, पहले कभी नहीं देखा। पहले जब भी लंदन आना हुआ, सारा दिन अपने भारतीय उच्चायोग (या दूतावास) में बैठे-बैठे बीत जाता था। दिन भर लोग मिलने आते थे और रात को होटल या घर में जाकर सो जाते थे लेकिन इस बार कई पुराने मित्रों से मिलने का अवसर मिला और नए मित्रों से भी। ब्रिटिश संसद-भवन में हुए विश्व-प्रवासी सम्मेलन में जो दक्षिण एशियाई लोक संघ बनाने की बात मैंने कही थी, उसने थोड़ा जोर पकड़ा है।

कल लंदन स्थित सूफी संप्रदाय के लोगों ने मिलने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने अपने आश्रम (खानकाह) में बड़ा समारोह रखा। वहां भारत और पाकिस्तान के अनेक लोग आए। इस ‘मसीह फाउंडेशन इंटरनेशनल’ के मुखिया हैं यूनुस अल-गौहर। उन्होंने अपने एक शिष्य को मुझे लेने भेजा, ‘फोस्साइट लि.’ के दफ्तर, जहां मैं उसके चेयरमेन रवि मेहरोत्रा के साथ लंच कर रहा था। टेम्स नदी के किनारे से आश्रम तक पहुंचने में लगभग डेढ़-दो घंटे लग गए।
इस बीच मुझे लंदन की भव्यता और स्वच्छता का आभास हुआ। मैं सोचता रहा कि लंदन में जैसे भव्य मकान बने हुए हैं, वैसे हमारे यहां क्यों नहीं बने हुए हैं ? खास लंदन शहर से बाहर निकलते ही एक ही लकीर में बने हुए एक-जैसे सुंदर मकान देखते ही बनते हैं। क्रायडन नामक इलाके में पहुंचते ही दुकानों के हिंदी और उर्दू नाम अंग्रेजी में लिखे दिखाई पड़ते हैं। जहां भारतीयों और पाकिस्तानियों की बसाहट ज्यादा है। हर मकान और दुकान के आगे रंग-बिरंगे फूलवाले पौधे लगे रहते हैं। इनमें से ज्यादातर पौधे नकली होते हैं लेकिन वे देखने में असली लगते हैं।
मसीह फाउंडेशन के विशेषज्ञों ने लगभग दो घंटे की मेरी बातचीत की रेकार्डिंग की, जिसमें मैंने मजहबों और संप्रदायों के पाखंडों पर प्रकाश डाला, भारत-पाक संबंधों और कश्मीर संबंधी सवालों के दो-टूक जवाब दिए और सभी श्रोताओं से कहा कि ‘दक्षिण एशियाई लोक संघ’ खड़ा करने में मदद करें। गुजराती संन्यासी स्वामी विश्वानंद और पाकिस्तान के रेहान अल्लाहवाला तथा कुछ नेपाली बंधुओं ने तुरंत ही इस संगठन के लिए काम भी शुरु कर दिया।
उन्होंने एक वेबसाइट भी बना दी और मेरी एक टिप्पणी भी उस पर चला दी। कल लंदन में हमारी उच्चायुक्त (राजदूत) रुचि घनश्याम का भी फोन आया। आज सुबह से मेरे कई अंग्रेज सहपाठी मित्र भी मिलने आए। दिल्ली-जैसी व्यस्तता लंदन में भी हो गई है।

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