आंग सान सू ची और रोहिंग्या - Naya India
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आंग सान सू ची और रोहिंग्या

आमतौर पर किसी के प्रति हमारी राय बहुत आसानी से नहीं बदलती है। खासतौर परतब जब व्यक्ति के बारे में हमने पहले से कोई राय बनाई हुई हो। वह कोई शख्सियत है तो पूछना ही क्या। मगर इस बार काफी अनोखा देखने को मिला है। म्यांमार की नेता आंग सान सू ची को महज 16 साल पहले 1991 में शांति के लिए दुनिया का सबसे बडा ईनाम नोबल पुरुस्कार दिया गया था। उस समय उन्हें दमन के खिलाफ एक सशक्त प्रतीक कहा गया था।

उस समय म्यांमार में अमेरिकी राजूदत बिल रिचर्डसन ने उन्हें मानवता का पर्याय बता दिया था। मगर आज की दुनिया में काफी लोगों के बीच वे नफरत की वजह बन रही है। पहले जान लें कि यह महिला है कौन? हमारे पड़ोसी देश म्यांमार (पहले बर्मा) की राष्ट्रपति स्तर की अधिकार विहीन नेता स्टेट काउंसलर है। वे एक लेखिका व देश में लोकतंत्र की बहाली करने के लिए सतत संघर्ष करती आई है व दशकों से अपने घर में वहां की सत्तारूढ़ सैन्य सरकार द्वारा कैद करके रखी गई।

वे 19 जून 1945 को जन्मी थी। वे वहां के राजनीतिक दल नेशनल लीग ऑफ द डेमोक्रेसी की नेता है। देश में लोकतंत्र लाने के लिए प्रयासरत महिला को यूरोप में संत की तरह माना जाता हैं व वहां उनकी स्थिति महात्मा गांधी व अफ्रीकी नेता नेलसन मंडेला सरीखी है। वे म्यामांर के राष्ट्रपिता माने जाने वाले नेता आंग सान की छोटी बेटी है। उनकी मां खीन भी भारत में बर्मा की राजदूत रहीं।

उनकी पढ़ाई लिखाई दिल्ली के कानवेंट आफ जीसस एंड मेरी स्कूल व लेडी श्रीराम कॉलेज में हुई। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में तीन साल नौकरी की व माइकल ऐरिज से 1972 में शादी की। उन्होंने अवकाश प्राप्त सैन्य अधिकारियों की मदद से अपनी पार्टी बनाई। उन्हें 1990 के चुनाव में 81 फीसदी सीटो पर जीत हासिल हुई। मगर सैन्य सरकार ने उन्हें सत्ता सौंपने की जगह उन्हें उनके घर में ही कैद कर दिया।

वे 1989 से 2010 तक 21 साल में से 15 साल कैद रही और ऐसा करके उन्होंने राजनीति कैदी के रूप में दुनिया में अपना विशिष्ट स्थान हासिल किया। उनकी पार्टी ने 2010 के चुनावों का बायकाट किया। हालांकि 2015 के चुनावो में 86 फीसदी सीटों पर जीत हासिल की। मगर संविधान में एक प्रावधान था कि उनका पति व बच्चे विदेशी नहीं होने चाहिए। सैन्य सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति नहीं बनने दिया व इसकी जगह प्रधानमंत्री पद के बराबर स्टेट काउंसलर पद पर उन्हें नियुक्त कर दिया। जिसके पास कोई भी अधिकार नहीं है।

उन्हें 1991 में शांति के लिए नोबल पुरुस्कार मिला। टाइम पत्रिका ने उन्हें गांधी का बच्चा करार देते हुए उन्हें अहिंसा का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बताया। मगर शांति और अहिंसा की वकालत करने वाली इस नेता ने उस समय चुप्पी साध ली जब देश के राखिने राज्य में जब सेना ने रोहिंग्या लोगों का कत्लेआम किया गया। उन्होंने इसके विरोध में एक शब्द तक नहीं कहा। वैसे उनके राज्य में पत्रकारों पर काफी अत्याचार बढ़े हैं और वे स्वभाव से काफी चिड़चिड़ी है व पत्रकारो को अक्सर बेहूदा कहकर बुलाती है।

उनके विदेशी पति डा माइकल ऐरिस को जब 1997 में कैंसर हो गया तब म्यांमार सरकार ने उन्हें देखने जाने के लिए अनुमति दे दी मगर उन्होने जाने से इंकार कर दिया क्योंकि उन्हें इस बात की आशंका थी कि अगर उन्होंने एक बार देश छोड़ा तो उन्हें वापस नहीं आने दिया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान व पोप जानपाल द्वितीय की अपीलो के बावजूद उनके पति को बर्मामें लौटने नहीं दिया गया व 27 मार्च 1999 में उनके 53वें जन्मदिन के दिन डा माइकल ऐरिस की मृत्यु हो गई। उनके दोनों बच्चे इंग्लैंड में रहते हैं व उन दोनों को 2011 में उनसे मिलने की इजाजत दी गई थी।

उनके लड़ाकू होने व चिडचिड़े स्वभाव के कारण उनकी पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ी। हालांकि वे अपने देश में बेहद लोकप्रिय है व घर में बौद्ध शिक्षा व साहित्य का अध्ययन करती रहती है। बौद्ध के अहिंसक व शांतिपूर्वक तरीको से लोकतंत्र स्थापित करने की दुहाई देने वाली इस महिला का आचरण बड़ा अजीब माना जाता है। हाल ही में जब गाम्बिया नामक देश ने मुस्लिम देशों के संगठन आइगेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रोल की ओर से मुसलमानो के नरसंहार के मामले में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने म्यांमार की शिकायत की तो सेना व देश का बचाव करने वे उसके मुख्यालय द हेग पहुंच गई।

इस मामले में कहा गया था कि वहां रहने वले रोहिंग्या मुसलमानों का 1948 में बर्मा के आजाद होने से लेकर लगातार दमन किया जा रहा है। उनकी मौजूदगी में गवाहों ने म्यांमार की सेना द्वारा रोहिंग्या के नरसंहार व अत्याचार के किस्से सुना कर न्यायालय को बताया कि सेना वहां रोहिंग्या की गोली मारकर हत्या कर देती है। रोहिंग्या महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है व बच्चे को जलते हुए मकानों में फेंक दिया जाता है। उनके गले काट दिए जाते हैं मगर सुई सबकुछ चुपचाप बैठकर सुनती रही। सेना के खिलाफ उन्होंने एक शब्द तक नहीं कहा।

उनके खिलाफ फिर अदालत के बाहर जमकर नारेबाजी हुई व उन्हें रोहिंग्या लोगों का हत्यारा करार देते हुए लोगों ने शर्म करो के नारे लगाए। सुई की ने सेना को दोषी नहीं माना व कहा कि बांग्लादेश से आने वाले लाखों रोहिंग्या उनके देश के लिए खतरा बन चुके हैं। रोहिंग्या गुरिल्लों के हमले के विरोध में सेना कार्रवाई कर रही है। उन्होने अत्याचारो के लिए माफी नहीं मांगी। म्यांमार एक बौद्ध बाहुल्य देश है और बौद्धो में रोहिंग्या के खिलाफ भारी नफरत है। इसी के चलते, वोटो की राजनीति उनकी शांतिप्रियता व मानवधिकारों पर हावी हो गई है और वे अपनी इमेज की चिंता भी नहीं कर रही है।

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