वैक्सीन टेस्टींग कैसे क्या?

बचपन में एक शब्द गिनी पिग पढ़ा करते थे जो कि कहावतो में अक्सर इस्तेमाल किया जाता था। वास्तव में यह शब्द आमतौर पर किसी को बलि का बकरा बनाए जाने जैसे कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। वास्तव में गिनी पिग चूहे व खरगोश जैसा छोटा-सा जानवर होता है व इसका ज्यादातर इस्तेमाल प्रयोगशालाओं में इंसानों के लिए तैयार की जाने वाली दवाओं व टीको के परीक्षण के लिए किया जाता रहा है। उन्हें पहले किसी रोग से संक्रमित किया जाता है व फिर उन्हें दवा के टीके देकर उनका इलाज करने की कोशिश की जाती ताकि यह पता लगाया जा सके कि उस दवा या टीके का इंसानों पर क्या असर पड़ेगा।

अब जब पूरी दुनिया में कोरोना महामारी का टीका ढूढ़ने की कोशिश की जा रही है तो दुनिया भर की दवा बनाने वाली कंपनियां व स्वास्थ्य संस्थान अपनी प्रयोगशालाओं में इनका असर जानने के लिए जानवरों से लेकर इंसानों तक इसका इस्तेमाल कर रही है। आमतौर पर लंबे अरसे तक चलने वाले ये परीक्षण कई चरणों में होते है। पहला चरण जानवरों पर इसका इस्तेमाल किए जाने का होता है। उसके बाद कई चरणों में इनका इंसानों पर परीक्षण किया जाता है। इस समय दुनिया की विभिन्न दवा कंपनियों व संस्थानों में 200 जगहों पर इसका परीक्षण चल रहा है।

टीके या दवा का असर जानने के लिए पहले इनका असर पता लगाने के लिए खुद अपनी इच्छा से इस काम के लिए आगे आने वाले इंसानों पर इनका परीक्षण किया जाता है। जहां रूस इस संबंध में कोविड-19 का टीका ढूंढ लेने का दावा कर रहा है, वहीं हमारे देश में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, भारत बायोटेक सरीखी कंपनियां अपनी कोविड वैक्सीन का इंसानों पर प्रयोग कर रही है।

उन्होंने इसके लिए लोगों का चयन शुरू कर दिया है। इसके लिए पहले लोगों को वैक्सीन टीके देकर पता लगाया जाता है कि वह वायरस प्रतिरोध में कितना समर्थ है। अगर वे बीमारी का ईलाज कर पाने में सफल हो जाते हैं तो फिर उन्हें भविष्य में इसानों का ईलाज करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कुछ लोग जोकि स्वस्थ होते है खुद ही परीक्षण करवाने के लिए आगे आते हैं। इसके लिए उनका चयन बहुत सतर्कता से किया जाता है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि वे 18 से 55 साल के बीच के हो व उन्हें मधुमेह या कोविड रोग पहले नहीं हुआ हो।

उन्हें 15 दिन के लिए अलग-थलग क्वारंटाइन में रहना पड़ता है यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि उन्हें कोई और रोग न हुआ हो। वैक्सीन दिए जाने के बाद यह देखा जाता है कि वे कोराना वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी पैदा करने में कितना सफल रहती है। अगर वे इस परीक्षण में ठीक हो जाते हैं तो भविष्य में इस टीके का इस्तेमाल इससे पीडि़त व्यक्ति पर किया जाता है ताकि उन्हें ठीक किया जा सके व समुदाय का भला हो। यह लोग खुद अपने ऊपर प्रयोग करवाने के लिए तैयार होकर समाज की बहुत मदद करते हैं।

आखिर वे अपनी इच्छा से प्रयोग के लिए तैयार होते है। जहां एक और आम आदमी कोरोना पीडित से दूर भागता है वहीं यह वालंटियर या स्वयंसेवक आगे आकर लोगों की भलाई के लिए खुद को इस रोग से पीडि़त  बनकर अपने ऊपर दवाओं व टीको का परीक्षण करवाते हैं व जब चाहे तो लंबी अवधि तक चलने वाले इन प्रयोगों से खुद को अलग कर लेते हैं।

