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हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार| नया इंडिया| Veer Savarkar Row Rahul gandhi राहुल की अपने पांवों फिर कुल्हाड़ी!

राहुल की अपने पांवों फिर कुल्हाड़ी!

याद करें, एक-एक बात याद करें कि राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा शुरू करते हुए क्या मकसद बताए थे?  महंगाई, बेरोजगारी, बदहाली और परस्पर नफरत को लेकर जनता के बीच जाना। दिलों को जोड़ना! इस सबमें मुख्य टारगेट कौन था?  नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार। मोटी मोटी सच्चाई है कि पिछले आठ वर्षों में राहुल गांधी और विपक्ष नरेंद्र मोदी की गलतियों पर उनके कारण देश के रसातल में जाने की बात कहता हुआ है। 140 करोड लोगों की समस्याओं, मुद्दों, जिंदगी की दशा-दिशा, मनोदशा में यदि नायक नरेंद्र मोदी है तो खलनायक भी नरेंद्र मोदी! दूसरे किसी का कोई अर्थ नहीं। गांधी परिवार की मुश्किलों, कांग्रेस की बरबादी का कारण भी सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी। ऐसे दसियों वाकिये है, घटनाएं है, राजनीति है जिसमें राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी के शासन को मुद्दा बना कर बिहार में एलायंस बनाया। महाराष्ट्र में एनसीपी-कांग्रेस-शिवसेना का अकल्पनीय गठबंधन हुआ। खुद राहुल गांधी ने अपनी हिंदू पहचान बनाई। अपने को शिवभक्त कहां! मगर मोदी और उनकी प्रोपेगेंड़ा मशीनरी ने राहुल की समझ पर ऐसे-ऐसे नेरेटिव बनाएं कि उनके हिंदू होने की साख बन ही नहीं पाई। राहुल गांधी के बचपने, नादानी का यह नैरेटिव लोगों के जहन में पैठता गया कि उनमें न समझ है और न गंभीरता!

तभी भारत यात्रा का राहुल गांधी का फैसला सौ सुनार की और एक लौहार वाला था। जनता से सरोकार और जनता से जुड़ाव बनाने के खातिर!

पर कांग्रेस और राहुल गांधी का दुर्भाग्य जो यात्रा दक्षिण से उत्तर भारत की और प्रवेश करने के कगार पर थी तभी राहुल गांधी ने हिंदू राजनीति के आईडिया के वीर सावरकर को ध्वंस करने का बीड़ा उठा लिया। जो काम खुद गांधी, पटेल, नेहरू और आजाद भारत के पचहतर सालों में से पचपन सालों के नेहरू-गांधी परिवार के प्रधानमंत्री खत्म नहीं कर पाएं, उसे वे कर रहे है। सावरकर को देश का विलेन, पापी करार देना। मगर सावरकर क्या भारत का सत्य नहीं है? उनका कहा क्या इतिहास का सत्य नहीं है? क्या गांधी और नेहरू ने धर्म आधारित उनकी दो राष्ट्र की थ्योरी में पाकिस्तान को माना था या नहीं? धर्म के आधार पर भारत का विभाजन क्या सावरकर के कहे की पुष्टी थी या नहीं? हिंदू और मुसलमान ने यदि अलग-अलग देश स्वीकारा तो ऐसा होना क्या गांधी-नेहरू के दस्तखतों याकि सहमति से नहीं था?

मगर इतिहास को छोड़े और यह सोचे कि राहुल गांधी की यात्रा का मकसद वैचारिक लड़ाई है या महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्ट्रचार, लोकतंत्र बचाने, नफरत मिटाने के संकल्प में है? सावरकर के प्रदेश महाराष्ट्र में भला सावरकर को अंग्रेजों का पिठ्ठू बताकर, डरपोक बता कर क्या वे शिवसेना, उद्धव ठाकरे को नेहरूवादी बनाने का मिशन लिए हुए है या सन् 2024 में मोदी हटाओं, देश बचाओं की जमीन बनाना?

राहुल के कहे पर उद्धव ठाकरे, शिवसेना भडके है तो उनका भडकना गलत नहीं है। मुझे खबर नहीं है कि भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी के साथ ऐसा कौन है जो उनसे अस्सी-नब्बे साल पुराना कागज पढ़ा कर यह समझा रहा है कि सावरकर को ठोको तो हिंदुओं में नेहरू-गांधी का आईडिया लौटेगा! यात्रा संचालक दिग्विजयसिंह, जयराम रमेश या कन्हैया जैसे चेहरे इतनी समझ तो रखते होंगे कि जब अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया बिल्किस मसले से पल्ला झाड गुजरात में हिंदुओं के वोट बंटोरने की समझदारी दिखा रहे है तो महाराष्ट्र में ऐसी गलती तो नहीं है जो सावरकर को गाली दे कर प्रदेश में, शिवसेना की राजनीति में कांग्रेस को अछूत बनवा डाले। राहुल गांधी और उनका प्रबंधन देख रहे पार्टी के नौकरशाहों को इतना भी अंदाज नहीं कि नागपुर के नितिन गडकरी हो या आरएसएस, ये सब मोदीशाही में दो कौड़ी के है तो सबके पीछ वजह वैचारिक नहीं है बल्कि अंहकारी सर्वज्ञ नरेंद्र मोदी के निरंकुश हिंदू अवतार की है। उनके हिंदुओं पर जादू-टोना कर देने से है।

यह इतिहासिद्ध, लिखित तथ्य है कि सावरकर की हिंदू चिंता आधुनिकता, आधुनिक राष्ट्र-राज्य की धारणा में पोषित थी। गांधी, नेहरू, इंदिरा से लेकर खुद राहुल गांधी ने जिन दिखावों, जैसी तस्वीरे बनवा कर अपने को कई बार हिंदू दिखाया है, रूद्राक्ष मालाएं पहनी, मंदिर शिलान्यास करवाएं वैसा कोई प्रपंच, कर्मकांड करते हुए सावरकर की जिंदगी एक तस्वीर नहीं मिलेगी, एक उदाहरण नहीं मिलेगा।

बहरहाल, विषय सावरकर नहीं है। बल्कि राहुल गांधी और उनके सलाहकार है? क्या ये मान रहे है कि नरेंद्र मोदी की  वजह सावरकर है? मतलब सावरकर के आईडिया में, उनके बताए फ्रेमवर्क में नरेंद्र मोदी चलते हुए है? और गांधी-नेहरू की जगह क्योंकि हिंदुओं का दिमाग सावरकर की गंगौत्री से अब बह रहा है तो सावरकर को खत्म करो तो हिंदू अपने आप कांग्रेस की तरफ लौटेगा। हिंदू और मुसलमान के दिल जुड जाएंगे!

हे राम! ऐसा कैसा दिमाग, ऐसा कैसे संभव जो इतनी मेहनत के बावजूद अधबीच में मकसद भुला कर राहुल गांधी का यह बचपना दिखाना कि देखों, देखों सावरकर की यह चिट्ठी, वह खुद को अंग्रेजों का नौकर बने रहने की बात कह रहे है… सावरकर ने डर कर माफी मांगी…..!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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