जुबानी खुली तो पोल खुली

यह नहीं कहा जा सकता कि उर्जित पटेल या विरल आचार्य का कोई राजनीतिक एजेंडा है। पटेल को एक समय नरेंद्र मोदी सरकार की पसंद माना जाता था। पटेल भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बने और समय से पहले इस्तीफा दिया। यही कहानी विरल आचार्य की भी है, जो डिप्टी गवर्नर थे। यानी दोनों ने समय से पहले अपने पदों से इस्तीफा दिया। उन्होंने इस्तीफा कुछ ही समय के अंतराल पर दिया था। उनके इस्तीफों की वजह तब उन के दोनों आरबीआई की स्वायत्तता को लेकर सरकार से उठे मतभेदों को बताया गया था। अब दोनों ने लगभग एक साथ किताब लिख कर उन बातों की पुष्टि की है। आचार्य के मुताबिक नरेंद्र मोदी सरकार ने बैंकिंग मामलों में शुरुआत सही रास्ते को अपनाते हुए की थी। लेकिन खर्च पर काबू ना रख पाने और लॉबिंग के दबावों में आकर वह इस रास्ते से हट गई। इसके आरबीआई और उसके बीच टकराव खड़ा हुआ। उर्जित पटेल के नेतृत्व में आरबीआई मजबूत और विवेकपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था के लिए संघर्ष कर रहा था। इसी संघर्ष के क्रम में पटेल ने इस्तीफा दिया।

उर्जित पटेल ने अपनी किताब में संकेत दिया है कि सरकार से उनका टकराव आईबीसी यानी इनसोलवेंसी और बैंक्रप्सी कोड लेकर खड़ा हुआ। पटेल इस कोड के तहत कर्ज ना चुकाने वाले कॉरपोरेट्स पर कड़ी कार्रवाई करना चाहते थे। लेकिन पटेल का आरोप है कि सरकार ने इस कोड के प्रावधानों को नरम बना दिया। इससे बैड लोन या ना चुकाए जा रहे कर्ज की समस्या को को दूर करने 2014 से जारी रिजर्व बैंक की कोशिश नाकाम हो गई। विरल आचार्य ने भी कहा है कि सरकारों ने अत्यधिक मौद्रिक एवं कर्ज प्रोत्साहन दिए, जिसकी वजह से पिछले दशक में भारत के वित्तीय सेक्टर की स्थिरता कमजोर हुई थी। मगर उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने आरबीआई की संचालन व्यवस्था को बदलने की कोशिश की। आचार्य ने कहा है कि इन कोशिश को नाकाम करने के प्रयास में ही पटेल को गवर्नर पद गंवाना पड़ा। आचार्य के मुताबिक सरकार चाहती थी कि रिजर्व बैंक अतिरिक्त पूंजी को डिविडेंड के रूप में सरकार (वित्त मंत्रालय) को दो दे, प्रोम्प्ट कॉरेक्टिव एक्शन नॉर्म्स को हलका कर दे, डिफॉल्टर्स के खिलाफ कार्रवाई की रफ्तार धीमी कर दे और ऐसी आसान नीति अपनाए जिससे सरकार अधिक कर्ज ले सके।

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