आमतौर पर देखने में आया है कि एक चरण में शामिल होने वाले वालंटियर दूसरे चरण में हिस्सा नहीं लेते हैं। इस प्रयोग की खासियत यह है कि वे लोग जब चाहे तब इस प्रक्रिया से खुद को अलग कर सकते हैं। हर चरण के चयन के लिए डाक्टर अलग-अलग मापदंड अपनाते हैं। आमतौर पर अस्थमा, रक्तचाप से पीडि़त या किसी एलर्जी का शिकार हो चुके लोगों को वालंटियर नहीं बनाया जाता है। खुशी की बात यह है कि कोवैक्सीन, जाइकोव डी व ऑक्सफोन द्वारा तैयार की गई वैक्सीन इस समय दूसरे चरण से गुजर रही है। प्रयोग के तौर पर 15 से 18 साल के बीच के लोगों पर परीक्षण किए जाने लगे हैं।

पहले चरण के परीक्षण में यह पता लगाया जाता है कि यह वैक्सीन लोगों के लिए कितनी सुरक्षित है व क्या उससे कोई दुष्परिणाम निकल सकते हैं जबकि प्रयोग के दूसरे में यह पता लगाया जाता है कि वह लोगों की प्रतिरोध क्षमता विकसित करने में कहां तक कामयाब होती है। तीसरे व अंतिम चरण में इसके परीक्षण से यह पता लगाया जाता है कि यह समुदाय के लिए कितनी उपयोग साबित होगी व लोगों पर उसका कब इस्तेमाल शुरू किया जा सकता है।

एक चरण में हिस्सा लेने वाले वालंटियर को और चरण में शामिल नहीं किया जाता है क्योंकि उनके लिए न केवल घातक साबित हो सकता है बल्कि यह प्रयोग के परिणामों को भी प्रभावित कर सकते हैं। डाक्टरो व वैज्ञानिको का मानना है कि आमतौर पर इस तरह के प्रयोगों के घातक परिणाम नहीं निकले हैं व बहुत कम लोगों की जिदंगी के खतरे में पड़ने की खबरे आई हैं। इसकी वजह यह है कि इस दवा या टीके का उन जानवरों पर पहले ही प्रयोग किया जा चुका होता है जिनके जेनेरिक कोड इंसानों जैसे होते हैं व उन पर कोई दुष्प्रभाव देखने में नहीं आया होता है।

अगर कोई दुष्प्रभाव देखने में मिलता है तो सरकार उसके भावी इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगा सकती है। प्रयोग में सफल होने पर डाक्टरों व वैज्ञानिकों की देखरेख में वैक्सीन दिए जाने वाले लोगों के रक्त की पड़ताल कर उसके होने वाले प्रभावो पर नजर रखी जाती है। आंकड़े बताते हैं कि 2010 में 23000 लड़कियो पर भारत में एचपीवी वैक्सीन का परीक्षण किया गया था। इनमे से सिर्फ आठ की मौत हुई। सरकारी आंकड़ो के मुताबिक 2015 से 2018 के बीच एक अरब वैक्सीन का परीक्षण किया गया। इस दौरान दुष्प्रभावो के कारण 1443 लोगों की मुत्यु हुई। बाद में पता चला कि यह लोग अन्य बीमारियों से पीडि़त थे।

हालांकि प्रयोग केवल पूरी तरह से स्वस्थ्य लोगों पर ही किया जा रहा है। जब भी कोई ऐसी बात चलती है तो हम भारतीय लोगों के मन में यह सवाल पैदा होने लगता है कि जिदंगी को खतरे में डालने वाले लोगों को कितना पैसा मिलता है। लंदन में वालंटियर को खासा भत्ता दिया जाता हैं मगर भारत  में आने वाले लोगों को सिर्फ खाना, किराया व बीमार पड़ने पर ईलाज की सुविधा दी जाती है। इसकी वजह यह है कि भारत एक गरीब देश है जहां लोग खून से लेकर किडनी तक बेचने को तैयार रहते हैं।

हाल ही में इस रोग से ठीक होने वाले लोगों का प्लाज्मा ब्लैक में बेचे जाने की खबरे आई हैं। यह सवाल इसलिए स्वाभाविक है कि जब हम लोग किसी कार को देखते हैं तो खरीदने के पहले यह सवाल पूछना नहीं भूलते है कि यह कितना माइलेज देती है।

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